ब्रहमाण्ड पुराण संक्षेप-दिनेश मालवीय

ब्रहमाण्ड पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

सभी महापुराणों कि श्रृंखला में यह अंतिम पुराण है. इसमें सम्पूर्ण ब्रहाण्ड का सांगोपांग वर्णन है. वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका बहुत महत्त्व है. छंद शास्त्र की दृष्टि से भी यह बहुत महत्वपूर्ण है. यह पुराण ‘पूर्व’, ‘मध्य’ और ‘उत्तर’ तीन भागों में विभाजित है.

पूर्व भाग

इसमें मुख्य रूप से नैमिषीयोपाख्यान, हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति, देव-ऋषि श्रृष्टि, कल्प. मनवंतर और कृतयुग आदि के परिणामों का वर्णन है. इसमें रूद्र सर्ग, ऋषि सर्ग, अग्नि सर्ग, दक्ष तथा शंकर के परस्पर आरोप-प्रत्यारोप और शाप, प्रियव्रत वंश, भुवनकोश, गंगावतरण, और खगोल का विवरण है. खगोल में ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं और आकाशीय पिण्डों का विस्तृत वर्णन है. इस भाग में समुद्र मंथन, विष्णु द्वारा लिंगोत्पत्ति आख्यान, मंत्रों के विविध भेद, वेद की शाखाएं आदि का उल्लेख है.

मध्य भाग

इस भाग में श्राद्ध और पिण्डदान सम्बन्धी विषय दिए गये हैं. इसके अलावा, परशुराम चरित्र की विस्तृत कथा, राजा सगर की वंश परम्परा, भगीरथ द्वारा गंगा की उपासना, शिवोपासना, गंगा को पृथ्वी पर लाने के प्रसंग और सूर्य तथा चन्द्र वंश के राजाओं के चरित्र का वर्णन है.

उत्तर भाग

इस पुराण के उत्तर भाग में भावी मन्वंतरों का विवेचन, त्रिपुर सुंदरी के प्रसिद्ध आख्यान, भंडासुर उद्भव कथा और उसके वंश के विनाश की कथा है.

‘ब्रह्माण्ड पुराण’ और ‘वायु  पुराण’ में बहुत अधिक समानता है. इस पुराण का उपदेष्टा प्रजापति ब्रह्मा को माना जाता है. यह यश, आयु और सम्पन्नता में वृद्धि करने वाला है और इसे बहुत अधिक पवित्र माना जाता है. इसमें धर्म, सदाचार, नीति, पूजा-उपासना और ज्ञान-विज्ञान की अच्छी जानकारी है.

इस पुराण के शुरू में गुरु अपना श्रेष्ठ ज्ञान सबसे पहले अपने सबसे योग्य शिष्य को देते हैं. ब्रह्मा ने यह ज्ञान वशिष्ठ को , वशिष्ठ ने अपने पुत्र पराशर को, पराशर ने जातुकर्न्य ऋषि को, उन्होंने द्वैपायन को, द्वैपायन ने अपने पाँच शिष्यों को दिया, जिनमें जैमिनी, सुमन्तु, वैशम्पायन, पेलव अरु लोमहर्षण शामिल हैं. लोमहर्षण सूतजी ने इसे भगवान् वेद व्यास से सुना. फिर नैमिषारन्य में एकत्रित ऋषि-मुनियों को सूतजी ने इस पुराण की कथा सुनाई.

कहा जाता है कि इस पुराण का प्रतिपाद्य विषय प्राचीन भारतीय ऋषि जावा द्वीप, जो वर्तमान में इंडोनेशिया है, लेकर गये थे. इस पुराण का अनुवाद वहाँ की प्राचीन कवि-भाषा में किया गया, जो आज भी उपलब्ध है.

‘ब्रह्माण्ड पुराण’ के भारतवर्ष वर्णन में इसे ‘कर्मभूमि’ कहा गया है. यह कर्मभूमि भागीरथी गंगा के उद्गम स्थल से कन्याकुमारी तक फैली हुयी है. इसका विस्तार नौ हज़ार योजन का है. इसके पूर्व में किरात जाति और पश्चिम में म्लेच्छ यवनों का वास है. मध्य भाग में चारों वर्णों के लोग रहते हैं. इसके सात पर्वत हैं. इसमें गंगा, सिन्धु, सरस्वती, नर्मदा, कावेरी और गोदावरी आदि सैंकड़ों पावन नदियाँ हैं. यह देश कुरु, पांचाल, कलिंग, मगध, शाल्व, कौशल, केरल, सौराष्ट्र आदि जनपदों में विभाजित है. इसे आर्यों की ऋषिभूमि कहा गया है.

इस पुराण में काल गणना का भी उल्लेख है. इसके अतिरिक्त चारों युगों का भी वर्णन है. इसमें परशुराम अवतार की कथा विस्तार से दी गयी है. राजवंशों का बहुत रोचक विवरण है. राजाओं के गुणों-अवगुणों का निष्पक्ष रूप से विवेचन किया गया है. राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव का चरित्र दृढ़ संकल्प और घोर संघर्ष द्वारा सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है. गंगावतरण की कथा श्रम और विजय की अनूठी गाथा है. इसमें कश्यप, पुलस्त्य, अत्रि, पराशर आदि ऋषियो के प्रसंग भी बहुत रोचक हैं. विश्वामित्र और वशिष्ट के उपाख्यान काफी दिलचस्प और शिक्षाप्रद हैं. ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ में चोरी करने को महापाप बताया गया है.

उपरोक्त 18 महापुराणों के अलावा कुछ ऐसे पुराण भी हैं, जिनका सम्बन्ध विशिष्ट देवों से सम्बंधित शक्तिर्यों अथवा अवतारों से है. इन्हें विद्वानों ने उपपुराण कहा है. इन्हें कुछ विशिष्ट पुराणों के परिशिष्ट रूप में दिया गया है. इस श्रेणी के पुराणों में ‘वायु पुराण’, ‘हरिवंश पुराण’, ‘देवी भगवत पुराण’, ‘कालिका पुराण’, ‘सूर्य पुराण’, ‘कल्कि
पुराण’ आदि शामिल हैं.

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