बुद्ध सर्किट: बुद्ध की यात्रा के गवाह

 

बुद्ध सर्किट: बुद्ध की यात्रा के गवाह

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कुछ लोग संसार में ऐसे हुये जिनके होने से ये जगत गौरान्वित हुआ, उसी श्रंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है भगवान बुद्ध!
भगवान बुद्ध का जन्म ई.र्पू. 556 में लुम्बिनी नामक स्थान जो कि नेपाल में है, हुआ था। पिता श्री शुद्धोधन थारू, माता श्रीमती माया देवी थारू, शक्या राज्य के राजा थे। माता का देहान्त बाल्यावस्था में ही हो गया, पिता ने अपनी पत्नि की बहन महा प्रजापति से विवाह किया जिन्होंने भगवान बुद्ध का लालन पालन किया। बचपन का नाम गोतम था। विवाह हुआ, पत्नि यशोधरा थारू, पुत्र भी हुआ, कुमार राहुल थारू जिसका नाम था।

The Buddha, or "enlightened one," was a simple boy names Siddhartha Gautam, born to the rulers of Shakya clan. His early childhood was spent in a lavish, comfortable palace, wherein he was completely unaware of the suffering, pain and struggles of the common world. Once on a short excursion to his city he witnessed several incidents that acquainted him with the suffering of different people. He got extremely troubled knowing the other facet of life and left home to explore more such questions he hadn’t personally experienced, determined to lead an aesthetic life thereafter.

बुद्ध के जन्म के पूर्व ही असीता नामक एक प्रज्ञावान संत ने भविष्यवाणी की थी कि शुद्धोधन तुम्हारे यहाँ एक पुत्र का जन्म होगा। जो खुद तो भगवत्ता को प्राप्त होगा ही एवं उसकी छाया में सैकड़ो लोग भी युक्त होंगे। फिर ऐसे ही हुआ बालक का जन्म हुआ। असीता दूर कही पर्वत पर बैठा था उसे बोध हुआ ओर वो राजमहल की और भागा आया। पहले कभी न आया था सदैव सम्राट असीता के दर्शन एवं मार्ग दर्शन प्राप्त करने जाया करते थे। सम्राट ने असीता को देखा, दंग रह गये, स्वागत सत्कार किया, असीता ने कहा समय व्यर्थ न करो बालक के दर्शन कराओ। सम्राट ने बालक बुद्ध को असीता को गोद में रख दिया, बालक बुद्ध संत असीता की लटाओं से खेलने लगे। असीता कभी हँसते कभी उनके अश्रु बहने लगते। सम्राट तो अचंभित हुये ये माजरा क्या है। असीता ने कहा हँसता हूँ धन्य हुआ उसके दर्शन पाकर जो भगवान होने को है। रोता हूँ कि जब इसका दिव्य प्रकाश सारे संसार में फैलेगा तब मैं नू हूँगा। मैं जन्म मरण के दु:चक्र से मुक्त हो चुका मृत्यु के बाद अब मेरा कोई जन्म नहीं, इसी के लिये कई जन्म प्रयास किया कि मुक्त हो जाऊँ एवं मुक्त भी हो गया हूँ। पर इस बालक का भविष्य मैं देख रहा हूँ। तब लगता है। एक जन्म और होता तो इस महाविराट का सानिध्य का अपूर्व आनंद लेता। पर अब संभव नहीं।


शुद्धोधन चिंता में पड़े बहुत उम्र के बाद संतान हुयी थी फिर राज पाठ का वारिश और असीता ने बालक के संन्यासी होने की घोषणा कर दी, राजा चिन्तित हुआ और उन्होंने बुद्ध को रास रंग भोग के लोक में डाल दिया। शादी हुयी, पुत्र हुआ। रास रंग में डूबे सुन्दरतम स्त्रियां, विलासिता की सभी सामान परन्तु प्रकृति ने गौतम का भगवान होने को ही चुना था। एक छोटी सी घटना ने सारे आयोजन सारी व्यवस्था को चूर-चूर कर दिया। गौतम ने एक मृत व्यक्ति को देखा कि जीवन की अंतिम परिणित मृत्यु है? तो सब व्यर्थ ही है। वे अमरत्व की खोज सत्य की खोज पे निकल पड़े। जब भी कोई व्यक्ति जीवन सदैव यही घटना घटती है। बुद्ध तो भगवान होने को है। 12 वर्ष तक खोज में लगे रहें और जैसे कि सभी सच्चे खोजी जाते है। बुद्ध ने भी बौद्धगया में वृक्ष के नीचे पा लिया। कहते है तब फूल खिल गये, बादल बरस गये, नदियों ने हिलोरे लिये संसार धन्य हुआ। बुद्ध भगवान को पाकर बुद्ध ने विहार किया। वे चलते रहें। संसार को कष्ट में पाकर गुरुता के यान से वे बढ़े और फिर कारवा बनता गया, इस विशाल बुद्ध छाया में सैकड़ो व्यक्तियों को परम आनंद की प्राप्ति हुयी। भगवान का दर्शन अकथनीय है। अवाच्य है। उस युग में संस्कृत का काफी दुरूपयोग ब्रााहृण कर रहे थे। बुद्ध ने पाली भाषा का उपयोग किया एवं दर्शन को नया आयाम दिया।


बुद्ध बहुत वैज्ञानिक ढंग से अपनी बात कहते है। वो कहते है तुम किसी भृम जाल में मत पड़ो कि ईश्वर है? आत्मा है? परमात्मा है? उन्होंने चार आर्य सत्य दिये, वे कहते है।
1. संसार दुख है। (ये तो मानते हो?)
2. दुख का कारण है। (अकारण दुख नहीं वजह तो होगी ही।)
3. तुम्हारे दुख का तुम स्वयं ही कारण हो। (तुम दुखी हो तो वजह भी तुम होंगे।)
4. जीवन की एक ऐसी अवस्था है। जहां दुख न होगा। (प्ररमरान की अवस्था)
ये मूल आर्य सत्य है। बुद्ध ने खुद को वेद्य कहा। तुम रूग्ण हो मैं वेद्य हूँ। आओ मैं तुम्हारी चिकिस्ता करूँगा और तुम स्वस्थ्य हो जाओगे। इसी वैज्ञानिक ढंग के कारण बुद्ध का धर्म चायना, जापान एवं कई देशों में फला फूला। भगवान बुद्ध अद्वतीय है। उनके संदेश युगो-युगो तक संसार को धर्मिकता प्रदान करते रहेंगे।


लुम्बिनी : – यह स्थान नेपाल की तराई में पूर्वोत्तर रेलवे की गोरखपुर-नौतनवां लाइन के नौतनवां स्टेशन से 20 मील और गोरखपुर-गोंडा लाइन के नौगढ़ स्टेशन से 10 मील दूर है। नौगढ़ से यहां तक पक्का मार्ग भी बन गया है। गौतम बुद्ध का जन्म यहीं हुआ था। यहां के प्राचीन विहार नष्ट हो चुके हैं। केवल अशोक का एक स्तम्भ है, जिस पर खुदा है- “भगवान बुद्ध का जन्म यहां हुआ था।’ इस स्तम्भ के अतिरिक्त एक समाधि स्तूप भी है, जिसमें बुद्ध की एक मूर्ति है। नेपाल सरकार द्वारा निर्मित दो स्तूप और हैं। रुक्मनदेई का मंदिर दर्शनीय है। एक पुष्करिणी भी यहां है।

lumbini-newspuran

बोधगया : – यहां बुद्ध ने “बोध’ प्राप्त किया था। भारत के बिहार में स्थित गया स्टेशन से यह स्थान 7 मील दूर है।

Bodh Gaya-Newspuran
The quaint town of Bodh Gaya, in Bihar, echoes with a tranquil ambience, underlined by intense devotion. Dotted with temples and monasteries, this 2,500-year-old birthplace of Buddhism invites travellers from all across the world to soak in its spiritual vibes, retrace the footsteps of Lord Buddha and understand his philosophies at the place where he attained nirvana (enlightenment).
सारनाथ :- बनारस छावनी स्टेशन से 5 मील, बनारस-सिटी स्टेशन से 3 मील और सड़क मार्ग से सारनाथ 4 मील पड़ता है। यह पूर्वोत्तर रेलवे का स्टेशन है और बनारस से यहां जाने के लिए सवारियां- तांगा, रिक्शा आदि मिलते हैं। यह बौद्ध-तीर्थ है। भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। यहीं से उन्होंने धर्मचक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया था। सारनाथ में बौद्ध-धर्मशाला है। दर्शनीय वस्तुएं- अशोक का चतुर्मुख सिंह स्तम्भ, सारनाथ बौद्ध धर्म का प्रधान केंद्र था किंतु मोहम्मद गोरी ने आक्रमण करके इसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। वह यहां की स्वर्ण-मूर्तियां उठा ले गया और कलापूर्ण मूर्तियों को उसने तोड़ डाला। फलत: सारनाथ उजाड़ हो गया। केवल धमेख स्तूप टूटी-फूटी दशा में बचा रहा। यह स्थान चरागाह मात्र रह गया था।
Sarnath-Buddha-newspuran

Sarnath, 10km from Varanasi, is one of the most revered Buddhist pilgrimage centers. After attaining the Enlightenment at Bodh Gaya, it was here that Lord Buddha preached his first sermon, sanctified as Maha Dharm Chakra Pravartan. The great Dhamekh Stupa and several other structures stand testimony to the importance the place enjoyed at that time. The Chaukhandi Stupa is the place where, during his first visit to Sarnath, Lord Buddha met his first five disciples. The area is a treasure trove of archaeological findings such as Dharmrajika Stupa and Mulgandhkuti Vihar.

सन् 1905 ई. में पुरातत्व विभाग ने यहां खुदाई का काम प्रारंभ किया। इतिहास के विद्वानों तथा बौद्ध-धर्म के अनुयायियों का इधर ध्यान गया। तब से सारनाथ महत्व प्राप्त करने लगा। इसका जीर्णोद्धार हुआ, यहां वस्तु-संग्रहालय स्थापित हुआ, नवीन विहार निर्मित हुआ, भगवान बुद्ध का मंदिर और बौद्ध-धर्मशाला बनी। सारनाथ अब बराबर विस्तृत होता जा रहा है।

जैन ग्रंथों में इसे सिंहपुर कहा गया है। जैन धर्मावलंबी इसे अतिशय क्षेत्र मानते हैं। श्रेयांसनाथ के यहाँ गर्भ, जन्म और तप- ये तीन कल्याण हुए हैं। यहां श्रेयांसनाथजी की प्रतिमा भी है यहाँ के जैन मंदिरों में। इस मंदिर के सामने ही अशोक स्तम्भ है।

कुशीनगर :- गोरखपुर जिले में कसिया नामक स्थान ही प्राचीन कुशीनगर है। गोरखपुर से कसिया (कुशीनगर) 36 मील है। यहां तक गोरखपुर से पक्की सड़क गई है, जिस पर मोटर-बस चलती है। यहां बिड़लाजी की धर्मशाला है तथा भगवान बुद्ध का स्मारक है। यहां खुदाई से निकली मूर्तियों के अतिरिक्त माथाकुंवर का कोटा ‘परिनिर्वाण स्तूप’ तथा “विहार स्तूप’ दर्शनीय हैं। 80 वर्ष की अवस्था में तथागत बुद्ध ने दो शाल वृक्षों के मध्य यहां महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। यह प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है।

अन्य तीर्थस्थल : – तथागत के निर्वाण के पश्चात उनके शरीर के अवशेष (अस्थियां) आठ भागों में विभाजित हुए और उन पर आठ स्थानों में आठ स्तूप बनाए गए हैं। जिस घड़े में वे अस्थियां रखी थीं, उस घड़े पर एक स्तूप बना और एक स्तूप तथागत की चिता के अंगार (भस्म) को लेकर उसके ऊपर बना। इस प्रकार कुल दस स्तूप बने।

आठ मुख्य स्तूप – कुशीनगर, पावागढ़, वैशाली, कपिलवस्तु, रामग्राम, अल्लकल्प, राजगृह तथा बेटद्वीप में बने। पिप्पलीय वन में अंगार स्तूप बना। कुम्भ स्तूप भी संभवत: कुशीनगर के पास ही बना। इन स्थानों में कुशीनगर, पावागढ़, राजगृह, बेटद्वीप (बेट-द्वारका) प्रसिद्ध हैं। पिप्पलीय वन, अल्लकल्प, रामग्राम का पता नहीं है। कपिलवस्तु तथा वैशाली भी प्रसिद्ध स्थान हैं।

श्रावस्ती का स्तूप : – पूर्वोत्तर रेलवे की गोरखपुर-गोंडा लाइन पर स्थित बलरामपुर स्टेशन से 12 मील पश्चिम सहेठ-महेठ ग्राम ही प्राचीन श्रावस्ती है। यह कोसल देश की राजधानी थी। भगवान श्रीराम के पुत्र लव ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। कुछ लोगों का मत है कि महाभारत युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ के अश्व की रक्षा करते हुए अर्जुन को यहीं के राजकुमार सुधन्वा से युद्ध करना पड़ा था।
श्रावस्ती बौद्ध एवं जैन दोनों का तीर्थ है। यहां बुद्ध ने चमत्कार दिखाया था। तथागत दीर्घकाल तक श्रावस्ती में रहे थे। अब यहां बौद्ध धर्मशाला है तथा बौद्धमठ भी है। भगवान बुद्ध का मंदिर भी है।

सांची का स्तूप :- भोपाल से 28 मील दूर और भेलसा से 6 मील पूर्व सांची स्टेशन है। उदयगिरि से सांची पास ही है। यहां बौद्ध स्तूप हैं, जिनमें एक की ऊंचाई 42 फुट है। सांची स्तूपों की कला प्रख्यात है। सांची से 5 मील सोनारी के पास 8 बौद्ध स्तूप हैं और सांची से 7 मील पर भोजपुर के पास 37 बौद्ध स्तूप हैं। सांची में पहले बौद्ध विहार भी थे। यहां एक सरोवर है, जिसकी सीढ़ियां बुद्ध के समय की कही जाती हैं।

पेशावर : – पश्चिमी पाकिस्तान में प्रसिद्ध नगर है। यह स्तूप सम्राट कनिष्क ने बनवाया था। यहां सबसे बड़े और ऊंचे स्तूप के नीचे से बुद्ध भगवान की अस्थियां खुदाई में निकलीं।

बामियान : – अफगानिस्तान में बामियान क्षेत्र बौद्ध धर्म प्रचार का प्रमुख केंद्र था। बौद्ध काल में हिंदू कुश पर्वत से लेकर कंदहार तक अनेक स्तूप थे।

कौशाम्बी :- इलाहाबाद जिले में भरवारी स्टेशन से 16 मील पर। यहां एक स्तूप के नीचे बुद्ध भगवान के केश तथा नख सुरक्षित हैं।

चांपानेर (पावागढ़) :- पश्चिम रेलवे की मुंबई-दिल्ली लाइन में बड़ौदा से 23 मील आगे चांपानेर रोड स्टेशन है। वहां से एक लाइन पानी-माइंस तक जाती है। इस लाइन पर चांपानेर रोड से 12 मील पर पावागढ़ स्टेशन है। स्टेशन से पावागढ़ बस्ती लगभग एक मील दूर है। बड़ौदा या गोधरा से पावागढ़ तक मोटर-बस द्वारा भी आ सकते हैं। पावागढ़ में प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप हैं। सम्राट अशोक ने सांची में स्तूप बनवाये। यहीं से बोधी वृक्ष की टहनी लेकर महिन्दा राजपक्षे और संघ मित्रा लंका गये थे।

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Champaner was founded in the 8th century by King Vanraj Chavda of the Chavda Kingdom. Some attribute the name “Champaner” to his desire to name the city after his friend and minister Champa, while others say it comes from the igneous rocks of Pavagadh, whose light yellow color tinged with red gives the appearance of the champaka, or “flame of the forest” flower.


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