कहते मुझको पागल, सनकी,दीवाना, जाने क्या … दिनेश मालवीय “अश्क”

 

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कहते मुझको पागल, सनकी,दीवाना, जाने क्या क्या
मैं भी बुनता रहता हूँ ताना-बाना, जाने क्या क्या।

मेरे मुस्काने भर से उनका चेहरा तन जाता है
मैं चुपचाप सुनूँ उनका नित चिल्लाना, जाने क्या क्या।

इतने बीते बरस सभी उतना ही ताज़ा है मन मे
रूठा-रूठी, प्यार जताना, मुस्काना, जाने क्या क्या।

कभी नहीं सोती दिन मे माँ, एक घड़ी न फुर्सत की
पापड़, बड़ी, अचार, मुरब्बा, रोज़ाना, जाने क्या क्या।

बिगड़े बेटे ने घुमवाये , बूढ़े अम्मा-बापू को
कोर्ट-कचहरी, जिला,ताल्लुका और थाना,जाने क्या क्या।

पापा नहीं हताश दिखे, चिन्ताएं कितनी भी बढ़ीं
खाना, कपड़ा, फीस, किराया, समधाना, जाने क्या क्या।

टिकियाचोरों ने गलियों मे ताम झाम सब बना लिये
महल, दुमहले, मोटर-गाड़ी, फैलाना, जाने क्या क्या।

प्यार, मुहब्बत, अपनापन , नेकी, हमदर्दी, सादापन
घर-घर, नज़र-नज़र ढूँढे। है दीवाना, जाने क्या क्या।

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