ज़्यादा हाईजीन से कमजोर होता इम्यून सिस्टम…Can being too clean weaken your immune system?

हम हाइजीन के पक्षधर हैं|  हर तरफ हाइजीन|  ये हाइजीन तब परेशानी बन जाती है जब ये मनोविकार बन जाए| 

 

कोरोना काल में साफ़ सफाई पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है लेकिन ऐसा भी न हो कि आप सफाई फोबिया (Germaphobia) का शिकार हो जाएँ|
बच्चों को बहुत ज्यादा हाइजीनिक रखना उनकी इम्यूनिटी को कमजोर कर सकता है| 
इसका ये मतलब भी नहीं कि आप बच्चों को गंदगी से खेलने दें|
हाइजीन का मतलब है _  अच्छी हेल्थ और स्वास्थ्य  को बरकरार रखना।  इसे स्वच्छता और साफ़ -सफाई तथा बचाव के रूप में लिया जाता है।  यह एक लिमिट तक तो ठीक है ,  लेकिन अब इस पर  खास और ज्यादा ध्यान दिया जाता है ; तो अब यह एलर्जी और  संक्रामक रोग को जन्म देने का सबब बनता जा रहा है।  फिलहाल हाइजीन जिन अर्थों में लिया जाता है , उनमें तमाम कांट्रडिक्शंस है।  
उठने बैठने , खाने-पीने तथा पहनने के लिए एकदम साफ चीजों के इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है ; धूल -मिट्टी से हमेशा परहेज करना अनगिनत समस्याओं को जन्म देता है। क्योंकि जीवन में दोनों परिस्थितियों का समान महत्त्व है।
दैनिक जीवन में धूल -धक्कड़ और मिट्टी आदि की भी जरूरत है।  वैज्ञानिक मानते हैं कि जब कभी हम मिट्टी के  कांटेक्ट में आते हैं तो हमारे ‘ इम्यून सिस्टम ‘ प्रतिरक्षा प्रणाली को कीटाणुओं के सम्पर्क में आने का अवसर मिलता है।
नेचुरल एटमॉस्फेयर में धूल- मिट्टी आदि बिखरी होती है।  बच्चे उसके सम्पर्क में आते हैं और खेलते – कूदते रहते हैं।  इससे उनका शरीर  हेल्थी रहता है।  एलर्जी इन बच्चों को कम होती है और साथ ही  इंफेक्शन भी कम ही होता है ;  लेकिन इसके  उलट जो परिशुद्ध परिवेश ( हंड्रेड परसेंट हाइजीनिक एटमॉस्फेयर) में रहते हैं  और कम्प्यूटर , इंटरनेट आदि में  बिजी रहते हैं या रखे जाते हैं , तो वे रोगों के प्रति अधिक  सेंसटिव होते हैं।  

 

फॉरेन कंट्रीज में एलर्जी की अधिकता इन्हीं  ज्यादा सावधानियों के कारण  बढ़ी है।  एक अन्य शोध में इसके उलट उन लोगों  की स्टडी की गई , जो झोपड़ियों में निवास करते हैं , जिनके बच्चे उन्मुक्त होकर खेलते हैं ,  बारिश के पानी में भीगते हैं और तालाब का पानी भी पी जाते हैं ; पर उनको किसी प्रकार की बीमारी भी नहीं होती।  
जीवन में केवल स्वच्छता की ही नहीं , थोड़ी – बहुत धूल-मिट्टी की भी  जरूरत पडती है।  दिन- रात के  कंबीनेशन से ही एक पूर्ण चक्र बनता है।  ठीक उसी  तरह हाइजीन में स्वच्छता  के साथ धूल का होना भी  जरूरी है।  इम्यून सिस्टम के  वीक हो जाने से छोटी-सी बात भी  रोगों का कारण बन जाती है।  पानी से भीगते ही सर्दी , जुकाम हो जाता है।  धूल से एलर्जी हो जाती है और छींक आने लगती हैं।  ये सभी रोग इम्यून सिस्टम की कमजोरी के कारण पनपते है ;  लेकिन इस तन्त्र को मजबूत कर लिया जाये तो ये रोग  खुद ही  खत्म हो जाएंगे।
लेटेस्ट रिसर्च से पता चला है कि धूल और गोबर में मौजूद कीटाणुओं से लड़ चुके इम्यून  सिस्टम में इतनी ताकत आ जाती है कि वह दमे आदि रोग को भी पास फटकने नहीं देती। एक और सर्वेक्षण (रिसर्च) का निष्कर्ष तो चौंकाने वाला है , जो हमारी वैदिक मान्यता  को पुष्ट करता है।  इस  लार्ज स्केल रिसर्च से पता चलता है कि जिन घरों में गाय और बैल बंधे होते हैं  और जिनके घर-आंगन में गोबर आदि से लिपाई-पुताई की जाती है ; वहां पर निवास करने वाले लोगों की  इम्यूनिटी सिस्टम अत्यंत सुदृढ़ होती है।  ऐसे लोग रोगों के प्रति संवेदनशील नहीं होते हैं वे हेल्दी ही रहते हैं।  
हाइजीन से  मतलब है प्रकृति का सहचरी -भाव।  प्राकृतिक जीवन ही सही अर्थों में हाइजीन है ; जबकि उसके विपरीत विकृति है , जो अनेक रोगों का कारण बनती है।  साफ-सुथरा होना  इंपॉर्टेंट है  ,  लेकिन ये तभी हो सकता है , जब गन्दगी को बाहर कर दिया जाये।  कपड़ा साफ स्वच्छ तभी हो सकता है  , जब जब उसे धोया जाता है। ठीक उसी प्रकार स्वास्थ्य तभी पाया जा सकता है , जब रोगों के लड़ने की सामर्थ्य मिल जाये।   इसलिए हमें प्राकृतिक जीवन जीने की हर तरह से कोशिश करना चाहिए|


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