चाणक्य: प्रशासन में गोपनीय परीक्षण कितना ज़रूरी -सरयूसुत मिश्र

चाणक्य: प्रशासन में गोपनीय परीक्षण कितना ज़रूरी

सरयूसुत मिश्र
शासन में सचिव की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. शासक के नियमों और नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सचिवों पर होती है. आचार्य कौटिल्य, जिन्हें चाणक्य भी कहा जाता है, ने अपने “अर्थशास्त्र” में सचिव, अमात्य की नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यताओं का  उल्लेख किया है. आचार्य कौटिल्य ने सचिव के मामले में निगरानी और उनके आचरण की गोपनीय जानकारी एकत्रित करने को अनिवार्य बताया है. उनके  समय के अमात्य का काम वही था जो कैबिनेट सेक्रेटरी, चीफ सेक्रेटरी, एडीशनल चीफ सेक्रेट्री, प्रिंसिपल सेक्रेट्री और सेक्रेटरी का होता है. आचार्य ने उनकी नियुक्ति के लिए राज्य के प्रति स्वामिभक्ति और प्रतिबद्धता को सबसे महत्वपूण   योग्यता माना है.

आचार्य चाणक्य के “अर्थशास्त्र” के अनुसार उस समय राजा शासक अमात्य के रूप में अपने मित्र, सहपाठी या किसी परिचित को नियुक्त कर सकता था. नियुक्ति के पूर्व शासक के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और स्वामी भक्ति बड़ा आधार था. व्यक्ति की योग्यता देखना तो आवश्यक था ही. आचार्य कहते हैं कि व्यक्ति को विद्या, बल कार्यशैली, बुद्धि, साहस और समर्पण के आधार पर पद की गरिमा का विचार कर योग्य व्यक्ति को ही अमात्य सचिव नियुक्त करना चाहिए.

आचार्य ने अमात्य की नियुक्ति उपरांत विभिन्न पदों का प्रभार सौंपने के पश्चात उनके आचरण की परीक्षा को अनिवार्य बताया है. परीक्षा की विधियों और गोपनीय ढंग पर भी कौटिल्य के अर्थशास्त्र में विस्तार से बताया गया है.

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उन्होंने कहा कि परीक्षा में शासक को स्वयं माध्यम नहीं बनना चाहिए. इसका कारण यह बताया गया है कि, कई बार परीक्षा के निष्कर्ष गलत भी हो सकते हैं, क्योंकि जो गुप्तचर जानकारी जुटा रहे हैं उनके राग-द्वेष भी हो सकते हैं. इसलिए शासक को परीक्षा की प्रक्रिया और माध्यम से अपने को अलग रखना चाहिए.

आचार्य ने इनके गुप्त परीक्षण के लिए भी उपाय बताये हैं. गुप्तचरों के माध्यम से राजा या शासक के विरुद्ध अमात्यों से चर्चा की जाना चाहिए. इस चर्चा के निष्कर्ष के आधार पर उसे पद पर रखने अथवा पद मुक्त करने का निर्णय चाहिए. गुप्त परीक्षा में असफल अमात्यों को दंडित करने को भी आचार्य कोटिल्य ने आवश्यक बताया है.

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में, चाहे केंद्र में सरकार हो या राज्य में सरकारें, उनमें सचिवों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है. लोकतांत्रिक सरकारें जनकल्याण की दृष्टि से योजनाएं बनाती हैं और  निर्णय करती हैं. लेकिन उनका क्रियान्वयन सचिवों के माध्यम से ही किया जाता है. कार्यपालिका सचिवों के नियंत्रण में होती हैं. किसी भी सरकार में अधिकतर अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते हैं. उन्हीं में से वरिष्ठता के अनुसार सचिव, प्रमुख सचिव अपर मुख्य सचिव, अथवा मुख्य सचिव की नियुक्ति लोकतांत्रिक शासन द्वारा की जाती है.

प्राचीनकाल में शासक के पास सचिव की नियुक्ति के अधिकार थे. वह योग्यता और व्यक्ति की निष्ठा के आधार पर नियुक्ति दे सकता था. उस समय आईएएस अधिकारी का कोई संवर्ग नहीं हुआ करता था. आज स्थिति यह है कि आईएएस अधिकारियों में से ही शासन सचिव और उनके उच्च स्तर के पदों पर नियुक्तियां कर सकता है. आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है और उनकी सेवा केंद्र के अधीन होती है. केंद्र द्वारा ही राज्यों को उनकी सेवाएं दी जाती हैं. अखिल भारतीयसेवा के अधिकारी देश के विभिन्न राज्यों के काम करते हैं. यह आवश्यक नहीं होता कि, उसी राज्य का निवासी उस राज्य में सेवा करें.

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आईएएस अधिकारी जब पहली बार राज्य में पदस्थ होता है, तब उसे राज्य के बारे में अधिक जानकारी नहीं होती. धीरे-धीरे वह राज्य के बारे में समझता है और पदोन्नत होते हुए सचिव पद पर पहुंचता है. लोकतांत्रिक शासकों के पास ऐसी शक्ति तो है कि वह विशेषज्ञों को सचिव के पद पर रख सकते हैं, लेकिन हर शासक इस तरह का साहस नहीं करता. इसका कारण यह है कि, संगठित सेवा के अधिकारी उस शासक के विरोध में आ सकते हैं. इसलिए हर शासक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के विचारों के साथ ही कार्य करता है. भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र शासन में संयुक्त सचिव स्तर पर तकनीकी विशेषज्ञों को प्रयोग के तौर पर पदस्थ किया है. यह प्रयोग सफल होता हुआ भी देख रहा है.

कोई एक व्यक्ति, जो राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा लेता है, उसको सभी विषयों और सेवाओं में विशेषज्ञता हो, यह जरूरी नहीं है. शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीकी, विज्ञान जैसे क्षेत्र हैं, जो विशेषज्ञता की मांग करते हैं. जहाँ विशेषज्ञ लोग हैं,वहां वे बेहतर काम कर सकते हैं. लेकिन अभी तो अधिकांश तकनीकी प्रोफेशनल कार्य करने वाले विभागों में भी अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी हैं. कई बार कुछ लोकतांत्रिक नेताओं ने इस तरह की मांग की है कि अखिल भारतीय सेवाओं की जगह राज्य स्वयं अपनी प्रशासनिक सेवाओं का विकास करें और उसमें राज्य के लोग भी परीक्षा दे सकें. उनमें सफल लोग ही राज्य के शासन में अपनी भूमिका निभाएं. इसके पीछे तर्क यह होता है कि, राज्य के लोग राज्य के प्रति ज्यादा निष्ठावान होते हैं. उनका राज्य के प्रति कमिटमेंट होता है. अभी यह प्रयोग भारत में नहीं हो सका है. इसकी सफलता और असफलता के बारे में और कुछ कहना सही नहीं होगा.

यह जरूर है लोकतांत्रिक शासन अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों को जब सचिवों को प्रमुख, मुख्य सचिव की नियुक्तियां करते हैं, तब कई बार यह देखा जाता है कि वरिष्ठता और योग्यता को दरकिनार कर दलीय निष्ठा और व्यक्ति निष्ठा को वरीयता दी जाती है.

मध्यप्रदेश में एक ऐसा उदाहरण है, जो प्रशासनिक जगत में हैरानी के साथ देखा जाता है. वर्ष 2018 में सत्ता में आई सरकार ने एक ऐसी अधिकारी को मुख्य सचिव के पद पर पदस्थ किया. उस अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप जांच एजेंसियों में पंजीबद्ध थे और उसे सचिव, प्रमुख सचिव एवं अपर मुख्य सचिव की पदोन्नति न्यायालय के आदेश के अध्ययन दी गई थी. उस समय जो नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे, उन्हें उक्त अधिकारी में व्यक्ति निष्ठा दिखी और उन्होंने कानून को अपने अनुसार तोड़ मरोड़ कर न्यायालयीन आदेश का आधार बनाकर मुख्य सचिव के पद पर पदस्थ कर दिया गया. तत्कालीन सरकार के इस आदेश की आलोचना भी हुई, लेकिन 15 महीने के लिए उस सरकार को मुख्य सचिव के पद से नवाजे गए. प्रशासनिक क्षेत्रों में ऐसा परसेप्शन है कि इन अधिकारी ने तमाम तरह के लाभ पहुंचाने में भूमिका निभाई.

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ऐसे और भी उदाहरण है, जहां वरिष्ठता और योग्यता को दरकिनार कर निष्ठा के आधार पर अधिकारी को मुख्य सचिव बनाया गया. वर्तमान में सचिव और मुख्य सचिव तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की पदस्थापना में योग्यता से अधिक अन्य चीजों से को महत्व दिया जाता है. इसीलिए समाज में प्रशासनिक सेवाओं का सम्मान और गरिमा प्रभावित हुई है.

आचार्य कौटिल्य ने  अमात्य, सचिव और मंत्री की गोपनीय जानकारी प्राप्त करने की जो अनिवार्यता बताई थी, उस बारे में भी संभवतः आजकल कोई खास काम नहीं किया जा रहा है. इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि जो प्रशासन की गुणवत्ता है, वह लगातार गिर रही है और वरिष्ठ स्तर पर ऐसे अधिकारियों को ही महत्व मिल रहा है, जो सरकार के बदलते ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर दौड़ लगाने में देर नहीं करते. बीस साल पहले एक बहुत ही प्रगतिशील और बुद्धिमान मुख्यमंत्री प्रदेश में थे. उनके एक बहुत ही विश्वसनीय सचिव थे. वर्ष 2003 में जब सत्ता में परिवर्तन हुआ, तब जो नई मुख्यमंत्री चुनी गईं, उनके पास वह सचिव पहुंचे और उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री के संबंध में कुछ दस्तावेज दिखाए जो सरकार की निर्णयों पर नहीं बल्कि उनके व्यक्तिगत आचार विचार से जुड़े हुए थे. नवनियुक्त महिला मुख्यमंत्री ने उस अधिकारी को बुरी तरह से डांट फटकार कर भगाया और अधिकारी महोदय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली चले गए.

यह उदाहरण इसलिए आवश्यक है कि, यह समझ आ सके कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी इस तरह से प्रशासन की मर्यादा को खंडित करने के लिए जवाबदार होते हैं. लोकतांत्रिक शासक अपनी सुविधा अनुसार उनका उपयोग करते हैं. अधिकारियों की गुप्तचर से जानकारी प्राप्त करने का तो सवाल ही नहीं है. मीडिया ही ऐसे अधिकारियों के बारे में समय-समय पर तथ्य उद्घाटित करता है, लेकिन उन पर भी ध्यान नहीं दिया जाता. इसीलिए आज प्रशासन की गरिमा गिर रही है. सुशासन और प्रशासन की गरिमा के लिए जरूरी है कि उचित स्तर पर व्यक्ति निष्ठा नहीं वरिष्ठता और योग्यता, दक्षता और परफॉरमेंस  को  सम्मान मिले.

Priyam Mishra



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