चन्दन आरू खाखरो…चन्दन और पलाश … निमाड़ी लोक कथा

निमाड़ी में चन्दन आरू खाखरो

जानें, क्या वाकई चंदन के पेड़ से ...

निमाड़ी 
जंगल में एक चंदन को झाड़ थो, वो की मीठी-मीठी महेक सी सारो जंगल महेकाया करतो थो। पण चंदन अपणा आप घणो दुखी थो। केऊँ कि वो का पऽ बड़ा-बड़ा झयरीलासाप लपटाया रयता था। ऊखुद भी रूखो-सूखो ठूठ सरीको एकलो थो।

एक दिन वो का मन मैं आयो कि कोइ सी दोस्ती करनू चाहिए। पास मैं एक खाखरा को झाड़ थो, वो खाखरा सी बोल्यो- 'मोटा भाई ! म्हारो मन य्हाँ उसटी गयो, हाऊँ तुमारा सी दोस्ती करनू चाऊंज, अपण दोइ जण दोस्त बणी जावाँ।' खाकरो बोल्यो-'हे भाई ! या तो बड़ी खुशी की वात छे। म खऽ दोस्ती मंजूर छे। उना दिन सी दो दोस्त संगीत रयणऽ लग्या।

एक दिन एक मोळी वाळो (लक्कड़हारा) ढंढावतो-ढंढावतो जंगल में आयो न खाखरा का छावळा मँऽ बठी गयो। खाकरा न पूछ्यो- 'का भाई, तू नामनो के ऊँछे, काई दुख छे तुख? 

मोळीवाळो बोल्यो- 'भाई! हाऊँ जंगल का लक्कड़ बेची न गुजर बसर करूँज। आज दुफार हुइ गई पण जंगल में एक भी सूखो झाड़ नी देखाण्यो। मइनीज् बात को दुख छे ।

'एका मैं दुख की काई वात छे भाई'- खाखरो बोल्यो - 'वो देख, वो चंदन को सूखो झाड़ छे, एखऽ काटी न काम चला।' मोळीवाळो गयो न एक बोझा की चंदन की लाकड़ी काटी ली फिर भी वो की उदासी नी गई। चंदन अपणा दोस्त की धोकाबाजी सी दुखी हुइ गयो।

उन्न सोच्यो कि मन खाखरा की केसूड़ी की खूबसूरती देखी। वो को काळो मन नी देखी पायो। आवँऽ वो की करनी को फळ चखावणू चायजे, जसा का संगात तसो। चंदन न मोळीवाळा सी पूछ्यो- 'का रे भाई! तु ख लाकड़ा मिली गया, फिर भी तू अनमनो केऊँ छे?' वो बोल्यो 'भाई! लाकड़ा तो मिली गया पण इन खऽ बांधणऽ की रस्सी घर भूली आयो अवॅs काइ करूँ?'

चंदन बोल्यो- 'बस, इत्ती सी वात छे? देख, वो पास मँऽ खाखरा को झाड़ छे, वो की जड़ खोदी लऽ वा रस्सी जसी काम आइ जागऽ ।' चंदन की बात सुणी नऽ मोळीवाळो खुस हुइ गयो।

उन्न खाखरा ख जड़ मूळ सी खोदी नाख्यो आरू पातळी जड़न न सी लक्कड़ की मोळी बांधी न घर लइ गयो। उना दिन सी चंदन न या ठाणी ली कि दुष्ट न की दोस्ती का बजाय अकेलां रयणू अच्छो छे, तवँऽ सी चंदन जंगल मऽ एकलोज् छे।
हिंदी

चन्दन और पलाश जंगल में एक चन्दन का वृक्ष था। उसकी सुगन्ध से सारा जंगल सुगन्धित रहता था, लेकिन उसे अपने आपसे संतोष नहीं था वह अपने रूखे-सूखे स्वरूप और एकांकी जीवन से दुखी रहा करता था। एक दिन उसके मन में विचार आया कि किसी से मित्रता करनी चाहिए। नजदीक ही एक पलाश का वृक्ष खड़ा था वह उससे बोला- 'पलाश भाई, पलाश भाई! मेरा मन जंगल में अकेले रहते-रहते ऊब गया है। मेरी इच्छा तुम से मित्रता करने की है।

पलाश ने कहा-'इससे बढ़कर खुशी की बात और क्या हो सकती है। मुझे मंजूर है।' दोनों में मित्रता हो गई और दोनों साथ-साथ रहने लगे। एक दिन एक लकड़हारा जंगल में आया और घूमते-घूमते थककर पलाश की छाया में बैठ गया। पलाश ने पूछा- 'क्यों भाई, तुम इस तरह उदास से क्यों बैठे हो? तुम्हें कौन-सा दुख है?' लकड़हारा बोला- 'भाई, मैं सूखी लकड़ियाँ बेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता हूँ ।

Chandan Tiwary, a social media chronicler of Delhi's trees - The Hindu

आज घूमते-घूमते दोपहर हो गई, लेकिन अभी तक एक भी सूखा पेड़ नहीं खोज पाया हूँ, इसी से चिन्तित हूँ।’ पलाश ने कहा ‘इसमें चिन्ता की कौन सी बात है? देखो, पास में ही एक चन्दन का वृक्ष खड़ा है। इसे काटकर अपना काम चला लो।’ लकड़हारे ने वैसा ही किया। उसने तुरन्त ही चन्दन के वृक्ष से कुछ लकड़ियाँ काट ली। लेकिन अभी भी उसके चेहरे से चिन्ता की रेखाएँ मिट नहीं पाई थीं। चन्दन अपने मित्र से इस विश्वासघात से बहुत ही दुखी हुआ।

उसने मन ही मन सोचा! ‘मैंने पलाश के फूलों के ऊपरी सौन्दर्य को तो देखा, लेकिन उसके मन की कालिख को नहीं। यह उसी का फल है। अब कुछ तो उसके किए का फल चखाना चाहिए।’ उसने तुरन्त ही नजदीक खड़े लकड़हारे से पूछा, ‘क्यों भाई! अब तो तुम्हें लकड़ियाँ मिल गईं, फिर भी तुम चिन्तित क्यों हो?’ वह बोला ‘लकड़ियाँ तो मिल गई, लेकिन मैं उन्हें बांधने की रस्सी घर पर ही भूल आया हूँ। इसी से चिन्तित हूँ।’

चन्दन ने कहा- ‘बस इतनी सी बात! अरे, यह जो पास में पलाश का वृक्ष खड़ा है। इसकी जड़ खोद लो उनमें तुम्हें बढ़िया रस्सी मिल जाएगी।’ लकड़हारा प्रसन्न हो उठा और उसने पलाश के पेड़ को जड़ से खोदकर फेंक दिया और उसकी पतली जड़ों से लकड़ियों को बाँधकर अपने घर ले गया। कहते हैं- उसी दिन से चन्दन ने यह निश्चय कर लिया कि दुर्जन की दोस्ती करने से अकेले रहना अच्छा है और तभी से वह जंगल में अकेले रहता आया है।

 


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