चरण नहीं आचरण ही पूज्य-दिनेश मालवीय

चरण नहीं आचरण ही पूज्य

-दिनेश मालवीय

आजकल व्यक्ति-पूजा का चलन बहुत बढ़ गया है. इस पूजा में व्यक्ति की महानता की जगह उसकी हैसियत, जाति, कुल, दूसरों को दण्ड या पुरस्कार देने की क्षमता आदि को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है. ऐसा पहले नहीं था, यह भी सत्य नहीं हैं. ऐसा होता तो भृतहरि ऐसा क्यों कहते कि- “यस्यास्ति वित्तंस नर कुलीन:, यानी जिसके पास धन है, वही नर कुलीन है”. यह बात उन्होंने अपने समय में आचरण की जगह चरण-पूजा के प्रचलन को देखकर ही व्यंग्य में कही थी.

भारत में बहुत प्राचीन काल से ही कहा गया गया है कि –“ आचार: परमो धर्म:” यानी आचार ही परमधर्म है. महाभारत में कहा गया है कि-

“सर्वोयं ब्राह्मणों लोके वृत्तेन  तु विधीयते
 वृत्ते स्थितस्तु शूद्रोअपि ब्रह्मनत्वं नियच्छति”

अर्थ- ब्राह्मण लोग सदाचार के बल पर ही लोक में अपने पद पर प्रतिष्ठित रहते हैं. सदाचार में स्थित रहने वाला शूद्र व्यक्ति भी ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकता है.

कोई धनहीन व्यक्ति भी यदि सदाचारी हो, तो बड़े से बड़ा दुराचारी भी मन ही मन उसके प्रति आदर से भरा होता है. इसके विपरीत यदि कोई बड़े कुल में जन्मा और धनवान व्यक्ति दुराचारी हो, तो ऊपर से लोभ या भय के कारण लोग उसका सम्मान भले ही करते हों, लेकिन भीतर से उसे कोई सम्मान नहीं देता. आचारहीन व्यक्ति समाज में अच्छी नज़र से देखा ही  नहीं जा सकता.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सदाचरण करने से बृहस्पति ग्रह अनुकूल हो जाता है. सारे विपरीत ग्रह अनुकूल हो जाते हैं. सदाचारी व्यक्ति को सम्मान स्वयं उसी प्रकार मिलने लगता है, जैसे सारी नदियाँ स्वयं बहती हुयी सागर से जाकर मिल जाति है. जबकि दुराचारी व्यक्ति के साथ इसके बिल्कुल विपरीत होता है.

इसीलिए हर धर्म में व्यक्ति के लिए सदाचारपूर्ण जीवन जीने के लिए कुछ नियम और कायदे निर्धारित किये गये हैं. इन्हें जीवन आचार संहिता भी कहा जा सकता है. धर्म ग्रंथों के दो भाग होते हैं. एक आध्यात्मिक होता है और दूसरा लौकिक जीवन से सम्बंधित. दूसरे भाग में समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार इनमें कुछ फेर-बदल हो जाता है, लेकिन इनका मूल भाव एक ही रहता है. अधिकतर लोग दूसरे भाग को ही पकड़ कर बैठ जाते हैं, और आध्यात्मिक स्वरूप की अवहेलना करते हैं. अधिकतर समस्याओं की जड़ भी यही है. वास्तव में इसका उद्देश्य यही रहता है कि परिस्थतियाँ कैसी भी हों, व्यक्ति अधिक से अधिक सदाचारी बना रहे.

कुछ लोगों का जीवन सहज ही इतना निष्कपट और पवित्र होता है, कि उन्हें किसी आचरण संहिता को पढ़ने की ज़रुरत नहीं होती. उनका आचरण न केवल आचरण संहिता के अनुरूप बल्कि दूसरों के लिए अनुकरणीय हो है. आप कितनी देर पूजा-पाठ करते हैं या जिस धर्म को मानते हैं उसके कर्मकाण्डों और अनुष्ठानों का कितना पालन करते हैं, आपको कितने श्लोक या ग्रंथ मुखाग्र हैं, इन सब बातों का आपके धार्मिक होने का कोई सम्बन्ध नहीं है. महत्त्व इस बात का है कि आप भीतर से कितने निष्ठावान और आत्मानुशासित हैं.

अनेक लोग ऐसे हैं, जो धर्म के बाहरी स्वरूप में विश्वास नहीं करते और कोई दिखावा भी नहीं करते, लेकिन उनका आचरण बहुत पवित्र और अनुकरणीय होता है. वे भीतर से बहुत अच्छे होते हैं. ऐसा नहीं है कि अनुष्ठान और कर्मकाण्ड करने वाले लोग धार्मिक नहीं होते. यह कोई शर्त नहीं है. लेकिन जो लोग सिर्फ इसे ही धर्म समझते और मानते हैं, वे बिल्कुल धार्मिक नहीं होते. वे धर्म के किसी भी आचरण से रहित होते हैं. इसीलिए समाज में कभी सच्चा सम्मान और स्नेह नहीं पा सकते.

इस विषय से सम्बंधित कथाओं और प्रसंगों से भारत के शास्त्र भरे पड़े हैं. किसी भी ऐसे व्यक्ति को समाज में सम्मान मिलता नहीं दिखाया गया है, जो आचरण रहित है या जो आचरण से गिर गया हो. ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे कि कोई व्यक्ति अपने आचरण के कारण समाज में पूजनीय रहा और आचरण से भ्रष्ट होते ही समाज की नज़र से गिरकर निंदनीय हो गया. ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो ख़राब आचरण के कारण कभी समाज में सम्मान नहीं पाते थे, लेकिन अपने आचरण में सुधार लाने पर उन्हें समाज ने सिर आँखों पर बैठा लिया.

यदि हम अपने ग्रंथों को देखें तो हमें बड़ी संख्या में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनका जन्म किसी और वर्ण में हुआ, परंतु बाद में वे किसी और वर्ण के हो गए. उदाहरण के लिए ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे. परन्तु वेदाध्यायन के द्वारा वे उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की. ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण बहुर आवश्यक माना जाता है. इसी प्रकार सत्यकाम जाबाल एक गणिका के पुत्र थे और उनके पिता का पता ही नहीं था, परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए.

विष्णु पुराण में वर्णन आता है कि राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया. राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए. पुन: इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया. धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया. आगे उनके वंश में ही पुन: कुछ ब्राह्मण हुए.
क्षत्रियकुल में जन्मे शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया. वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण के अनुसार शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए.

दरअसल भारत के मूल चिंतन में कभी ऊँच-नीच की बात रही ही नहीं. हाँ, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि कालांतर में इस मूल चिंतन से भटकाव आया
और अनेक लोगों ने ऐसा आचरण किया, जो हमारे मूल चिंतन से विपरीत था. ऐसे लोग धीरे-धीरे समाज की नज़र से उतरते चले जाते हैं. उनका सम्मान और उनके
प्रति जनसामान्य की श्रद्धा में लगातार कमी आते-आते वह समाप्त हो जाती है.

इसीलिए समाज के हर वर्ग को, विशेषकर जनमत निर्माताओं को अपने आचरण पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए. श्रीमद्भागवतगीता में कहा गया है कि श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण करते हैं, जन सामान्य भी उनका अनुकरण करता है. लिहाजा, जो लोग श्रेष्ठ हैं या अपने को श्रेष्ठ मानते हैं या श्रेष्ठ बनना चाहते हैं, उनका सबसे पहला और सर्वोपरि कर्तव्य यह है कि वे अपने आचरण को श्रेष्ठ रखें.

वह युग बीत गया जब कोई सिर्फ बड़े कुल में जन्म लेने भर से समाज में सम्मान प्राप्त कर लेता था. आज भी कुछ हद तक ऐसा हो रहा है, लेकिन बहुत निकट भविष्य में ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला. हमारे प्राचीन शास्त्रों के मूल भाव और तत्वार्थों को ठीक से समझ कर उन्हें आचरण में उतारने पर ही सम्मान मिल पायेगा. व्यक्ति के चरण की नहीं, आचरण की पूजा होगी.

कोई व्यक्ति आपसे किसी लोभ या भय के कारण या कोई स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से भले ही आपके चरण पूज रहा हो, लेकिन उसके मन में आपके प्रति कोई सम्मान नहीं होता. जिसका आचरण पवित्र और अच्छा होता है, उसके चरणों में सहज ही शीश झुक जाता है.

हमारे अपने ही समाज और देश में यह बात बार-बार प्रमाणित होती रही है. इस बात को जितनी जल्दी समझ लिया जाए उतना ही देश और समाज के व्यापक हित में
लाभकारी होगा.

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