सरकुलेशन, सीबीआई और पापी पेट, पापुलेशन से तेज बड़ा सरकुलेशन, 6 लाख घरों वाले भोपाल में अखबारों का सरकुलेशन 54 लाख से ज्यादा.. सरयूसुत मिश्रा


स्टोरी हाइलाइट्स

सीबीआई ने मध्य प्रदेश के समाचार पत्रों, जबलपुर के दैनिक  “जय लोक”, सिवनी के “दलसागर”, “युग श्रेष्ठ” के प्रकाशकों के...

सरकुलेशन, सीबीआई और पापी पेट, पापुलेशन से तेज बढ़ा  सरकुलेशन, 6 लाख घरों वाले भोपाल में अखबारों का सरकुलेशन 54 लाख से ज्यादा.. सरयूसुत मिश्रा सीबीआई ने मध्य प्रदेश के समाचार पत्रों, जबलपुर के दैनिक  “जय लोक”, सिवनी के “दलसागर”, “युग श्रेष्ठ” के प्रकाशकों के खिलाफ फर्जी सर्कुलेशन बता कर धोखाधड़ी से डीएवीपी से सरकारी धन प्राप्त करने का केस दर्ज किया है. संभवत: प्रदेश में ऐसा पहली बार हुआ कि अखबारों के मूल आधार, सर्कुलेशन के फर्जी होने की आशंका पर केस दर्ज हुआ है. यह मामला मीडिया के धंधे की दुनिया हिलाने वाला है. जो रास्ता इन तीन अखबारों ने अपनाया है, वह आम रास्ता है. सर्कुलेशन के मामले में हर अखबार इसी रास्ते से गुजरता है. इस रास्ते पर चलकर की जा रही लूटपाट और धोखाधड़ी पर पहली बार नजर गई है. यह तो हमेशा आम चर्चा का विषय और स्थापित धारणा वर्षों से बनी हुई है. जिस तरह व्यापम पर सही को गलत और गलत को सही कर लाभ पहुंचाने का का आरोप लगा था, अखबारों के सरकुलेशन का भी ऐसा ही मामला है. हालाकि ये बात दूसरी है कि सर्कुलेशन बढ़ाकर दिखाने के लिए काई बार अखबार भी सरकार की नीतियों के कारण ही मजबूर हो जाते हैं| व्यापम में भ्रष्ट आचरण तंत्र ने किया और पद के रूप में लाभ किसी दूसरे ने उठाया. गड़बड़ी करने वाले ने अपना हित साधन और पद पाने के इच्छुक व्यक्ति ने गड़बड़ी के आधार पर पद प्राप्त किया. सर्कुलेशन के मामले में तो अखबार मालिक ने भ्रष्ट आचरण किया और स्वयं लाभ प्राप्त किया.देखने में ये भी आया है कि केंद्र और राज्य की सरकारें भी इनकी गडबडियों को जानते हुए भी मूक सहमती देती रहीं हैं| फर्जी सर्कुलेशन बाजार और सरकारों को सतत मूल्य आधारित नुकसान पहुंचाता है. वास्तविक सरकुलेशन को बढ़ाकर अखबार की विज्ञापन दरें ज्यादा निर्धारित करवा ली जाती हैं. यह अपराध किसी एक राज्य सरकार को नुकसान नहीं पहुंचाता. यह पूरे देश को नुकसान पहुंचाता है. भारत सरकार में अखबारों के लिए रजिस्ट्रेशन ऑफ न्यूज़ पेपर्स ऑफ इंडिया है. विज्ञापन की दरें तय करने के लिए डीएवीपी विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय स्थापित हैं. इसी प्रकार राज्यों में सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय होते हैं. सर्कुलेशन डीएवीपी अपनी निर्धारित दरों पर अखबारों को विज्ञापन देकर देती है और उसी दर पर केंद्र और राज्य की सरकारें विज्ञापन देती है. व्यापम जैसा सर्कुलेशन का घोटाला एकदम से जांच की प्रक्रिया तक इसलिए पहुंचा कि पहले आटे में नमक जैसी सरकुलेशन में गड़बड़ी चल रही थी, लेकिन मीडिया के नए खिलाड़ियों ने इसको बहुत आसान रास्ता समझा और नाम मात्र की प्रसार संख्या को राज्यों में लाखों बताकर सरकारी धन की लूटपाट की. कहा जाता है कि राजधानी भोपाल में कई विश्वसनीय और बड़े माने जाने वाले अखबार, नवीन सोच... सत्य बताने हिम्मत , “पूरा सच बिना संकोच ....आदि के दावेदार न्यूज़ पेपर्स सर्कुलेशन के आंकड़ों में कागज पर बाजीगरी करते रहे हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कुछ समय पहले जब भोपाल आए थे तब भाजपा मुख्यालय पर वह प्रवक्ताओं से मिले थे और उन्होंने भोपाल के अखबारों की पठनीयता पर प्रश्न करते हुए जानकारी चाही थी. प्रवक्ताओं ने वास्तविकता के विपरीत कागजी सरकुलेशन जब अमित शाह को बताया तो वे चौक गए और उन्होंने कहा कि जो अखबार बाजार में दिखता नहीं है, उसका सर्कुलेशन सबसे ज्यादा कैसे हो सकता है. आज फर्जी सरकुलेशन के मामले में सीबीआई का आना इस बात का गंभीर संकेत है कि इस सरकुलेशन फर्जीवाड़े की प्रवृत्ति को शासन में उच्च स्तर पर गंभीरता से लिया गया है. सर्कुलेशन गलत बताने का मामला ऐसा ही है जैसे किसान के पास खेत नहीं है, लेकिन वह एमएसपी पर धोखाधड़ी कर फसल बेच रहा है. राजधानी भोपाल की अनुमानित जनसंख्या लगभग 25 लाख है. भोपाल से 12 बड़े अखबार, 11 मध्यम, और 185 छोटे अखबार प्रकाशित होते हैं. इन सब का डीएवीपी के अनुसार सर्कुलेशन 54 लाख से अधिक है.  बड़े अखबारों का सर्कुलेशन - 18 अखबारों का पांच लाख, मध्यम और आश्चर्यजनक ढंग से 185 छोटे अखबारों का सर्कुलेशन 31 लाख डीएवीपी के आंकड़ों में दर्ज है. लगभग सभी समाचार पत्र राज्य की विज्ञापन सूची में भी शामिल हैं और इन्हें समय-समय पर जन धन से विज्ञापन भी दिए जाते हैं. भोपाल की आबादी को यदि हम घरों के हिसाब से विभाजित करें, तो एक परिवार में औसतन 4 लोगों की संख्या भी मानी जाए, तो लगभग छह लाख मकान भोपाल में होने चाहिए. 6 लाख घरों में 54 लाख अखबार  हर रोज, यह तो आटे में नमक नहीं बल्कि आटा है ही नहीं, केवल नमक ही  नमक दिख रहा है. कोरोना के समय तो वास्तविक सर्कुलेशन भी समाप्त हो गया था. लोगों ने महामारी के डर से अखबार बुलाना ही बंद कर दिया था. अब लोग खबरों के लिए ज्यादातर डिजिटल पढ़ना पसंद कर रहे हैं. जो अखबार पढ़े भी जाते हैं, उनके डिजिटल एडिशन ईपेपर ज्यादा पढ़े जाते हैं. खुली आंखों से समाज को आईना दिखाने वाले अखबारों का सर्कुलेशन घोटाला “दिया तले अंधेरा” जैसा है. प्रजातंत्र के  चौथे स्तंभ अखबार आजकल स्वयं थानेदार की भूमिका निभाते हैं. वे अदालत बन जाते हैं. किसी भी व्यवस्था, व्यक्ति या व्यापार की सच्चाई न केवल उजागर करने का दावा करते हैं बल्कि अपना निर्णय भी सुना देते हैं. पीड़ित की आवाज सुनने की कोई आवश्यकता ही नहीं समझते. अखबार को समाज का आईना माना जाता है. यह आईना दूसरों का चेहरा तो दिखाता है, लेकिन आईना ही जादुई चालबाजी कर रहा है. यह जानना समाज के लिए बहुत जरूरी है. उम्मीद की जाती है कि सीबीआई में जो केस दर्ज किया है, उसमें जांच सही निष्कर्ष पर पहुंचेगी और फर्जी सर्कुलेशन से समाज और सरकार का धन हड़पने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी. सर्कुलेशन की जांच तकनीकी युग में बहुत आसान है. अखबार कागज पर छपता है. कागज पर जीएसटी लगता है. अखबार छापने वाली मशीन बिजली से चलती है. कागज की खरीदी बिजली का बिल और अखबारों की बिक्री राशि खातों में जाती है. यह सब देखने के बाद  ईमानदार व्यवस्था फर्जी सर्कुलेशन को एक दिन  में रोक सकती है. सर्कुलेशन, सी.ए., आर.एन.आई.,आदि ए.बी.सी., डी.ए.वि. की तरफ भी नजर दौड़ाने की आवश्यकता है, जो मिलजुलकर सरकुलेशन के घोटाले में चलाते हैं. सरकुलेशन का पूरा सच बेहिचक सामने आना चाहिए.  सरकारों को भी इस बात पर विचार करना चाहिए कि सरकुलेशन के आधार पर निर्धारित होने वाली दरों की प्रणाली में सुधार हो| बेसिक दरें इतनी पर्याप्त हो कि किसी भी अखबार को दरें बढ़ाने के लिए सरकुलेशन में गड़बड़ी करने की आवश्यकता ना पड़े|