जलवायु परिवर्तन और जंगली खेती

जलवायु परिवर्तन और जंगली खेती

Climate change and wild farming
मित्रो आज  केवल हमारे देश में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में  मौसम में बड़ी तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। एक ओर  जहां धरती गरम हो रही है वहीँ ठण्ड भी बहुत बढ़ रही है और बरसात में भी अनेक परिवर्तन देखे जा रहे हैं। बाढ़  और सूखा दोनों मुसीबत बने हुए हैं। इसी प्रकार समुद्री ज्वारभाटों  की संख्या भी बढ़ती जा रही है। भू स्खलन और भूकम्पों में भी बढ़ोतरी हुई है।
जैसा कि  हम सभी जानते हैं की यह समस्या धरती पर निरन्तर घट रही हरियाली के कारण  है। हरियाली दूषित हवा को सोखकर उसे जैविक खाद में बदलती है जिस से हरयाली के साथ साथ अन्य जैव विवधताओं का पालन पोषण होता है।

इसलिए यह जरुरी हो गया है की हम देखें की आखिर हरियाली का तेजी से क्यों हनन हो रहा है तब हम पाएंगे की यह हनन सर्वाधिक हमारी रोटी के कारण  हो रहा है। समान्यत: रोटी के लिए हरियाली को नष्ट किया जाता है। यह माना जाता है की हरियाली चाहे वह  पेड़ों ,झाड़ियों  या खरपतवारों के रूप में रहती है वह हमारी फसलों का खाना खा लेती है.दूसरा किसानो को इस बात का डर रहता है की पेड़ों की छाया के कारण फसले ठीक नहीं होती हैं। इसलिए खरपतवारों ,झाड़ियों और पेड़ों को लगातार काटा जा रहा है।

हम पिछले 50 सालो से अपने पारिवारिक खेतों में स्थाई टिकाऊ खेती के लिए प्रयासरत हैं। शुरू में हमने 5  साल परम्परागत देशी खेती किसानी का अभ्यास किया उसके बाद करीब 15  साल हरित क्रांति में गवाएं इसके बाद के 30 सालों से हम अब बिना जुताई की क़ुदरती खेती जिसे जंगली खेती भी कहते हैं का अभ्यास  कर रहे हैं। इस खेती में हम खरपतवारों और पेड़ों को बचाते  हुए खेती करते हैं।

इसमें जुताई ,खाद और दवाइयों की जरूरत नहीं रहती है और फसले इनके साथ अच्छी पनपती हैं। हमने  पाया है की जुताई नहीं करने से एक और जहां हमारे  खेत साल भर हरियाली से भरे रहते हैं वहीं हमारे देशी उथले कुए भी साल भर भरे रहते हैं। हरियाली एक और जहां बरसात को आकर्षित करती है वहीं वह पानी के अवशोषण में भी सहायता करती है। फसलों में कुदरती संतुलन के कारण बीमारियां नहीं लगती है। जुताई नहीं करने के कारण  खेत मे नत्रजन की कमी नहीं होती है। दलहन जाती के वृक्ष और सहयोगी  फसलों के  कारण फसलों को लगातार नत्रजन और तमाम जैविक खाद बढ़ते क्रम में मिलती है जिस से उत्पादन और उत्पादकता और गुणवत्ता भी बढ़ते  क्रम में रहती है।

इसलिए हमारा मानना है की यदि हमे  जलवायु परिवर्तन की समस्या से निजात पाना है और पर्यावरण प्रदुषण के संकट से उबरना है तो हमे हर हाल में बिना जुताई की जंगली खेती को अपनाना होगा इसमें कोई विशेष तकनीकी ज्ञान और पैसे की जरूरत नहीं है जरूरत है तो केवल जाग्रति की है।


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