वेदों में पर्यावरण रक्षा की सम्पूर्ण अवधारणा

 

आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग सहित पर्यावरण से जुड़े जिन घातक संकटो से जूझ रही है, उनका प्रभावी समाधान भारत के दर्शन में मिलता है. भारत के ऋषियों ने हजारों साल पहले मनुष्य ही नहीं, जीव मात्र के कल्याण के लिए पर्यावरण की रक्षा को सबसे ज्यादा अहमियत दी. उन्होंने प्रकृति के साथ मित्रवत सम्बन्ध रखते हुए इसके पास रहने और इसके प्रति संवेदनशील रहने की शिक्षा दी. उन्होंने रोगों के इलाज में इसके तत्वों के उपयोग पर गहरा अध्ययन कर बहुमूल्य निष्कर्ष निकाले.ऋषियों ने पर्यावरण की रक्षा में समाज की अहम् भूमिका को प्रमुखता से रेखांकित किया. पूजा में पर्यावरण की रक्षा एक अभिन्न अंग था. वेदों के अनुसार प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध एक-दूसरे पर आधारित है. ऋग्वेद में प्रकृति का सुन्दर चित्रण हुआ है. प्राकृतिक जीवन को सुख और शान्ति का आधार माना गया है.

पर्यावरण की वैदिक अवधारणा में वायु, जल, ध्वनि, खाद्य और मिट्टी, वनस्पति, वनसंपदा, पशु-पक्षी संरक्षण आदि शामिल हैं. ऋषियों ने पर्यावरण के इन सभी अंगों की सुरक्षा का महत्त्व प्रतिपादित कर उसके उपाय भी बताए हैं.

वायु

पूरी धरती के चारों तरफ वायु का समुद्र फैला है. हमारे शरीर की रक्त-वाहिनियों में बहता हुआ रक्त बाहर की तरफ दबाव डालता है. अगर इसे संतुलित नहीं रखा जाए तो शरीर की सभी धमनियां फट जाएंगी और जीवन नष्ट हो जाएगा.वायु का यह समुद्र हमारी रक्षा करता है. पेड़-पौधे ओक्सीजन देकर क्लोरोफिल की उपस्थति में, इसमें से कार्बनडाईऑक्साइड अपने लिए रख लेते हैं और ऑक्सिजन हमें देते हैं. इस तरह वे हमारे जीवन की रक्षा करते हैं.

ऋषियों ने वायु को जीवन के लिए सबसे अहम् माना है. हजारों साल पहले उन्हें पता था कि हवा कई प्रकार की गैसों का मिश्रण है, जिनके अलग-अलग गुण और अवगुण हैं. इनमें ही ऑक्सिजन भी है, जो जीवन के लिए बहुत ज़रूरी है. शुद्ध वायु कई रोगों के लिए दवा का काम करती है. टीबी, ह्रदय रोग जैसी बीमारियों के लिए यह प्रभावी औषधि है. उन्होंने किसी भी हाल में वायु को प्रदूषित न करने की शिक्षा दी है.

जल

ऋषियों ने जल को जीवन का पर्याय माना है. उसे पीने, कृषि सफाई और धोने, चीजों को ठंडा रखने और गर्मी से राहत पाने के लिए उपयोगी बताया है. सभी जीव जल का उपयोग करते हैं. जल के बिना जीवन संभव नहीं है. उद्योगीकरण के बाद से अनेक तरह का कूड़ा-कर्कट और अपशिष्ट नदियों में मिलकर उन्हें दूषित कर रहे हैं. आज जल के इस प्रदूषण को रोकना सबसे बड़ी चुनौती है. अथर्ववेद में कहा गया है कि “ अच्छे प्रकार से रोग रहित तथा रोगनाशक जल को मैं लाता हूं. शुद्ध जलपान करने से मैं मृत्यु से बचा रहूँगा. अन्न, घृत, दुग्ध आदि सामग्री तथा अग्नि के सहित घरों में आकर अच्छी तरह बैठता हूँ. (अथर्ववेद 3/12/9/). ऋग्वेद में कहा गया है कि “सुखमय जल हमारे अभीष्ट की प्राप्ति के लिए तथा रक्षा के लिए कल्याणकारी हो. जल हम पर सुख-समृद्धि की वर्षा करे (ऋग्वेद 10/9/4/). ऋषियों ने जल को अनेक औषधियों, वनस्पतियों और अन्न का आधार बताया है. वेदों में जलाशयों में मल-मूत्र त्याग को घोर पाप निरूपित किया गया है.

ध्वनि

ऋषियों ने ध्वनि के प्रदूषण को भी बहुत खतरनाक बताया है. उन्होंने ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए धीरे बात करने तक की शिक्षा दी है. अथर्ववेद के एक श्लोक में प्रार्थना की गयी है कि “मेरी जीभ से मधुर शब्द निकलें. भगवान का भजन-पूजन-कीर्तन करते समय स्वर में मधुरता हो. मधुरता मेरे कर्म में निश्चय से रहे. मेरे चित्त में मधुरता बनी रहे. (अथर्ववेद 1/34/2/). उन्होंने कहा कि भाई भाई से और बहन बहन से अथवा परिवार में कोई भी एक-दूसरे से द्वेष न करे. सब सदस्य एकमत हों और एकव्रती होकर आपस में शान्ति से भद्र लोगों के समान मधुरता से बातचीत करें. उन्होंने जोर से बातचीत तक को ध्वनि प्रदूषण का कारण बताया है, जबकि आज दुनिया कितने जोर-जोर से कानफोडू आवाजों में मज़ा लेने की ग़लतफ़हमी पाले हुए है.

खाद्य

वेदों में खाद्य के सम्बन्ध में वैज्ञानिक आधार पर अनेक निष्कर्ष दिए हैं. मनुष्य पाचनशक्ति से भोजन को अच्छी तरह पचाए, जिससे वह शारीरिक और आत्मिक बल बढाकर उसे सुखदायक बना सके. इसी प्रकार जल और दूध के विषय में अथर्ववेद में कहा गया है कि ” मैं जो कुछ पीता हूँ, यथाविधि पीता हूँ; जैसे यथाविधि पीनेवाला समुद्र को पचा लेता है. दूध-जल जैसे पेय पदार्थों को हम उचित रीति से ही पिया करें. जो कुछ खाएं, अच्छी तरह चबाकर खाएं” (अथर्ववेद 6/135/2). उन्होंने शिक्षा दी है कि हम जो भी खाएं उसमें जल्दबाजी न करें. खूब चबा-चबा कर शांतिपूर्वक खाएं. उन्होंने हरि सब्जी, फल और अन्न आदि रसवर्धक पदार्थों के सेवन पर बल दिया है.

मिट्टी (पृथ्वी) और वनस्पति

अथर्ववेद के 12वें काण्ड में पृथ्वी का महत्त्व बताया गया है. इसमें सभी को पृथ्वी का पुत्र कहा गया है-“ माता भूमि: पुत्रो अहं पृथ्विय:

पृथ्वी के निर्माण के विषय में अथर्ववेद में कहा गया है कि “ भूमि चट्टान, पत्थर और मिट्टी है. “मैं उसी हिरण्यगर्भा पृथ्वी के लिए स्वागत-वचन बोलता हूँ”.नाना प्रकार के फल, औषधियाँ, फसलें, अनाज,पेड़-पौधे इसी मिट्टी पर उत्पन्न होए हैं. उनपर ही हमारा भोजन निर्भर है. अत: पृथ्वी का हम माता के समान आदर करें.आगे कहा गया है कि “भोजन और स्वास्थ्य देनेवाली सभी वनस्पतियाँ इस भूमि पर ही उत्पन्न होती हैं. पृथ्वी सभी वनस्पतियों की माता और मेघ पिता हैं; क्योंकि वर्षा के रूप में पानी बहाकर वह पृथ्वी में गर्भाधान करता है. पृथ्वी में विभिन्न प्रकार की धातुएं ही नहीं, बल्कि जल और खाद्यान्न, कंद-मूल भी पर्याप्त मात्र में पाए जाते हैं. चतुर मनुष्यों को उससे लाभ उठाना चाहिए.

आज हम अपनी मिट्टी के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं. काश हम इन महान ऋषियों की शिक्षा पर थोड़ा सा भी ध्यान दे देते तो आज हमे निगलने के लिए पर्यावरण संकट रुपी राक्षस का उदय नहीं होता. वैसे भी जहाँ से जागो वहीं से सवेरा है. अगर हम अब भी अपने पूर्वजों की शिक्षा को जीवन में उतार लें तो इस संकट से बच सकते हैं.


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