आर्गेनिक और आयुर्वेदिक खेती का भ्रम

आर्गेनिक और आयुर्वेदिक खेती का भ्रम

 जो कुदरत बनाती है इंसान नहीं बना सकता है। 

जैसे जैसे लोगों को पता चल रहा है की रासायनिक खाद और दवाओं से नुकसान होता है लोग कुदरती खान,पान दवाओं की और आकर्षित हो रहे हैं. लोगों के अंदर इससे होने वाली बीमारियाँ का भी पता चलता जा रहा है. इस का लाभ वैकल्पिक खान,पान और दवा बनाने वाले खूब उठा रहे हैं. अनेक लोग आयुर्वेदिक, ऑर्गनिक आदि की खेती करने लगे और दुकान चलाने लगे हैं. इस में कोई बुरी बात नहीं है किन्तु फसलो के उत्पादन के लिए जुताई करने से कोई भी फसल आयुर्वेदिक या ओरगनिक नहीं रहती है.  इन दोनों फसलों में ज्यादा नहीं मगर एक विशेष अंतर है.जुताई करने से बड़ी मात्रा में भूमि (आर्गेनिक खाद) का छरण होता है. लोग इस छरण की आपूर्ति के लिए रसायनों का इस्तमाल करते हैं इस से ये उत्पाद जहरीले हो जाते है.

    अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकारते हैं और वे खेती में गेर रासायनिक खाद और दवाओं का उपयोग कर रहे हैं. किन्तु ये कोई नहीं जनता है की हर बार जमीन की जुताई करने से खेत की आधी कुदरती शक्ति नस्ट हो जाती है. खेत कमजोर होते जाते हैं. कमजोर खेतों में कमजोर फसले पैदा होती है. इनमे रोग लगते हैं. जो रोग पैदा करती हैं. अनेक लोग आज क़ल रासयनिक खादों के विकल्प में गोबर और गोमूत्र से बनी खाद डालने की सलाह देते हैं. गोबर और गो मूत्र में नत्रजन होता है. इसका हल्का लाभ यूरिया की तरह दीखता है पीली कमजोर फसल हरी दिखने लगती है. किन्तु इस से खेतों की कमजोरी जहाँ की तहां ही रहती है. इस से निकलने वाली फ़सलें भी कमजोर रहती है. उनमे भी रोग लग जाते हैं.

   जंगलों में मिलने वाले कुदरती आंवले और खेतों में पैदा किए जा रहे आंवले में यही फर्क रहता है वे ताकतवर रहती है उनमे  रोग नहीं लगते हैं. उनके सेवन से रोग भाग जाते हैं. यही फर्क तुलसी और एलोवीरा में होता है. यही बिना जुताई की कुदरती खेती और जुताई वाली ओरगेनिक खेती से मिलने वाले खाद्यों में होता है. इसी प्रकार शहद है यदि मधुमखियों को पालने में रासयनिक या किसी गेर रासयनिक दवा का इस्तमाल  होता है तो भी वह शहद अपनी तासीर खो देता है. जहाँ तक मिलावट की बात है वह अलग है.

       जुताई नहीं करने से जमीन पर अनेक प्रकार की जैव विवधताओं के पनपने से और फसलों  के अवशेषों ,गोबर ,गोंजन ,पत्तियों आदि को जहाँ का तहां खेतों में लोटा देने से खेतों की ताकत बढती जाती है. फसलों की ताकत भी बढती जाती है. फ़सलें निरोगी पैदा होती हैं. इनका स्वाद और जायका अलग होता है. वे सही में स्वस्थ्वर्धक होती हैं.

  सवाल ये पैदा होता है की आम लोग सही आर्गेनिक,जैविक,कुदरती आयुर्वेदिक की पहचान कैसे करें ? हर कुदरती  खाद्य और दवाई का एक कुदरती स्वाद होता है इसकी पहचान करने के लिए स्वाद को पहचानना जरूरी है. मिर्ची में झाल होना चाहिए,करेले में कड़वाहट होनी चाहिए सब का अपना अपना  स्वाद जायका होता है.

आंवले से बनी दवाई में जंगली आंवले का जायका हर कोई पहचान सकता है. इसी प्रकार शहद है.
गाय का दूध भी गाय के खाने पर निर्भर रहता है. एक गाय को खूंटे पर बांध कर अनाज खिलाया जाता है. उसे अनेक प्रकार की दवाई पिलाई जाती है वो अधिक दूध देने लगती है पर उस का दूध स्वाद  और खुशबू खो देता है.

एक गाय खुले कुदरती चारागाह में अपने मन से चर कर जब घर आती है उस की आत्मा प्रसन्न हो जाती है. उस के दूध और घी  में जो स्वाद होता है. वह खूंटे पर बंधी गाय से कभी प्राप्त नहीं हो सकता है.
  
अनेक लोग हम से कहते हैं की हम शहरों में रहते है हमें असली कुदरती खान पान की चीजे कैसे मिले हम उन से कहते है की जब हम कुछ खरीदते हैं तब हम स्वाद का ध्यान रखें और उस किसान को प्रोत्साहित करें जो हमें अच्छा स्वदिस्ट कुदरती आहार लाकर देता है. विज्ञापन और सर्टिफिकेट की कोई गेरेंटी नहीं है.
   
  पहले हम सभी किसान थे अब किसान और उपभोगता अलग हो गए हैं. बिना जुताई की कुदरती खेती बहुत आसान है इस बच्चे भी आसानी से कर सकते है इस लिए इस के लिए थोड़ी सी जमीन चाहिए और बस कुछ मिनट प्रति दिन देने से हम अपना कुदरती खाना स्वं उगा सकते हैं. बिना जुताई की कुदरती  खेती का आधार कुछ मत करो है. यानि जुताई ,खाद और दवाओं की कोई जरुरत नहीं है.
आयुर्वेद कुदरती जीवन पद्धती है वह कोई डाक्टरी नहीं है उसी प्रकार जमीन की जुताई जैविक पद्धती नहीं है.
    
 हम सब  छुट्टियों में भी आराम से कुदरती खेती को कर के अपना आहार को स्वं पैदा कर सकते हैं.


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