कोरोना: टेंट हाउस वालों को अपने तम्बू उखड़ने का डर..  अजय बोकिल 

कोरोना: टेंट हाउस वालों को अपने तम्बू उखड़ने का डर..  अजय बोकिल
अजय बोकिल 
ajay bokilबड़ी विचित्र स्थिति है। आम आदमी और मप्र सरकार को फिर से कोरोना महामारी के प्रकोप का डर सता रहा है तो दूसरी तरफ ज्यादातर व्यवसायी संभावित लाॅक डाउन से घबराकर सामूहिक आत्महत्या की अनुमति सरकार से मांग रहे हैं। उनके लिए इधर कुआं, उधर खाई की हालत है। कारोबार चालू रखें तो कोरोना से मरने का खतरा और कारोबार बंद रखें तो भूख से मरने का डर। फेडरेशन ऑफ मध्यप्रदेश टेंट एसोसिएशन के सीनियर प्रेसीडेंट रामबाबू शर्मा ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर प्रदेश में पिछले साल जैसा लाॅकडाउन लागू कर सार्वजनिक समारोह पर बैन लगाया गया तो सभी टेंट व्यवसायी जहर खाकर आत्महत्या कर लेंगे।

हालांकि मुख्यमंत्री‍ शिवराजसिंह चौहान ने बार-बार कहा है कि प्रदेश में लाॅकडाउन केवल रविवार को ही रहेगा, लेकिन कई शहरों में नाइट कर्फ्यू के चलते शाम को होने वाले सामाजिक, धार्मिक आयोजन पर स्वत: ताला लग गया है। इनमें वो शादी समारोह भी शामिल हैं, जिनके लिए अमूमन टैंट, लाइट, साउंड, फ्लावर डेकोरेशन और कैटरिंग की जरूरत पड़ती है। टेंट उद्योग पिछले साल लगभग 6 माह चले पूर्ण और आ‍ंशिक लाॅकडाउन तथा कोरोना गाइड लाइन के कारण लगभग ठप हो गया था। परिणामस्वरूप टेंट हाउस मालिको के सामने फाकाकशी की नौबत आ गई थी। जैसे - तैसे ‍बीते साल नवंबर में हालत सुधरी थी तो अब अप्रैल आते - आते कोरोना की दूसरी लहर चालू होने से टेंट हाउस उद्योग की सांसे फिर थम जाने की आंशका है। 



इसका बड़ा कारण यह है कि टेंट हाउस उद्योग मूलत: समाज की उत्सवप्रियता और जश्न मनाने की चाहत पर ‍टिका और उसी पर पनपने वाला कारोबार है। अगर सभी लोग सादगी पर उतर आए तो देश भर के करीब 2 लाख से ज्यादा टेंट हाउस मालिकों और टेंट व मैरेज डेकोरेशन में लगे 35 लाख से अधिक लोग पेट कैसे पालेंगे ? यूं टेंट की जरूरतें तो कई कामो में पड़ती हैं। फौज और कई घुमंतू जनजातियो के पास तो परमनेंट लेकिन फोल्डिंग टेंट होते हैं। उनकी जिंदगी इसी में गुजरती है। टेंट दरअसल मनुष्य का एक अस्थायी घर है, जिसे जरूरत के मुताबिक सुविधाओ से लैस किया जाता है। 

मनुष्य की यह प्रवृत्ति आदिम काल से है। पाषाण युग में भी जो मनुष्य गुफाओ में नहीं रहते थे, वो बड़े पशुओ की हड्डियों और खाल से अपने लिए आश्रयस्थल बना लेते थे। इस किस्म का पहला टेंट खोजकर्ताओ को 40 हजार ईस्वी पूर्व का मिला है। सदियों में टेंट बनाने की कला भी विकसित हुई और आज भारत सहित दुनिया के कई देशों में इतनी बेहतरीन क्वालिटी और रूपाकार के टेंट ‍मिलते हैं कि एक बारगी आप का मन भी अपना घर छोड़कर कुछ समय उस टेंट में बिताने के लिए मचल जाए। हालांकि यह टेंट बहुत मंहगे होते हैं।



आम आदमी का टेंट हाउस से साबका खुशी और गमी के मौके पर ही पड़ता है। शादी इसका अहम हिस्सा है। या यूं कहे कि घर के सामने लगा टेंट आपके यहां किसी विशिष्ट आयोजन की गवाही दूर से ही दे देता है। शामियाने का तनना ही उत्सव की निशानी है। चंद घंटों या ‍दिनों के लिए आप वो तमाम सुविधाएं टेंट या शामियाने के जरिए जुटाते हैं। अगर बात शादी, जन्मदिन की पार्टी या ऐसे ही किसी अन्य उत्सव की हो तो लोग हाथ खोल कर खर्च करते हैं। टेंट हाउस वालों को भी ऐसे लोग ज्यादा पसंद होते हैं। सरकारी समारोह में टेंट लगाने, सजाने और उसका ठेका हासिल करने की तो अलग ही दुनिया है।


बहरहाल मप्र के टेंट हाउस मालिकों की आशंका निराधार नहीं है। कारण कि राज्य में कोरोना पाॅजिटिव और इससे होने वाली मौतों का ग्राफ फिर बढ़ना शुरू हो गया है। टेंट हाउस मालिकों ने चेतावनी दी है कि अगर राज्य में 1 अप्रैल से 21 जून तक शादी व अन्य समारोहों पर रोक लगा दी तो वो इसे सहन नहीं करेंगे। क्योंकि यही शादियों का पीक सीजन है। पिछले साल इन्हीं दिनों में लाॅकडाउन के उनके धंधे को भी लाॅकडाउन कर दिया था। अगर इस बार भी शादियों आदि में टेंट आदि नहीं लगे तो टेंट हाउस वालों के ही तम्बू उखड़ जाने की आशंका है। उधर सरकार के सामने भी ज्यादा विकल्प नहीं है। 

उसकी कोशिश यही है, और जो सही भी है कि लोगो का जमाव किसी तरह से रोका जाए। सामूहिक समारोहों में लोग इकट्टा होंगे तो संपर्क बढ़ेगा और यह संपर्क ही कोरोना को फैलने में और ताकत देता है। टेंट लगाए ही इसलिए जाते हैं कि आए हुए मेहमान सुविधा से बैठ सकें। बतिया सकें। एक लग्जरी अहसास कर सकें। जीवन की आपाधापी के बीच कुछ पल चकाचौंध में बिता सकें। हकीकत में टेंट आपके स्थायी आशियाने का अस्थायी विस्तार ही है। ध्यान रहे कि बीते दिसंबर से सरकार ने सामाजिक आयोजनों में कुछ ढील यह सोचकर दी थी कि अब कोरोना की विदाई की वेला है। काम धंधे की ठप पड़ी गाड़ी को पटरी पर लाना भी जरूरी था। हालात कुछ सुधरे भी, लोगों की दिनचर्या लौटने भी लगी थी कि कोरोना की दूसरी लहर ने दांत दिखाना शुरू कर दिया है। उधर वैक्सीन आ जाने के बाद लोगों ने भी कोरोना से डरना मानो बंद ही कर दिया है। संक्रमित लोग भी बेखौफ घूम रहे हैं। परिणामस्वरूप कोरोना फिर विकट स्थिति की और बढ़ रहा है। 


पिछले साल कोरोना लाॅकडाउन और अनलाॅक में भी लाखो लोगों के रोजगार छिन गए थे। उनमें से कुछ को ही पुराना या नया काम मिल सका था। सबसे गहरी मार टेंट और शादी उद्योग पर पड़ी थी। क्योंकि टेंट और शादी उद्योग में लगे लोगों का पेट भले ही इस धंधे के चलने पर टिका हो, लेकिन वह आम आदमी की बुनियादी जरूरत में श‍ामिल नहीं है। लिहाजा पूर्व से नियोजित शादी व अन्य समारोहों को स्थगित करना पड़ा। जो एडवांस दे चुके थे, उनमें से कई को पैसा आज तक वापस नहीं मिला। टेंट और शादी उद्योग वालों का कहना था कि उनके पास लौटाने के लिए भी पैसा नहीं है। ज्यादातर ने अपने कर्मचारियों की भी छुट्टी कर दी। टेंट लगाने वालों के साथ साथ लाइट, साउंड, फ्लावर डेकोरेशन, घोड़ी वाले, बैंड वाले, पंडित, केटरर, होटल वाले, आभूषण वाले, ड्रेस वाले सब के सामने लाचारी और भुखमरी की स्थिति आन पड़ी। 


सरकार के सामने भी विकल्प बहुत सीमित है। वह लोगों को जान बचाए कि लोगों का डूबता व्यवसाय बचाए। दरअसल कोरोना महामारी ही ऐसी है कि जिसके व्यवहार और प्रभाव का सही - सही अंदाज किसी को नहीं है। वह व्यक्ति को ही नहीं ग्रसती, पूरे सिस्टम को भी निगलने की ताकत रखती है। टेंट हाउस मालिकों द्वारा जहर खा लेने की चेतावनी प्रतीकात्मक विरोध हो सकता है, लेकिन उसकी प्रामाणिकता पर संदेह नहीं होना चाहिए। जो व्यवसाय और कारोबार हमारी उत्सवजीविता पर टिके हों, वो मनुष्य को घर में कैद रहने की मजबूरी कैसे जिंदा रहें। उपभोक्तावादी और उत्सवप्रिय जीवन शैली में कई बार फिजूलखर्ची का आडंबर भले होता हो, लेकिन वह लाखों लोगों के पेट को रोटी मुहैया कराती है, इसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।


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