संस्कृति और संस्कार : भारत की रीढ़

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स्वतन्त्रता-प्राप्ति के साथ भारतीय संस्कृति की रक्षा और उसके प्रचार की चर्चा चल पड़ी-यह बड़ी प्रसन्नता की बात है। वास्तव में किसी देश या राष्ट्र का प्राण उसकी संस्कृति ही है; क्योंकि यदि उसकी कोई अपनी संस्कृति नहीं, तो संसार में उसका अस्तित्व ही क्या। परंतु संस्कृति का क्या अर्थ है और भारतीय संस्कृति क्या है-यह नहीं बतलाया जाता। अंग्रेजी शब्द 'कलचर' का अनुवाद संस्कृति किया जाता है। परंतु 'संस्कृति' संस्कृत भाषा का शब्द है, अत: संस्कृत- व्याकरण के अनुसार ही इसका अर्थ होना चाहिये। 'सम्' उपसर्ग पूर्वक 'कृ' धातु से भूषण अर्थ में 'सुट' आगमपूर्वक 'क्तिन्' प्रत्यय होने से 'संस्कृति' शब्द सिद्ध होता है। इस तरह लौकिक, पारलौकिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनैतिक अभ्युदय के उपयुक्त देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादिकी भूषणभूत सम्यक् चेष्टाएँ एवं हलचलें ही संस्कृति हैं। संस्कृति और संस्कार

'संस्कार' या 'संस्करण' का भी संस्कृति से  मिलता-जुलता अर्थ होता है। संस्कार दो प्रकार के होते हैं-'मलापनयन' और 'अतिशयाधान'। किसी दर्पण पर कोई चूर्ण घिसकर उसका मल साफ करना 'मलापनयन संस्कार' है। तेल, रंगद्वारा हस्ती के मस्तक या काष्ठ की किसी वस्तु को चमकीला तथा सुन्दर बनाना 'अतिशय धान संस्कार' है। नैयायिकों की दृष्टि से वेग, भावना और स्थितिस्थापक-ये ही त्रिविध संस्कार हैं। अनुभवजन्य स्मृतिका हेतु ' भावना' है। अन्यत्र किसी भी शिल्पादि में बार-बार अभ्यास करने से उत्पन्न कौशल की अतिशयता ही भावना मानी गयी है

तत्तज्जात्युचिते शिल्पे भूयोऽभ्यासेन वासना। 

कौशलातिशयाख्या या भावनेत्युच्यते हि सा॥

समान अवस्था के स्वाश्रयकी प्रोद्भूत अवस्थान्तरोत्पादक अतीन्द्रिय धर्म ही 'संस्कार' है। स्वाश्रयस्य प्रागुद्भूतावस्थासमानावस्थान्तरोत्पाद कोऽतीन्द्रियो धर्मः संस्कारः। योगियों की दृष्टिमें न केवल मानस संकल्प, विचार आदि से ही, अपितु देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि की सभी हलचलों, चेष्टाओं, व्यापारों से संस्कार उत्पन्न होते हैं। अतएव 'कर्म संस्कार' या 'कर्म वासना' शब्द से उनका व्यवहार होता है। इस दृष्टि से सम्यक् असम्यक् सभी प्रकार के कर्मों के संस्कार उत्पन्न होते हैं।
संस्कारों का प्रभाव

16 Sanskar | हिन्दू धर्म के पवित्र सोलह ...संस्कारों से आत्मा या अंतःकरण शुद्ध होता है। इसलिये उत्तम और निकृष्ट संस्कार- इस रूप से संस्कारों में उत्कृष्टता या निकृष्टताका भी व्यवहार होता है। षोडश एवं अष्टचत्वारिंशत् संस्कार द्वारा आत्मा अथवा अन्तःकरण को संस्कृत करना चाहिये-यह भी शास्त्र का आदेश है

यस्यैते अष्टचत्वारिंशत् संस्कार भवन्ति स ब्रह्मणः सायुज्यं सलोकतां प्राप्नोति।

यहाँ 'सम्' की आवृत्ति करके 'सम्यक् संस्कार' को ही संस्कृति कहा जाता है। इन सम्यक् संस्कारों का पर्यवसान भी मलापनयन एवं अतिशयाधान में होता है। कुछ कर्मों द्वारा पाप, अज्ञानादिका अपनयन और कुछद्वारा पवित्रता, विद्या आदि अतिशयता का आधान किया जाता है। साधारण: दार्शनिकों के यहाँ यह सब आत्मा में होता है, पर वेदान्त की दृष्टि से अंत:करण में। आत्मा तो सर्वथा असंग ही रहता है। मोटे तौरपर कह सकते हैं कि जैसे खान से निकले हुए हीरक एवं मणि आदि में संस्कार द्वारा चमक या शोभा बढ़ायी जाती है, वैसे ही अविद्या-तत्त

संस्कृति

हमारी संस्कृति हमारी पहचान - Person Idea

 

शोभा संस्कार द्वारा व्यक्त की जाती है तथा च आत्मा को प्राकृत निम्न स्तरों से मुक्त करके क्रमेण परी स्तरों से सम्बन्धित करने या प्रकृति के सभी स्तरों से मुक्त करके उसे स्वाभाविक अनन्त आनन्द साम्राज्य सिंहासन पर समासीन करने में आत्मा का संस्कार है। ऐसे संस्कारों के उपयुक्त कृतियाँ ही ‘संस्कृति’ शब्द से कही जा सकती हैं। जैसे वेदोक्त कर्म और कर्मजन्य अदृष्ट दोनों ही ‘धर्म’ शब्द से व्यवहत होते हैं, वैसे ही संस्कार और संस्कारोपयुक्त कृतियाँ दोनों ही ‘संस्कृति’ शब्द से कही जा सकती हैं। इस तरह सांसारिक निम्नस्तर की सीमाओं में आबद्ध आत्मा के उत्थानानुकूल सम्यक् भूषण भूत कृतियाँ ही ‘संस्कृति’ हैं।

संस्कृति और सभ्यता संस्कृति और सभ्यता में कोई भी खास अन्तर नहीं है। सम्यक्कृति ही संस्कृति है और सभा में साधुता ही सभ्यता है। आचार-विचार, रहन-सहन, बोलचाल आदिकी सम्यक्ता या साधुता का निर्णय शास्त्र से ही हो सकता है। वेदादि शास्त्रों द्वारा निर्णीत सम्यक् एवं साधु चेष्टा ही सभ्यता है और वही संस्कृति भी है। विभिन्न संस्कृतियाँ , विभिन्न देशों और जातियोंकी विभिन्न संस्कृतियाँ प्रसिद्ध हैं। संस्कृत में प्रायः संघर्ष भी चलता है कहीं तो संस्कृति की खिचड़ी बन जाती है और कहीं एक सबल संस्कृति निर्बल संस्कृति का विनाश कर देती है। संस्कृति की भूमि के साथ सम्बन्ध होनेसे ही उसमें विभिन्नता आती है।


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