भारत और मिश्र की संस्कृति…..! रावण की त्रैलोक्य विजय-24

भारत और मिश्र की संस्कृति…..!

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रावण की त्रैलोक्य विजय -24 

आर्य और अनार्यों की चर्चा में ढूंढ़ तलाश करते हुए अनेक तथ्य उद्घाटित होने लगे। जैसा कि ज्ञात है कि सृष्टि के निर्माण काल से ही सत्य सनातन धर्म का अस्तित्व है। सनातन अर्थात प्राकृतिक धर्म। सूर्य,पृथ्वी,आकाश,वायु और जल, यही तत्व तो सत्य हैं। किसी भी पंथ को मानने वाला, शक्तिशाली से शक्तिशाली ऐसा कौनसा व्यक्ति हो सकता है -जो इन पांच तत्वों में से किसी एक तत्व के बिना जीवित रह सकता है...!इन पंच महाभूतों में से किसी एक के बिना तो आकाश में विचरण करने वाले पतंगे और पक्षी भी फडा़फड़ कर नीचे आ गिरेंगे।इंद्र द्वारा हनुमान जी को बज्र मारने की घटना को सुनकर ही प्राणीमात्र विकल हो जाता है। पवन देव द्वारा स्वयं को बहने से क्या रोका गया था कि पलों में ही त्राहिमाम होने लगा।

सनातन (सत्य )धर्म से पंथों का निकलना प्रारंभ हुआ। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि पहिले पहल सनातनियों से जरुस्थत्र अलग हुए।यह तो सर्वविदित है कि विश्व के सभी पंथ ऐशिया महाद्वीप से ही उद्भुत हैं । जरुस्थत्र को पारसी लोग कृष्ण की तरह कनकाभ का अवतार मानते हैं, जिसको दुष्ट दलन के लिए ईश्वर ने पृथ्वी पर भेजा है।

पारसियों के धार्मिक ग्रंथ की अधिकांश मान्यतायें ऋग्वेद की भावनाओं से मेल खाती हैं। फिर सनातन धर्म से यहूदी नामक, सबसे पहले जो पंथ छिटका ...! उसके संबंध में जानकारियां चौकाने वाली हैं। दुनिया में अति तीव्र गति से फैले ईसाई और इस्लाम धर्मों का
मूल स्रोत और मूल पुरुष तो यहोवा ही हैं। इन्हीं यहोवा की संतान इब्राहिम ने सबसे पहले मूर्ति पूजा का विरोध किया। एकेश्वरवाद के प्रणेता भी इब्राहिम ही हैं। प्रश्न यह है कि यह यहूदी अंततः थे कौन...! और आये कहां से..!

तो सृष्टि के प्रारंभ से ही आर्यों के पूर्वजों का अस्तित्व है। उसका प्रमाण हमारी काल गणना "मनवन्तर काल "एक पुख्ता आधार है। तो क्या कोई भारतीय या फिर कोई सनातनी ही यहूदियों का आदि पुरुष है...! तो कहा जा सकता है... हां.. अवश्य। काम सूत्र का श्लोक है -दक्षिणात्यानां लिंगस्य कर्णयोरिव व्यधनं बालस्य। "दक्षिण (भारत) के लोग खतना करवाते हैं। बाइबिल में लिखा है कि यहूदियों में सबसे पहला खतना यहोवा के वंशज याकूब का हुआ था। मुसलमान तो उस प्रथा को आगे बढा़ये हुए हैं।

प्रश्न यहीं से उठता है कि आखिरकार यहूदियों, खतना और दक्षिण भारत के बीच संबंध क्या है। 13 अक्टूबर 1930 और 19 मार्च 1931 में क्रमशः लीडर और फ्री प्रेस में प्रकाशित तथ्य स्पष्ट संकेत करते हैं कि इन तीनों बातों में आपसी घनिष्ठ संबंध है। श्रीयुत सुब्रमण्यम अय्यर के पुत्र रामास्वामी अय्यर लिखते हैं कि सीरिया प्रदेश के" कोल" निवासी एक कोल ने ऐरिस्टोटल (अरस्तू) से कहा था कि यहूदी लोग दक्षिण भारत के निवासी हैं। अरस्तू के प्रसिद्ध शिष्य कलियरक्स के लेख से सिद्ध होता है कि यहूदी लोग पहले तमिल भाषा ही बोलते थे। हिब्रू में ग्रीक शब्दों के मिल जाने से ही उसका यह रूप बना।

तमिल भाषा ही हिब्रू भाषा की जननी है। यहूदियों के इतिहास लेखक 'जोजक्स' के लेख से प्रतीत होता है कि पूर्वकाल में गुजरात प्रदेश द्राविड़ों के नियंत्रण में था। और गुजरात का पालीताणा नगर तामिलनाडू के आधीन था।

यही कारण है कि दक्षिण से दूर जाकर भी यहूदियों ने पालिताणा के नाम से ही पैलेस्टाइन नाम का नगर बसाया। इस प्रकार गुजरात का पालीताणा ही पैलेस्टाइन हो गया। गुजरात का पालीताणा जैनों का प्राचीन और प्रमुख प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। प्रतीत होता है कि ईसा मसीह ने पालीताणा में आकर बाइबिल लिखित 40 दिन के जैन उपवास द्वारा जैन शिक्षा का लाभ लिया अब मैं उस मिश्र (इजिप्ट) देश की ओर लौटता हूं ,जहां की सभ्यता को विश्व की चार महान संस्कृतियों -भारत, चीन, यूनान और मिश्र में से एक बताया गया है । मिश्र की महानता की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर मैंने मेरे पुस्तकागार के उपलब्ध ग्रंथों का पुनः पुनः अध्ययन किया तो स्पष्ट होने लगा कि मिश्र की पूरी संस्कृति और संस्कारों का आधार ही भारत है। भारतीय देवी, देवता और पूजन पद्धतियों में मूलभूत अंतर नहीं था। यह बात आज से सौ वर्ष पूर्व सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, रामलीला मैदान, दिल्ली द्वारा प्रकाशित वैदिक संपत्ति नामक पुस्तक से पूर्णतः प्रमाणित होती है।

मिश्र, को संस्कृत नाम वाला देश कहा गया है। मिश्र के राजा बाणासुर से लेकर उसके पूर्वज राजा बलि तक की रोचक कथायें हैं।रामायण काल की बात है, प्रसिद्ध योद्बा बाण की एक पुत्री का विवाह कुंभकर्ण से हुआ था। इसका शुद्ध कारण राजनैतिक समझ में आता है। हमारे पुराण कहते हैं कि बाण की शिव जी से प्रगाढ़़ मित्रता थी। और उसके आग्रह पर शिव जी मिश्र की राजधानी शोणितपुर में ही रहते थे। चूंकि रावण भी शिव जी जैसी महाशक्ति के मर्म को समझ चुका था,अतः सीता स्वयंवर में शामिल होने पहुंचे बाण से रावण ने मित्रता कर ली। तब रावण भी छद्मभेष में ताटका की मृत्यु के समय बिहार के जिला शाहाबाद स्थित सैन्य शिविर में पहुंचा था। वहीं से सोनभद्र को पार करके रावण मिथिला भी गया। और बाणासुर से उसने परिचय किया।

हम मिश्र की इस कथा का बहुत विस्तार से वर्णन करेंगे। किंतु उसके पूर्व यह भी समझ लेते हैं कि इजिप्त का अर्थ क्या है...? इजिप्त को कमित, हपि और मिश्र कहा जाता था। कमित कुमृत का अपभ्रंश है। मृत (मृद, मृदा) मिट्टी को कहा जाता है। अतः कुमृत का अर्थ हुआ काली मिट्टी। यह नाम हमारी गंगा की तरह मिश्र की जीवन रेखा नदी 'नील'के नाम पर ही रखा गया है। नील नदी की काली मिट्टी पर ही इजिप्ट बसा है। इसीलिए उसका नाम कुमृत है। हपि शब्द अप का अपभ्रंश है। और अप (आब) जल को कहते हैं। मिश्र की इस नदी का नाम नील ही क्यों प्रसिद्ध हुआ। मिश्र के प्रसिद्ध पिरामिडों में इमली के प्रयोग का भारत से क्या संबंध है। हमारे नवरात्र, कामाख्या देवी की पूजा और ऐसी ही अनेक धार्मिक मान्यताओं का क्या प्रभाव रहा मिश्र में, सब कुछ जानेंगे। लेकिंन अब आज नहीं। आगे इस पर रोचक चर्चा करेंगे। तो मिलते हैं कल प्रातः।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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