भारत में लोकतंत्र तबसे, जब पश्चिम में यह नाम तक नहीं था, नयी पीढी को तथ्यों से अवगत कराना ज़रूरी -पी.नरहरि और पृथ्वीराज

भारत में लोकतंत्र तबसे, जब पश्चिम में यह नाम तक नहीं था

नयी पीढी को तथ्यों से अवगत कराना ज़रूरी

-पी.नरहरि और पृथ्वीराज
भारत में लोकतंत्र तब से अस्तित्व में है, जब पश्चिम ने इस शब्द की इजाद तक नहीं की थी. भारत का नाम सम्राट भरत के नाम पर “भारतवर्ष" पड़ा. उनके नौ पुत्र थे. जब सम्राट भरत ने राजपाट त्यागने का विचार किया, तो उन्होंने सभी पुत्रों की परीक्षा ली और उनके गुण-दोषों का व्यापक रूप से विश्लेषण किया. उन्होंने इस विषय में पुत्रों के गुरुजन और मंत्रियों से चर्चा की. प्रजा की भी राय जानी. लेकिन निष्कर्ष में उन्होंने अपने किसी भी पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनने योग्य नहीं पाया.

उस समय ऐसी परम्परा थी कि राजा के सबसे बड़े पुत्र को राजगद्दी पर बैठाया जाता था. लेकिन भरत को लगा कि प्रजा की भलाई सुनिश्चित करना ही उनका सबसे बड़ा धर्म है. उन्होंनेजो निर्णय लिया उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक रहा.

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उनका निर्णय लिया आने वाली पीढ़ियों के लिए नजीर बन गया. उन्होंने ऋषि भारद्वाज के पुत्र भूमन्यु को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर उसे अपने परिश्रम से स्थापित और विकसित विशाल साम्राज्य का युवराज बना दिया. उन्ही के वंश में भीष्म, पांडवों और कौरवों का जन्म हुआ.

अंग्रेजों का षड्यंत्र 

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लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, भारत की समृद्ध विरासत और इसके गौरवशाली अतीत पर खतरा मंडराने लगा. ऐसा किसी बाहरी प्रभाव के कारण नहीं, बल्कि अपनी मूल सांस्कृतिक धारा और प्रवृति में आस्था की कमी के कारण हुआ. अफ़सोस की बात है कि जिस देश ने दुनिया को इतना कुछ दिया, वह आज उस नाम से जाना जाता है, जो विदेशियों ने उसे दिया. अंग्रेज लोगों को गुलाम बनाने और उन पर नियंत्रण करने का बहुत चालाकी भरा तरीका अपनाते थे. वह तरीका यह था कि जिन लोगों पर राज करना हो, उनसे उनकी पहचान छीन ली जाए. ऐसा होते ही उन पर सफलतापूर्वक शासन करने में कोई मुश्किल नहीं आयेगी, क्योंकि वे लोग प्रतिरोध या संघर्ष ही नहीं करेंगे. उन्हें अपने वास्तविक अतीत, संस्कृति और इतिहास से दूर कर वह सिखा-पढ़ा दो जो आप पढ़ाना चाहते हैं. अंग्रेजों ने यही हमारे साथ भी किया. उन्होंने हरचंद कोशिश की कि हम न केवल अपनी जड़ों से उखड़ जाएँ, बल्कि अपनी संस्कृति पर शर्मिन्दा होने लगे.

गलत तथ्य पेश किये 

अंग्रेज़ विद्वान बहुत चतुराई से वैकल्पिक तथ्यों की ऐसी बारूदी बौछार की, जिसमें भारत को एक बहुत क्रूर जाति व्यवस्था वाले, ऐसे देश के रूप में पेश किया गया, जहाँ सिर्फ भभूति लपेटे हुए सन्यासी लोगों को धर्म के नाम पर ठगते थे और अनपढ़ लोग अंधविश्वासों के गर्त में डूबे थे. सभवतः उत्कृष्ट भारत के बारे में ऐसा गलत प्रचार करते समय वे या तो वैदिक जान को ठीक से समझ नहीं पाये या फिर उन्होंने इसकी जानबूझकर अनदेखी की.

अंग्रेजों ने भारत को एक ऐसे देश के रूप में पेश किया, जहाँ बीमारियों का इलाज अवैज्ञानिक तरीकों से किया जाता है. अंग्रेज़ या तो वास्तविकता जानते नहीं थे या फिर इतने धूर्त थे कि उन्होंने सुश्रुत पतंजलि. चरक जैसे महान आयुर्वेदाचार्यों की समृद्ध विरासत को दरकिनार कर दिया. जबकि इन महान आचार्यों के नाथ आज भी चिकित्सा के क्षेत्र में हमारे ज्ञान के सोत हैं.

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एक बड़ा झूठ 

अंग्रेज एक और यह झूठ हमारी शिक्षा व्यवस्था तथा सामाजिक परिवेश में प्रवेश कराने में सफल हो गये, कि उनके के आने से पहले भारत था ही नहीं. उन्होंने भारतीयों को यह विश्वास दिला दिया कि यह देश तो सिर्फ ऐसी विभिन्न संस्कृतियों का एक समूह था जो एक भू-भाग पर आपस में बहुत वैमनस्य के साथ रहती थीं. अंग्रेजों के शासन की बदौलत ही भारत एक राष्ट्र का रूप ले सका. अंग्रेजों ने यह बात भी खूब प्रसारित की कि उनके ही कारण विभिन्न उत्पतियों और संस्कृतियों वाले लोग एक राष्ट्र के रूपमें संगठित होकर शांतिपूर्वक एकसाथ रहने लगे.

हालाकि यह बात भारत में अंग्रेजों की हुकूमत को हमेशा कायम रखने के लिए प्रचारित की गयी थी, लेकिन इसका असर इतने वर्षों बाद भी महसूस किया जा सकता है. आजादी के 72 वर्ष बाद भी,  उपनिवेश बनने से पहले का भारत हमारे समाज के शिक्षित अभिजात लोगों के बीच चर्चा का एक प्रिय विषय बना हुआ है. आजादी के बाद भारत ने एक देश के रूप में अनेक वैज्ञानिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनायी.

नयी पीढी का भटकाव

लेकिन आज़ादी के बाद जन्म लेने वालीपीढ़ी को लगता है कि वर्तमान भारत सिर्फ ब्रिटिश उपनिवेश की छोड़ी हुयीजूठन है, उनके मन में पश्चिमी ज्ञान के प्रति जो निष्ठा गहराई से पैठ गयीहै, उसके चलते वे कभी भारतीय होने में गर्व का अनुभव नहीं कर पाएँगे.

लिहाजा, उनके मन में भारतीयता पर गर्व का भाव जगाने के लिए, सबसे पहले उनके सामने यह सिद्ध करना होगा कि अंग्रेजों के आने से पहले भी भारत था. अंग्रेजों ने बहुत लम्बे समय के बाद उसे सिर्फ राजनैतिक रूप से एकीकृत किया था. भारत में एकात्मकता का भाव हमेशा सेमौजूद रहा था. विष्णु पुराण के एक श्लोक के अनुसार, उत्तर में हिमालय सेदक्षिण में समुद्र तक रहने वाले सभी लोग सम्राट भारत के वंशज हैं. वे स्वयंको एक परिवार मानते हैं और उस उपमहाद्वीप के बाहर से आने वाले किसी भीव्यक्ति को म्लेच्छ कहा जाता था. )

(पुस्तक The Great Tale of India के अंश. प्रस्तुति- दिनेश मालवीय)

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