भक्तामर स्तोत्र की रचना

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भक्तामर स्तोत्र की रचना कब हुई, कैसे हुई और क्यों हुई, कैसे पढ़े, कब पढ़े और किस तरह पढ़े, आदि सब जाने |

भक्तामर स्तोत्र कीे रचना श्री मानतुंग आचार्य जी ने की थी, इस स्तोत्र का दूसरा नाम आदिनाथ स्रोत्र भी है, यह संस्कृत में लिखा गया है, प्रथम अक्षर भक्तामर होने के कारण ही इस स्तोत्र का नाम भक्तामर स्तोत्र पड गया, ये वसंत-तिलका छंद में लिखा गया है।


भक्तामर स्तोत्र में 48 श्लोक है , हर श्लोक में मंत्र शक्ति निहित है, इसके 48 के 48 श्लोको में “म“ “न“ “त“ “र“ यह चार अक्षर पाए जाते है!

वैसे तो जो इस स्तोत्र के बारे में सामान्य ये है की आचार्य श्री मानतुंग जी को जब राजा हर्षवर्धन ने जेल में बंद करवा दिया था तब उन्होंने भक्तामर स्तोत्र की रचना की तथा 48 श्लोको पर 48 ताले टूट गए! अब आते है इसके बारे में दुसरे तथा ज्यादा रोचक तथा पर,जिसके अनुसार आचार्य श्री मानतुंग जी ने जेल में रहकर में ताले तोड़ने के लिए नहीं अपितु सामान्य स्तुति की है भगवन आदिनाथ की तथा अभी 10 प्रसिद्ध विद्वानों ने ये सिद्ध भी किया प्रमाण देकर की आचार्य श्री जी राजा हर्षवर्धन के काल ११वी शताब्दी में न होकर वरन 7वी शताब्दी में राजा भोज के काल में हुए है तो इस तथा अनुसार तो आचार्य श्री 400 वर्ष पूर्व होचुके है राजा हर्षवर्धन के समय से !

भक्तामर स्तोत्र का अब तक लगभग 130 बार अनुवाद हो चुका है बड़े बड़े धार्मिक गुरु चाहे वो हिन्दू धर्मं के हो वो भी भक्तामर स्तोत्र की शक्ति को मानते है तथा मानते है भक्तामर स्तोत्र जैसे कोई स्तोत्र नहीं है!, अपने आप में बहुत शक्तिशाली होने के कारण यह स्तोत्र बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हुआ! यह स्तोत्र संसार का इकलोता स्तोत्र है जिसका इतनी बार अनुवाद हुआ जो की इस स्तोत्र को प्रसिद्ध होने को दर्शाता है !

भक्तामर स्तोत्र के पढने का कोई एक निश्चित नियम नहीं है, भक्तामर को किसी भी समय प्रातः, दोपहर, सायंकाल या रात में कभी भी पढ़ा जा सकता है, कोई समय सीमा निश्चित नहीं है, क्योकि ये सिर्फ भक्ति प्रधान स्तोत्र है जिसमे भगवन की स्तुति है, धुन तथा समय का प्रभाव अलग अलग होता है!

भक्तामर स्तोत्र का प्रसिद्ध तथा सर्वसिद्धिदायक महामंत्र – — ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं श्री वृषभनाथतीर्थंकराय्‌ नमः

48 काव्यों के 48 विशेष् मन्त्र भी हैं!!

48 काव्यो की महत्ता:-

1सर्वविघ्न विनाशक काव्य
2सर्व विघ्न विनाशक काव्य
3सर्व सिध्दि दायक काव्य
4जल जंतु भय मोचक काव्य
5नेत्र रोग समहारक काव्य
6सरस्वती विद्या प्रसारक काव्य
7 सर्व संकट निवारक काव्य
8 सर्वारिष्ट योग निवारक काव्य
9भय पाप नाशक काव्य
10कुकर विष निवारक काव्य
11 वांछा पूरक काव्य
12 वांछित रूप प्रदायक काव्य
13लक्ष्मी सुख दायक काव्य
14आधी व्याधि नाशक काव्य
15 राज वैभव प्रदायक काव्य
16 सर्व विजय दायक काव्य
17सर्व रोग निरोघक काव्य
18शत्रु सैन्य स्तम्भक काव्य
19पर विद्या छेदक काव्य
20संतान सम्पति सौभाग्य प्रदायक काव्य
21सर्व सॉख्य सौभाग्य साधक काव्य
22भुत पिशाच बाधा निरोधक काव्य
23 प्रेत बाधा निवारक काव्य
24शिरो रोग नाशक काव्य
25दृष्टि दोष निरोधक काव्य
26पर्सव पीड़ा विनाशक काव्य
27शत्रु उन्मूलक काव्य
28अशोक वृक्ष प्रतिहार्य काव्य
29सिंहासन प्रतिहार्य काव्य
30 चामर प्रतिहार्य काव्य
31छत्र प्रतिहार्य काव्य
32 देव दुंदुभी प्रतिहार्य काव्य
33पुष्प वृष्टि प्रतिहार्य काव्य
34भामंडल प्रतिहार्य काव्य
35 दिव्य धवनि प्रतिहार्य काव्य
36लक्ष्मी प्रदायक काव्य
37 दुष्टता प्रतिरोधक काव्य
38 वैभव वर्धक काव्य
39सिंह शक्ति संहारक काव्य
40सर्वाग्नि शामक काव्य
41भुजंग भय भंजक काव्य
42यूद्ध भय विनाशक काव्य
43 सर्व शांति दायक काव्य
44सर्वापधि विनाशक काव्य
45जलोद्रादि रोग विनाशक काव्य
46बंधन विमोच काव्य
47अश्त्र शस्त्र निरोधक काव्य
48मोक्ष लक्ष्मी दायक काव्य.


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