धन के उपभोग पर क्या कहती है रामचरितमानस, कैसे होता है धन का नाश -दिनेश मालवीय

धन के उपभोग पर क्या कहती है रामचरितमानस
कैसे होता है धन का नाश
-दिनेश मालवीय
पिछले युगों के बारे में तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनके विषय में हमें जो जानकारी मिलती है उसका आधार शास्त्र ही हैं,लेकिन वर्तमान युग में हमारे सामने सब कुछ प्रत्यक्ष घटित हो रही है. आज हम जिस समय में जी रहे हैं, उसे शास्त्रों में कलयुग कहा गया है. इसमें सबसे बड़ी बात है वह है धन की प्रधानता. हम अपने चारों ओर जब देखते हैं, तो हमें हर इंसान धन की ओर दौड़ता हुआ दिखता है. इसी कारण इसे अर्थयुग या अर्थप्रधान युग भी कहा जाता है.

जहाँ तक धन कमाने और उसे संचित करने की बात है, तो इसमें कुछ बुराई नहीं है. धन हर किसीकी अहम ज़रूरत है. धन के बिना जीवन का कोई काम नहीं हो सकता. न परिवार का पालन हो सकता, न देश और समाज की प्रगति हो सकती और न धर्म से सम्बंधित कोई अनुष्ठान ही हो सकता. इस प्रकार धन हर किसीके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है. जीवन के चार पुरुषार्थों में अर्थ शामिल है.

धन कमाने और उसके संचय में कोई बुराई नहीं है. यह बुराई तब बन जाती है, जब हम इससे मनोग्रस्त यानी obsessed हो जाते हैं. हमें लगता है कि जीवन का उद्देश सिर्फ धन कमाना है. इसने एक बहुत बड़े मनोरोग का रूप ले लिया है. बड़ी संख्या में ऐसे लोग देखने में आते हैं, जिनके पास इतनी अथाह संपत्ति है कि उनकी आने वाली कई पीढियां कुछ न भी करें, तो बहुत सुख से जी सकती हैं. लेकिन फिर भी वे कमाते चले जा रहे हैं. चलिए, यह भी सही है. 

किसी के घर में अगर घी बनता है तो वह जाकर कोई पहाड़ पर थोड़े ही पोत आता है. किसीके घर में दूध बहुत होता है तो वह दूध से नहाने थोड़े ही लगता है. इस प्रकार धन कमाना और उसका संग्रह करना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है. यह बुरी बात तब हो जाती है, जब इसके लिए बईमानी की जाती है, चोरी की जाती है, ठगी की जाती है, झूठ का सहारा लिया जाता है, किसी भी तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं. किसीने कहा है कि इंसान ज़िन्दगी भर जीने की तैयारी में लगा रहता है और कभी जी ही नहीं पाता.
Money (1)धन कमाना बहुत आसान नहीं होता. इसके लिए बहुत मेहनत और कुशलता की ज़रूरत होती है. लेकिन धन को कब, कैसे और कितना खर्च करना है, यह समझने की ज़रूरत उससे भी अधिक होती है. धन के उपयोग के सम्बन्ध में हमारे शास्त्रों में बहुत सुन्दर बातें कही गयी हैं.

रामचरितमानस के उत्तर काण्ड में गरुड़ और कागभुशुंडी के बीच बहुत सुन्दर संवाद आता है. गरुण पूछते हैं कि धन की कितनी गतियाँ होती हैं और धन की सबसे उत्तम गति या सार्थकता क्या है.

कागभुशुंडी कहते हैं कि धर्म की तीन गतियाँ हैं- दान, भोग और नाश. जो धन परोपकार में लगाया जाया है, वही सबसे सार्थक है. धन की यही सबसे उत्तम गति है. धन की दूसरी गति भोग है. इसमें धन का उपयोग अपने शरीर के काम में आता था. यह धन की माध्यम गति है. जो धन न दान किया जाता और न जिसका भोग किया जाता, वह नष्ट ही होता है. यह धन की सबसे निकृष्ट गति है. हमारे अनेक शास्त्रों में अलग-अलग तरह से यही बात कही गयी है.

परम योगी और विद्वान राजा भृतिहरि ने अपने नीति शतक में कहा है कि-

दानं भोगो नाशस्तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥

धन की यह तीन गति होती हैं - दान, भोग और नाश.. लेकिन जो न तो धन को दान में देता है और न ही उस धन का भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति तो निश्चित है.

लोक भाषा और लोक कहावतों में इस बात को बहुत सुन्दर ढंग से कहा है. एक कहावत है कि-“जोड़-जोड़ मर जाएँगे, माल जमाई खाएँगे”. इसका तात्पर्य भी यही है कि यदि धन है तो उससे परोपकार के काम करो या उसका उपभोग करो. सिर्फ उसे जमा करके छोड़ जाओगे तो दूसरे लोग उसका उपभोग करेंगे. फिर ऐसे धन का फायदा.

दूसरे धर्मों में भी इस बात को किसी न किसी रूप में बताया गया है. इस्लाम में अपने ईमानदारी से कमाए हुए धन का एक हिस्सा दान करना हर मुसलमान का फर्ज है. इसे एक अनिवार्य कर्तव्य बताया गया है. ईसाइयत में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करने को बहुत पुण्य का काम बताया गया है. सिख धर्म में दूसरों की सेवा और ग़रीबों की मदद की बात बहुत ज़ोर देकर कही गयी है. जैन, बौद्ध और अन्य दूसरे धर्मों में भी यही बात अलग-अलग तरीकों से कही गयी है.

पुराने समय में धनवान लोग परोपकार के ऐसे काम करवाते थे, जिनसे सभी लोगों को फायदा हो. रास्तों में धर्मशालाएं बनवाते थे. सड़कों के किनारे पेड़ लगवाते थे. कुएं-जलाशय आदि खुदवाते थे. सदावर्त चलवाते थे. तीर्थस्थलों पर यात्रियों के लिए सुविधाएँ उपलब्ध करवाते थे.

आज भी ऐसे लोग मिल जाते हैं, लेकिन धन कमाने को लेकर जो नैतिकता पहले थी, वह अब बहुत कम हो गयी है. अच्छे काम कभी भी शुरू किये जा सकते हैं. हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारे पास जो धन-संपत्ति है, उसका उपयोग पात्र लोगों को दान देने और परोपकार के काम में ही अधिक हो. यही धन की और हमारे जीवन की सार्थकता है.


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