धर्म सूत्र 8: द्रश्य और अदृश्य ब्रम्ह.. वेद और विज्ञान “अतुल विनोद”

शास्त्रों में कही गई बातों को शब्द से नही भाव से पकड़ा जा सकता है क्योंकि ऋषियों ने सारी बातें संकेतों में कही है, उनकी गहराई में जाना इतना आसान नही है, क्योंकि उसके लिए अनुभव और विवेक भी ज़रूरी है | मन, बुद्धि और प्राण के प्रतिबन्ध साधन से हटते ही फिर वेद वेदान्त समझ आता है, मुह से मैं ब्रम्ह हूँ कहने से ब्रम्ह नही बन जाते |

ब्रम्ह क्या है, ब्रम्ह कौन है ? ब्रम्हा कैसे मिलता है ?

वेदांत कहते हैं, जो जन्म मरण से मुक्त हों, जो उत्पत्ति और विनाश से भी मुक्त हों, जिसके जन्म उत्पप्ति से प्रलय हों, वह ब्रम्ह है | ये जगत जड़ चेतनात्मक है, ये विचित्र और विलक्षण है, इसके किसी भी हिस्से पर रिसर्च करने से विज्ञान को हैरत अंगेज सूत्र मिलने लगते हैं | इसके थोड़े से ज्ञान से ही विज्ञान ऐसे आविष्कार कर लेता है जो, कल्पना से भी परे है |

जब इसकी सतह पर ही इतने रहस्य हैं तो अंदर कितने रहस्य छिपे होंगे, अब विज्ञान ने भी मान लिया है कि, दिखने वाला ब्रम्हांड सिर्फ 3,4 प्रतिशत है न दिखने वाला इसका 94 फीसदी हिसा अद्रश्य और अलौकिक है, उसी अद्रश से द्रश्य प्रकट होता है, और उसी से चलता है |

वेदांत कहते है की, उस परमात्मा के स्वभाव में ही ज्ञान क्रिया और बल है, वह सर्वगुण सम्पन्न है लेकिन फिर भी निर्गुण है, विशेष होते हुए भी वो निर्विशेष है, वो सर्वयापी है, कर्माध्यक्ष है, निर्गुण है, एक देव ही सब प्राणियों में छिपा हुआ है | अन्तर्यामी सब भूतों का निवासस्थान और गुणातीत है, वो सर्वेश्वर, सर्वग्य, अन्तर्यामी है, कहाँ से नीद पैदा होती है, कहाँ से नींद खुलती है ? कहाँ से सपने पैदा होते हैं ? शरीर के अन्दर ही आपको उसका पता चल जायेगा |

हमारा मन कैसे जगत का निर्माण करता है, मन का खेल परमात्मा के खेल की तरह ही है, हमारे मन की तरह ही परमात्मा का मन भी होता है, जो जगत का कारण है, जिससे सभी उत्पन्न हुए और जिसके सहारे सभी जीवित रहते हैं, और उसमे ही मिल जाते हैं | जो उत्पत्ति स्थिति और प्रलय का कारण है, उसी परम तत्व के दो भाग होते हैं एक जो दिखता है जिसे प्रकृति कहते हैं, दूसरा जो नही दिखता है जिसे अद्रश्य कहते हैं, नही दिखने वाले को विज्ञान अद्रश्य पदार्थ कहता है |

परमात्मा की शक्ति से पैदा हुयी प्रकृति पकड़ में आती है लेकिन उसका पुरुष यानि चैतन्य भाग पकड में नही आता | ये चैतन्य प्रकाश का  उत्सर्जन, अवशोषण, प्रतिबिंबित (emit, absorb, or reflect) नही करता है इसलिए विज्ञान को दिखाई नहीं देता | ये इसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण ही जाना जा सकता है |

नासा अद्रश्य जगत के बारे में क्या कहता है ?

Its presence is only known through its gravitational pull on visible matter(PRAKRUTI) in space... NASA

इस परम शक्ति के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण ही पूरा ब्रह्मांड नियमित और नियोजित होता है | जो विज्ञान कहता है वही तो वेदांत कहता है, चर, अचर, भूत, भविष्य और वर्तमान हर समय में वही व्याप्त है | हमारी दृष्टि सिर्फ द्रश्य पर अटक गई है इसलिए हमारा इसका अभ्यास नहीं है |

Dark matter(चेतन), although invisible, makes up most of the universe’s mass(जड़) and creates its underlying structure. Dark matter(चेतन)’s gravity drives normal matter (gas and dust, जड़) to collect and build up into stars and galaxies. Although astronomers cannot see Dark matter(चेतन), they can detect its influence by observing how the gravity of massive galaxy clusters, which contain Dark matter(चेतन), bends and distorts the light of more-distant galaxies located behind the cluster.... NASA

हम क्रिया को तो देखते हैं लेकिन क्रिया के पीछे के कारण को नहीं  देखते ध्यान साधन में मस्त साधक अक्षर, बीज, मन्त्र और  क्रियाओं में मस्त है लेकिन वो ये नहीं देखता कि इन क्रियाओं के पीछे कौन है | इसकी शक्ति से ही पूरा ब्रम्हांड टिका है विज्ञान इसे कॉस्मिक वेब कहता है |

The existence of a web-like structure to the universe was first hinted at in the 1985 Redshift Survey conducted at the Harvard-Smithsonian Center for Astrophysics .. NASA

वो परमात्मा हमसे अलग नहीं है लेकिन हम गलती कर उससे मानसिक रूप से बुद्धि के कारण दूर होते जाते हैं | दरअसल हम अपने आपसे ही दूर हो जाते हैं | खुद के वास्तविक स्वरूप को जानना ही हमारा धर्म है, हम उसे जानने में पूरी उम्र खपा देते हैं, और फिर उसे जानने के बाद भी उसे खो देते है | प्राथमिकता उसे जानने की होने चाहिए जो अपना ही है, जो अपना मूल स्वरुप है, जिसके अलावा दुनिया में और कुछ है ही नहीं |

यदि उसे जान लिया तो हमारे अंदर फिर अविश्वास कमज़ोरी की कोई जगह नहीं रह जाती | उसे पाने के लिए हमारा भटकना बंद हो जाता है | फिर दूसरा कोई नही रह जाता बस उसकी लीला अपनी लीला बन जाती है | दुनिया खेल बन जाती है, अपने द्वारा अपने लिए बनाई गयी अपनी दुनिया बन जाती है |

वेदांत कहता है जिसका एक अंश ही जगत है उसे जानना ही जीवन का लक्ष्य हों फिर अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही उस क्रिएटर तक पहुचना चाहते हैं, अध्यात्म उसे अपने अंदर देखता है विज्ञान उसे बाहर खोजता है | दरअसल वेद और विज्ञान की थ्योरी अब एक ही दिशा में आ गयी है क्योंकि विज्ञान इस निष्कर्ष पर है कि, हमारे यूनिवर्स के समानांतर एक और यूनिवर्स है |

ब्लैक होल में एक यूनिवर्स समाता है तो दुसरे छोर पर दूसरा प्रकट होता है | परमात्मा वही बिंदु है जिसमे सब कुछ लीन होता है और उसी से सब कुछ पैदा होता है | जब ऊर्जा एक ही जगह पर इकट्ठी होने लगती है तो वहां ब्लैक होल बनने लगता है, यानि एक ऐसा बिंदु जिसके गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आने वाली हर चीज़ उसमे लीन होने लगती है चाहे वो स्पेस, टाइम और प्रकाश ही क्यों न हो |

हमारे अंदर भी वो बिंदु है लेकिन वह बिंदु तब सक्रिय होता है जब हमारी उर्जा उस पर एकत्रित होती है लेकिन यहाँ सारे कुसंस्कार विलीन होने लगते हैं और उसके दूसरे छोर पर वाइट होल में रुपांतरण के साथ प्रकट होने लगती है | हमारे साथ हमारा पेरेलल यूनिवर्स भी चलता है जो हमारे अंदर ही एक ऐसा गलियारा है जो किसी दूसरे आयाम में खुलता है | जिससे हम शून्य में होते हैं तो इस आयाम का गलियारा खुलता है जहां समय और जगह बदल जाती हैं हम अतीन्द्रिय अनुभव करते हैं |

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