धर्मसूत्र 6:  बॉटम से टॉप पर कैसे पहुंचे? छोटा काम भी दे सकता है आत्मज्ञान और सिद्धियां! atul vinod

धर्मसूत्र 6:  बॉटम से टॉप पर कैसे पहुंचे? छोटा काम भी दे सकता है आत्मज्ञान और सिद्धियां!

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हम सब अपने प्रेजेंट वर्क से नाखुश रहते हैंकिसी को भी अपने काम में संतुष्टि नहीं मिलतीसबको दूसरे का काम ज्यादा अच्छा लगता है| हम ये भी सोचते हैं कि हमारा काम हमारी तरक्की में बाधा है| आत्म ज्ञान और सिद्धियाँ हासिल करने के लिए भी हमे हिमालय में तपस्या करने की ज़रूरत महसूस होती हैं|

एक कहावत है कि हमें पड़ोसी का अचार ज्यादा स्वादिष्ट लगता है

सफलता के शिखर पर कौन नहीं पहुंचना चाहता?

हमारे धर्म में सफलता का एक ऐसा सूत्र हमें दिया गया  है जो हमें बहुत ऊंचा ले जा सकता है|

यदि आपको भी ऊंचाई पर पहुंचना है लेकिन आप अपने वर्तमान काम को अच्छा नहीं मानते  तो  ये सूत्र आपके काम का है|

हम सबको अपनी अपनी परिस्थिति के मुताबिक कोई ना कोई काम मिला हुआ हैहम हमेशा किसी नए काम की तलाश में होते हैं

यदि आप भी किसी ऐसे काम की तलाश में है जिससे आपको टॉप पर पहुंचने में आसानी लगती है तब भी ये सूत्र आपके काम का है|

इस सूत्र पर हम बाद में पहुंचेंगे इससे पहले एक छोटी सी कहानी|

एक  तपस्वी पेड़ के नीचे  बैठा थाऊपर कौवा और बगुला लड़ रहे थे दोनों की लड़ाई से साधु की तपस्या में बाधा पड़ रही थीसाधु ने गुस्से में दोनों की तरफ देखा उसके आँखों के तेज से दोनों जलकर भस्म हो गए

साधु को बहुत खुशी हुई, मुझे तो बहुत बड़ी सिद्धि  मिल गई मेरे गुस्से से ही कौवा और बगुला भस्म हो जाते हैं|

वो पास ही में एक गांव में भिक्षा लेने जाया करता था, अहंकार के मद में चूर ये साधु अगले दिन फिर भिक्षा के लिए पहुंचा| एक दरवाजे पर खड़ा हुआ पुकारा मां कुछ भिक्षा चाहिए, भीतर से आवाज आती है बेटा रुक|

तपस्वी मन ही मन सोचने लगा इस महिला की इतनी हिम्मत कि सिद्ध पुरुष को वेट कराये

अंदर से फिर आवाज आई बेटा अपनी सिद्धियों पर  घमंड मत करयहाँ ना तो कोई कौवा है नहीं बगुला|

तपस्वी घोर आश्चर्य में पड़ा|

 बहुत देर बाद एक महिला बाहर निकली| साधू  उनके चरणों में गिर पड़ा पूछा माता तुझे ये सब कैसे पता चला?

महिला बोली बेटा मैं ना तो योग जानती हूं ना ही ध्यान, साधना, तपस्या| मैं तो एक सीधी-सादी सरल महिला|  मेरे पति बीमार हैं| उनका कुछ काम बाकी था इसलिए मैंने तुम्हें रोका

अपनी पति की सेवा करना मेरा पहला कर्तव्य है|  जब मेरी शादी नहीं हुई थी तब मैं अपने पुत्री  धर्म का पालन कर रही थी अब मैं पत्नी धर्म का पालन कर रही हूं| यही मेरी तपस्या योग और ध्यान है|

इसी से मुझे ये सिद्धि प्राप्त हुई|

इस बारे में तुम और जानना चाहते हो तो पास ही राजनगर है वहां तुम्हें एक व्याध मिलेगा| भारत में हंटर को शिकारी, व्याध और बहेलिया कहते हैं|

साधु उस व्याध के पास पहुंचा व्याध  छुरे से मांस काट रहा थासाधु  को आश्चर्य हुआव्याध ने कहा आप बैठिएमैं अपना काम निपटा लूंकाफी समय बाद काम निपटा कर व्याध  उस साधु को लेकर घर पहुंचा

उसने फिर साधु को बैठ क्र इंतज़ार करने को कहा|इसके बाद उसने अपने बुजुर्ग माता-पिता को स्नान ध्यान कराया उनकी सेवा कीफ्री होकर व्याध बोला अब बतायें?

उसने व्याध ने साधु के आत्मा परमात्मा से संबंधित सभी प्रश्नों  को अपने जवाब से शांत कर दिया| यही उपदेश व्याध गीता नाम से महाभारत में प्रसिद्ध हुए

साधु व्याध से बहुत प्रभावित था,पूछा कि आप इतने बड़े आत्मज्ञानी हैं आप ऐसा गंदा और घिनौना काम क्यों करते हो?

व्याध  ने कहा वत्स कोई भी काम गंदा नहीं होता|

कोई भी कर्तव्य अपवित्र नहीं है| मेरा जन्म ऐसी परिस्थिति में हुआ| बचपन से ही मुझे ये काम मिला| मैं अपना काम अच्छे ढंग से करता हूं| अपने माता-पिता की सेवा करना मेरा कर्तव्य है| वो भी मैं करता हूं| ना तो मैं योगी हूं, न सन्यासी, फिर भी अपने काम में अनासक्ति रखते हुए मैंने जो किया उससे मुझे ये ज्ञान मिला आगे परमात्मा की इच्छा|

वैसे ना तो मैं किसी को उपदेश देता हूं ना ही मेरी महात्मा या गुरु बनने की कोई इच्छा है

आपका कार्य ही आपका साधना और साधन है|

जो भी काम आप करो तब  किसी और बात के बारे में सोचो भी मतकर्म का फल तो ईश्वर तय करता है बस हम अपने कर्तव्य को बिना भिनभिनाये करते रहें|

समय आने पर ईश्वर जो काम हमारे लायक नहीं होता उससे हमें खुद ही हटा देता है

व्याध एक समय बाद उस काम से अपने आप मुक्त हो गए, ईश्वर ने उनकी आजीविका की समस्या दान-दक्षिणा से हल कर दी| वे बहुत ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित हुए| जग में उन्हें आज भी याद किया जाता है| वो स्त्री भी दिव्य ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त हुयी

धर्म कहता है कि यदि आप अपने काम में आसक्ति नहीं रखते तो आपका हर काम शुभ है|

अब आप ये कहेंगे कि क्या हम भी शिकार करके अपना पेट भरने लगेंनहीं इसमें आपका पर्सनल  इंटरेस्ट आसक्ति और दुराभाव जुड़ा हुआ है

धर्म का ये सूत्र कहता है कि हमें जो कर्तव्य मिला हुआ है उसे पूरी ईमानदारी से करें| जो हमारे हाथ में है उसमें छोटा बड़ा नहीं देखे| धीरे-धीरे उसी से हमें इतनी शक्ति मिलेगी कि हम बहुत अच्छी  अवस्था में पहुंच जाएंगे|

आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है| हम जिसे अपने नेचर के खिलाफ मानते हैं, वही हमारा  वास्तविक स्वरुप हो सकता हैहम जिसे दुश्मन मानते हैं, वही हमारा सबसे बड़ा दोस्त हो सकता है|

हम जिस रंग को  अपने लिए अशुभ मानते हैं वही रंग हमारे लिए शुभ हो सकता है

कोई काले को अशुभ मानता है, कोई काले को शुभ मानता हैलेकिन शुभ और अशुभ हमारी दृष्टि का भेद है| काले से ही सफेद का निर्माण होता है और सफेद से काले का|

रात ना हो तो सुबह कैसी, और सुबह ना हो तो शाम के ऐसी शाम ना हो तो रात कैसी|

दिन और रात परमात्मा की व्यवस्था अभिन्न अंग है|

इसी तरह से हर काम उसी की व्यवस्था से निकलता है|

फिल्म में विलेन का रोल करने वाले 99 फीसदी लोग अच्छे ही होते हैं|  

ये धर्म सूत्र  ये भी कहता है कि किसी दूसरे के काम को भी छोटा या बड़ा ना मानोहर एक का काम अपने आप में महत्वपूर्ण है|

आप पाज़ और साफ़ सुथरी जगह पर बैठे हैं तो इसलिए क्यूंकि वहां मौजूद गंदगी कोई हटाने का काम करता है|

धर्म कहता है कि आप छोटे से छोटे काम में भी ना तो बहुत लगाव रखिए न ही उससे दुश्मनीबस करते जाइए| धीरे धीरे आत्मा उच्च स्तर पर आएगी और उस वक्त आपकी शक्ति आपके सामने आपकी वास्तविक सिद्धि रख देगी|

छोटी छोटी चीजों से हम इतने ज्यादा प्रभावित हो जाते हैं कि हमारा जीवन घिसटने लगता है|

किसी वजन को बिना पहियों के खींचना कितना कठिन होता है?

पहिये और एक्सल के बीच ग्रीस और आयल प्रेम है इसी प्रेम के सहारे वो पहिया बिना घर्षण किए हुए मीलों चल सकता है|

रिश्तो में भी हम इसलिए घिसटते हैं क्योंकि हमारे अंदर उस रिश्ते को बदलने की शक्ति नहीं है|

हम अपने  करीबी को पूरी तरह बदल सकते हैं यदि हमारे अंदर अपने काम को बिना किसी प्रतिरोध के लगातार करते रहने का भाव हो|

आप यदि अपने रिश्ते को निभाने में ईमानदार हैं तो एक दिन आपके अंदर दिव्य शक्ति जरूर पैदा होगी|

हमारी नजर के कारण ही हमें सब कुछ उल्टा पुल्टा नजर आता है|

शिखर की शुरुआत  धरातल से ही होती है| टॉप और बॉटम  एक ही पिंड के दो हिस्से हैं

यदि बॉटम नहीं होगा तो टॉप हो ही नहीं सकता|

दुखों के कारण ही सुख का अस्तित्व हैशुरुआत के कारण ही अंत मौजूद है

अशुभ काम के कारण ही शुभ काम का अस्तित्व है| धर्म कहता है कि  कभी भी खुद को नीचा महसूस ना करेंआपकी नीचाई ऊंचाई का ही एक पड़ाव है

जो सम्मानित है वो अपमानित भी हैपेट भरता है तो पहले खाली भी होता हैभोजन मिलता है तो उससे पहले भूख भी लगती है

जीवन के साथ-साथ मृत्यु भी चलती है और मृत्यु के साथ  नए जीवन की शुरुआत भी हो जाती है|

इसलिए धर्म सूत्र कहते हैं कि खुद चुनाव मत करो, बस देखते रहोजो मिला है उसके विपरीत भी मिलेगा और यदि विपरीत है तो सकारात्मक भी मिलेगा

फकीर बन कर भी राजाओं की तरह जिया जा सकताराजा बन कर भी  गुलाम हुआ जा सकता है|

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