दिल से विदा न करें पुरखों को -दिनेश मालवीय

दिल से विदा न करें पुरखों को

-दिनेश मालवीय

भारतीय सनातन संस्कृति का सोलह श्राद्ध का अनुष्ठान आज सर्वपितृमोक्ष अमावस्या के साथ सम्पन्न हो गया. अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के इन सोलह दिनों में सनातनियों ने बहुत से नियमों और अनुष्ठानों का पालन किया और आज पूरे विधि-विधान से पुरखों को विदा कर दिया. विदा कर दिया कहना भाषा की मजबूरी है. पुरखे कभी विदा नहीं होते. वे किसी न किसी रूप में हमारी स्मृति और चेतना के अभिन्न अंग बने रहते हैं.

दरअसल पूर्वज कोई विशिष्ट व्यक्ति नहीं, बल्कि एक समष्टि भाव है. हम अपने कितने पूर्वजों के नाम या उनके बारे में जानते हैं? पिता, दादा, परदादा, और अधिक से अधिक उनके पीछे की और एक दो पीढ़ी के विषय में  ही पता होता है. किसी-किसी के पास अपना वंश-वृक्ष या वंशावली भी होती है. लेकिन ऐसा बहुत कम लोगों के पास होता है. अधिकतर लोगों को पिछली तीन-चार पीढ़ियों के पूर्वजों के नाम ही पता होते हैं. किसीके वंश के सबसे पहले पूर्वज के विषय में शायद ही किसीको मालूम हो. कहते हैं गया में हमारे वंश के पंडों के पास इसका पूरा विवरण है. बदरीनाथ धाम के पंडों के बारे में भी ऐसा ही कहा जाता है.

इस बातों के सत्य-असत्य होने पर हमें कोई निर्णय देने का अधिकार नहीं है, क्योंकि हमारे पास उन्हें प्रमाणित करने का कोई पैमाना नहीं है. यह इस आलेख  का विषय भी नहीं है.

इस सोलह श्राद्ध के दिनों में हम अपने सभी पूर्वजों को याद कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. उनकी आत्मा की शान्ति की प्रार्थना करते हुए उनसे अपने और अपने परिवार की सुरक्षा तथा सुख-समृद्धि के आशीर्वाद की याचना करते हैं.

कहने वाले तरह की बातें कहते हैं. उनका कहना है कि हमारे मृत पूर्वजों ने कहीं और जन्म ले लिया होगा या किसी अन्य योनि अथवा लोक में होंगे या फिर हमारे ही वंश में किसी बच्चे के रूप में आ गये होंगे. कुछ लोग उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाने में नहीं चूकते. वे इस परम्परा को ही नहीं मानते. यह सब अपनी-अपनी सोच और समझ का विषय है.

लेकिन हमारा प्रतिपाद्य विषय कुछ और है. हमारा कहना है कि इन सोलह दिनों में हमें उन संस्कारों की थाती को संरक्षित करने का संकल्प दोहराना चाहिए, जो हमारे पूर्वज पीढ़ी दर पीढ़ी हमें सौंपकर गये हैं. हमें उनके उन संघर्षों को याद करना चाहिए जो उन्होंने बहुत विपरीत परिस्थितियों में इन संस्कारों की रक्षा के लिए किये. कठिन से कठिन दौर में भी वे इनसे विमुख नहीं हुए. हज़ार कष्ट सहे लेकिन अपनी संस्कृति और धर्म से मुँह नहीं मोड़ा और एक समृद्ध विरासत हमारे लिए छोड़ गये.

इसलिए जब यह कहा जा रहा है कि ‘पुरखों को दिल से विदा मत कीजिए’, तो इसका तात्पर्य है कि उनके द्वारा हमें दी गयी संस्कारों की विरासत को हम सुरक्षित रखते हुए उसे अपनी आगामी पीढ़ियों को हस्तांतरित करें. हम उनकी सीखों और आदर्शों को अपने आचरण में उतारें. उनकी मान-मर्यादा की सदा रक्षा करें. यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी. इस बात पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए कि हमारी नयी पीढी किसी तथाकथित ‘आधुनिकता” के व्यामोह में इस विरासत से न कट जाए. वरना, बैंक-बैलेंस, कार, बंगला, धन-दौलत सब वैसे ही होंगे, जैसे बिना प्राण का शरीर. संस्कृति के बिना समाज एक ऐसे रुग्ण शरीर की तरह है, जो समाप्त होने की कगार पर है.

ऐसा भी न हो कि पितृमोक्ष अमावस्या के बाद हम फिर से वैसे ही जीने लगें, जैसा पहले जी रहे थे. ये सोलह दिन हमारे लिए पवित्र जीवन का प्रशिक्षण सत्र जैसे होते हैं. इस दौरान हमने जिस पवित्रता का पालन किया है, वैसी ही पवित्रता आगे भी बनाए रखें. इस तरह हम अपने पुरखों को स्मृति के रूप में दिल में बसाकर रख सकते हैं. वे हमारे दिल से कभी विदा नहीं होंगे. ऐसा होने पर निश्चित जानिये कि आपके जीवन में सुख-समृद्धि और शान्ति सदा बनी रहेगी.

इसलिए पुरखों को दिल से विदा मत कीजिए.

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