रोग, उनके प्रकार स्वास्थ्य, स्वस्थ व्यक्ति की छह पहचान -दिनेश मालवीय

रोग, उनके प्रकार स्वास्थ्य,स्वस्थ व्यक्ति की छह पहचान

-दिनेश मालवीय

मनुष्य का शरीर पाने को भारत में सबसे बड़ा सौभाग्य माना गया है. इसे मोक्ष का द्वार कहा गया है. इसके विषय में सैंकड़ों श्लोक और रामचरितमानस में अनेक चौपाइयां आती हैं. मनुष्य शरीर के महत्त्व और महिमा से शास्त्रों के पन्ने भरे पड़े हैं. लेकिन दूसरी ओर इसे व्याधियों का घर भी कहा गया है. इस सम्बन्ध में भी खूब लिखा गया है. शरीर को रोगों का घर कहा गया है. स्वस्थ शरीर को दुनिया का सबसे बड़ा वरदान और सम्पदा माना गया है.



अंग्रेजी में भी कहावत है कि Health is wealth. तंदरुस्ती हज़ार नियामत. भारत में मनुष्य की आयु सौ वर्ष मानी गयी है. इसीके अनुसार जीवन में आश्रम व्यवस्था की गयी है. लेकिन यह संभव नहीं हो पा रहा.

स्वस्थ रहने की तमाम कोशिशों के बाद भी शरीर में बीमारियाँ आ ही जाती हैं. आजकल इतनी बीमारियाँ हो गयी हैं, कि इनमें से अनके का तो कोई इलाज ही नहीं है. व्यक्ति बस जैसे-तैसे उन्हें नियंत्रण में रख सकता है. हमारे ऋषियों और अन्य गुणीजन ने इस विषय पर बहुत चिन्तन-मनन कर रोगों का वर्गीकरण किया है और उनके समाधान के उपाय भी बताये हैं.

हमारे शास्त्रों में रोगों के चार प्रकार बताये गए हैं- स्वाभाविक रोग, आगंतुक रोग, मानसिक रोग और कायिक रोग.

स्वाभाविक रोग वे होता हैं, जो शरीर में स्वभाव से ही और जन्मजात होते हैं. इनमें भूख, प्यास, निद्रा, जागरण, मृत्यु आदि शामिल हैं. इनकी औषधि भी भोजन, जल, नींद आदि बताई गयी हैं. हालाकि मृत्यु का कोई इलाज नहीं है.

एक और स्वाभाविक रोग बताया गया है, जैसे किसी का जन्म से अंधा होना या उसका कोई अंग विकृत होना. ये सभी स्वाभाविक रोगों के अंतर्गत आते हैं.

दूसरे तरह के रोग आगंतुक कहे गये हैं, जैसे आपको कोई गाय-बैल सींग मारे दे, कुत्ता काट ले, कोई पशु घायल कर दे, कोई ज़हरीला कीड़ा काट खाए या किसी रोग अथवा दुर्घटना में आँख की रोशनी चली जाए. किसी कारण से शरीर का कोई अंग भंग हो जाए.

तीसरी श्रेणी के रोगों में मानसिक रोग आते हैं, जो मन के द्वारा शरीर को क्लेश देते हैं, जैसे काम, गुस्सा, लालच, मोह, घमंड, जलन, दीनता और अन्य विकार. कुछ लोग उन्माद, मिर्गी, मूर्च्छा, भ्रम और तमोगुण को भी मानसिक रोग मानते हैं.

चौथी श्रेणी में वे रोग आते हैं, जो शरीर के भीतर वात,पित्त और कफ आदि के विकृत होने से उपजते हैं, जैसे बुखार आदि.

प्रारब्ध को भी रोगों का एक बड़ा कारण माना गया है. यानी वे रोग जो आपके द्वारा पूर्व में किये गये कर्मों के कारण होते हैं.

यदि कोई व्यक्ति खानपान में मनमानी करने लगे और स्वाद के लिए उसमे हर कुछ ठूंसता रहे, तो शरीर की धातुओं में विषमता आना स्वाभाविक है. इससे आमाशय में दोष इकट्ठा हो जाते हैं. व्यक्ति अकाल मौत मर जाता है. इसके विपरीत यदि आप सोच-समझकर खानपान और दिनचर्या का ध्यान रखें तो आप स्वस्थ रह कर सौ साल नहीं तो कम से पर्याप्त लम्बी आयु तक जी सकते हैं. आयर्वेद के अनुसार जब शरीर में वात, पित्तादि दोष बढ़ जाते हैं, तब नसों में मल भर जाता है. इससे याददाश्त पर बुरा असर होता है.

जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं तो यह सवाल अपने आप उठता है कि स्वस्थ किसे कहते हैं? कई लोग रोग की अनुपस्थिति को स्वस्थ होना मानते हैं, लेकिन  कुछ लोगों का मानना है कि जो व्यक्ति स्वाभाविक स्वरूप यानी “स्व” यानी अपने आत्मभाव मे स्थित होता है, वह स्वस्थ है.

 पहले सिर्फ शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति को स्वस्थ माना जाता था, लेकिन कुछ समय से इसमें अध्यात्म को भी शामिल कर लिया गया है. यानी शारीरिक और मानसिक के साथ ही व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से भी स्वस्थ होना चाहिए. जब हम किसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं, तो स्वस्थ नहीं रहते. जिसके शरीर में वात, पित्त और काफ ये तीनों सम हों और इनमें कोई विषमता नहीं आये, उसे स्वस्थ कहते हैं.

 इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इनमें से कोई भी अधिक न बढ़ जाए या विकृत न हो जाए. स्वस्थ व्यक्ति की छह पहचान बताई गयी हैं. पहली यह कि उसे खुलकर भूख लगे. वह जो खाए-पिए वह आसानी से पच जाए. सुबह पेट आसानी से हल्का हो जाए, यानी शौच में कठिनाई न हो. शुद्ध डकार आये. अपानवायु दुर्गन्धयुक्त न हो. मन प्रसन्न रहे. इन्हीं छह बातों के होने पर व्यक्ति स्वस्थ मना जाता है.

आयुर्वेद का विषय शरीर तक सीमित नहीं है. इसका उद्देश शरीर के रोगों के शमन तक सीमित नहीं है. इसका मुख्य उद्देश्य मन को शुद्ध करना है. स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रह सकता है. भगवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने शारीरिक, मानसिक और अन्य रोगों से रक्षा के लिए “युक्त” और “अति” का मंत्र दिया है. किसी भी चीज की अति न करें और किसी भी चीज का अधिक त्याग भी नहीं करें. उन्होंने युक्त आहार-विहार पर बल दिया है. न व्यक्ति को बहुत कम खाना चाहिए और न बहुत ज्यादा; न बहुत कम सोना चाहिए और न बहुत ज्यादा. उन्होंने सात्विक और आसानी से पचने वाले भोजन के महत्व को भी समझाया है.

उनके अनुसार तो किसी भी चीज का सम्यक सेवन करना ही स्वास्थ्य का मूल मंत्र है.  हम इन बातों को ध्यान में रखकर यदि अपनी जीवनचर्या का पालन करें तो कोई कारण नहीं है कि हम स्वस्थ न रह सकें.


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