माता-पिता आपके पास रहते हैं कि आप माता-पिता के साथ? -दिनेश मालवीय

माता-पिता आपके पास रहते हैं कि आप माता-पिता के साथ?

-दिनेश मालवीय

आज अखबार कि एक खबर ने मन को झकझोर दिया. इंदौर के पास एक गाँव में एक 85 वर्ष की वृद्धा ने महज इसलिए ख़ुदकुशी कर ली कि उसकी पाँच वर्ष की परपोती ने उसे कह दिया कि उसने (परदादी ने) सारे अमरूद खा लिए. यह विचार सहज ही मन में आया कि क्या वृद्धा की ख़ुदकुशी का इतना ही कारण रहा होगा?



यह बात बिल्कुल गले से नहीं उतरती. यह तात्कालिक कारण तो हो सकता है, लेकिन यही एक कारण नहीं हो सकता. दरअसल उस वृद्धा के मन में न जाने कब से कितना गुबार भरा होगा, उसने न जाने कितने अपमान के घूँट पिए होंगे, उसने कितने बरस घर के किसी कोने में अकेले और उपेक्षित गुजारे होंगे, वह घर के अपने ही बच्चों से खुलकर बात करने को कब से तरस रही होगी, न जाने किस-किस तरह की ज़िल्लतें सही होंगी. ये सब गुबार परपोती की एक बात से फूट पड़ा होगा, वरना इतनी-सी बात पर जीवन का लंबा अनुभव रखने वाली वृद्धा कैसे ख़ुदकुशी कर सकती है?

इसी प्रसंग में एक और बात मन को बार-बार उद्वेलित करती रहती है. आप किसी व्यक्ति से पूछें कि “आपके माता-पिता कहाँ रहते हैं?” वे बहुत अकड़ कर कहते हैं कि,“मेरे ही पास रहते हैं.” यह बात बहुत दुःख देती है. उन्हें यह कहना चाहिए कि, “मैं माता-पिता के साथ रहता हूँ”. कहने को यह बात बहुत मामूली लगती है, लेकिन इससे हमारी पूरी सोच और बुजुर्गों के प्रति हमारे दृष्टिकोण का पता चलता है.

आज के भारतीय समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा और उनके साथ बुरा व्यवहार बहुत सामान्य बात है. यह सब तो वे किसी तरह सहन करते हुए जी लेते हैं. लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या है अकेलेपन का अहसास. बच्चों के जाने-अनजाने गलत व्यवहार के कारण उन्हें अपना घर ही पराया लगने लगता है. उन्हें लगता है कि अब उनकी घर में कोई ज़रुरत नहीं रह गयी है. वे दिन-रात ईश्वर से मौत की प्रार्थना करते हैं, लेकिन मौत का वक्त तो तय होता है. इसके अलावा, यह देखा गया है कि मौत माँगने वालों को यह बहुत मुश्किल से मिलती है.

कई बार ऐसा भी होता है कि परिवार के लोगों के मन में बुजुर्गों के प्रति कोई बुरा भाव नहीं होता, लेकिन उनकी किसी बात पर वे इतनी बुरी तरह से बोल जाते हैं, कि यह लहजा बुजुर्गों के मन को चीर जाता है. कहने वाला सहज भाव से कहकर चला जाता है और कुछ देर बाद उसे भूल भी जाता है, लेकिन बुजुर्ग उसे मन में पालकर बैठे हुए दुखी होते रहते हैं.

ऐसा सिर्फ भारत में होता हो, ऐसा नहीं है. यूरोप के देशों में भी यह समस्या कम नहीं है. वहाँ भी बुजुर्गों की सबसे बड़ी समस्या अकेलापन ही है. वहाँ भी  बुजुर्ग बहुत अकेलापन महसूस करते हैं. अनेक पश्चिमी देशों में किये गये अध्ययनों से पता चला है कि ज्यादा समय तक समाज से अलग-थलग रहने की वजह से सेहत से जुडी कई दिक्कतें आ जाती हैं, जिनमें डिप्रेशन और स्ट्रेस मुख्य हैं. साथ ही याददाश्त कमज़ोर होना भी उनके लिए बहुत नुकसानदायक होता है. इससे उनकी रोगों से लड़ने की ताकत कम हो जाती है.

खैर, पश्चिमी देशों में तो अधिकतर बुजुर्ग अलग ही रहते हैं. बच्चों के साथ रहने वाले बुजुर्गों की संख्या कम ही है. या तो वे ओल्ड एज होम्स में रहते हैं, या बच्चों से अलग. लेकिन भारत में अधिकतर बुजुर्ग बच्चों के साथ ही रहते हैं. उनके अपने बच्चों तथा परिवार के दूसरे सदस्यों का रवैया उनके प्रति बहुत अच्छा नहीं रहता. हालाकि अनेक परिवारों में बुजुर्गों का बहुत सम्मान होता है और उनकी देखभाल में कोई कसर नहीं रखी जाती, लेकिन ऐसे सौभाग्यशाली और संस्कारित परिवारों की संख्या कम ही देखने को मिलती है.

कोरोना काल में बुजुर्गों की समस्याएं और अधिक बढ़ गयीं. डॉक्टर्स ने कहा कि इस महामारी से बुजुर्गों की जान को ज्यादा जोखिम है. इसके कारण उन पर अनेक पाबंदियां आयद कर दी गयीं. पहले वे मंदिर हो आते है, अपने हमउम्र लोगों के साथ कुछ समय बिताकर दुःख-सुख साझा कर आते थे, भजन-कीर्तन में चले जाते थे, कथा-भागवत सुनने चले जाते थे. कुछ हलकी फुल्की गपशप भी हो जाती थी. लेकिन कोरोना के जोखिम के चलते उन्हें एक तरह से घर में कैद कर दिया गया. इसके पीछे उनके स्वास्थ्य की चिंता तो निश्चित ही रही, लेकिन यह चिंता भी कम नहीं रही कि कहीं ये संक्रमित हो गये तो पूरे घर को संक्रमण होने का खतरा है.

कुछ परिवारों में ऐसा भी हुआ कि घर में सीमित रहने के कारण परिवार के सदस्य बुजुर्गों के अधिक करीब आये. उन्होंने उनके साथ अधिक समय भी बिताया. लेकिन देखने में तो यही आया है कि अधिकतर परिवारों में बड़े और बच्चे सभी अपने-अपने मोबाइल में ही उलझे रहे और बुजुर्गों की स्थिति जस की तस रही.

सच पूछिए तो सौभाग्यशाली हैं वो लोग, जिनके घर में बुजुर्ग हैं. यह भी एक कटु सत्य है कि बुजुर्गों का महत्त्व उनके न रहने पर ही समझ आता है. ऐसे लोग धन्य हैं जो यह मानते और कहते हैं कि वे अपने माता-पिता के साथ रहते हैं. वे लोग अभागे ही कहे जायेंगे जो यह कहते हैं कि माता-पिता उनके साथ रहते हैं. बुजुर्गों को सहेज कर रखिये. उनके साथ अच्छा व्यवहार कीजिए. उनकी कोई बात आपको नागवार भी लगे तो उसकी अनदेखी करें. वे अपने आशीषों से आपकी झोली भर कर जायेंगे.


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