क्या ईश्वर का कोई रूप होता है | -दिनेश मालवीय “अश्क’

क्या ईश्वर का कोई रूप होता है |

दिनेश मालवीय “अश्क’
क्या भक्त की भावना के अनुसार ईश्वर रूप लेते हैं

सबके अलग अलग भाव क्यों हैं

सनातन धर्म के सिद्धांत विश्व को महाविनाश से बचा सकते  हैं

आज हम सनातन धर्म के एक ऐसे सिद्धांत पर चर्चा करेंगे, जिसकी मिसाल दुनिया मे कहीं नहीं मिलती। 

God 
सनातन धर्म के अनुसार परमपिता परमेश्वर या ब्रह्म का कोई रूप नहीं है। सनातन धर्म के अनेक ग्रंथों ने इस बात को कहा गया है। महाकवि तुलसीदास ने इसे बहुत सरल और सुंदर तरीके से न केवल कहा है, बल्कि इसके बहुत प्रामाणिक उदाहरण भी दिये हैं।

ईश्वर के विश्वरूप का वर्णन करते हुये वह कहते हैं कि- वह बिना पैरों के चलता है, बिना कान के सचनतख है, बिना हाथों के सब काम करता है,बिना मुँह के सभी वस्तुओं का सेवन करता है और बिना वाणी के सब कुछ बहुत स्पष्ट बोलता है। पाताल जिसके चरण हैं, ब्रहृमलोक जिसका सिर है,अन्य लोक जिसके भिन्न भिन्न अंगों पर स्थित हैं, भयंकर काल जिनका भृकुटि संचालन है, सूर्य जिसके नैत्र हैं और बादलों के समूह जिसके बाल हैं।

God
यानी सारा ब्रह्माण्ड उनका रूप है।

यह बात  कुछ और धर्मों मे भी अलग शब्दों मे कही गयी है। लेकिन सनातन धर्म यह मानता है कि यही निराकरण निर्गुण ईश्वर भक्तों के हित मे समय समय पर साकार रूप भी लेता है। वह दशरथ के आँगन मे भी बालरूप मे खेलता है और वृदांवन मे एक मटकी छाछ के लिये गोपियों के इशारे पर नाचता भी है।

ईश्वर का कोई स्वरूप नहीं है,क्योंकि सारे स्वरूप उसी के हैं। सगुण और निर्गुण में कोई भेद नहीं है। दोनो ही कल्याणकारी हैं।
जो जैसा भाव रखता है, उसे ईश्वर उसी रूप में दिखाई देते हैं।

इसका बहुत सटीक उदाहरण श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में देखने को मिलता है। श्रीराम अपने गुरु विश्वामित्र जी और भाघ लक्ष्मण के साथ राजा जनक द्वारा आयोजित धनुष यज्ञ में जाते हैं।

यहाँ बहुत गूढ़ और रहस्यमयी घटना होती है। यहाँ तुलसी लिखते हैं कि -

जिन्ह के रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन्ह देखी तैसी

God 
यानी सभा मे उपस्थित लोगों का जैसा भाव था, श्रीराम उन्हें वैसे ही दिखाई दिये। वीर राजाओं को वह वीर रस का साकार रूप, कुटिल राजाओं को वह वह बहुत भयानक दिखे।

सभा मे जो राक्षस भेस बदलकर बैठे थे, उन्हें श्रीराम प्रत्यक्ष काल के समान और नगरवासियों को वह मानवों के भूषण दिखाई दिये। स्त्रियों को वह उनके भावों के अनुरूप दिखाई दिये। उन्हें वह श्रंगार रस की मूर्ति लगे।

श्रीराम विद्वानों को विराट रूप मे दिखे तो योगियों को परम तत्व के रूप मे दिखे।

इस प्रकार जिसका जैसा भाव रहा प्रभु उसको उसी रूप मे नज़र आये।

इस संदर्भ मे लंकाकाण्ड का भी एक बहुत सुंदर प्रसंग सहज ही याद हो आता है। भगवान श्रीराम सेना सहित समुद्र पार कर लंका मे शिविर लगाये हुये हैं। युद्ध शुरू होने को है। श्रीराम वानरराज सुग्रीव की गोद मे सिर रखकर लेटे हैं। श्रीमती ने चंद्रमा की ओर इशारा करके पूछा कि भाइयो! चंद्रमा मे जो कालापन है वह क्या है?

God Pray
सभी ने अपने भाव और समझ के अनुरूप उत्तर दिये। सुग्रीव ने कहा कि चंद्रमा मे पृथ्वी की छाया दिखाई दे रही है।किसीने कहा कि चंद्रमा को राहू ने मारा था। यह काला धब्बा उसी चोट का निशान है। किसीने कहा कि ब्रह्मा ने जब कामदेव की पत्नी रति का मुख बनाया, तो उन्होंने चंद्रमा से टुकड़ा निकाल लिया। यह वही खालीपन है।

लेकिन हनुमानजी ने कहा कि चंद्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुंदर श्याम मूर्ति चंद्रमा के हृदय मे बसती है। उसी श्यामता की झलक चंद्रमा मे है।

ख़ैर, जनक की सभा और लंका का प्रसंग अपनी जगह, व्यवहारिक जीवन मे भी ऐसा ही होता है। जो व्यक्ति जिस भाव या रूप मे ईश्वर का ध्यान करता है, वह उसे उसी रूप मे दर्शन देते हैं। श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता मे कहा है कि मुझे जो जिस रूप मे भजता है, मैं भी उसे उसी रूप मे भजता हूँ।

सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि धर् को लेकर  इसमे किसी भी प्रकार का कोई आग्रह नहीं है। किसीसे यह नहीं कहा जाता कि तुम ऐसा ही करो। किसीका मन भगवान के बाल स्वरूप मे रमता है तो वह उस रूप मे पूजे। किसीका मन किशोर या युवा अथवा प्रौढ़ रूप मे लगता है तो उसे उसके अनुरूप साधना खरने की स्वतंत्रता है।

कोई अगर ईश्वर की निर्गुण रूप मे आराधना करता है, तो ख़ुशी से करे। कोई यदि ईश्वर को नहीं भी माने, तो सनातन धर्म मे उसकी भी अवहेलना नहीं है।

Dreams about God
इतनी उदारता का कारण यह है कि हमारे ऋषि जानते थे कि सारे रूप एक ही परम सत्ता के हैं। कोई किसी भी विधि से साधना करे, अंत मे अनुभव एक ही होगा। 

सनातन धर्म ने कभी किसीको अपने साथ लाने का कोई प्रयास नहीं किया। यहाँ दूसरे धर्मों को मानने वाले जो लोग आये उनका न सिर्फ़ स्वागत किया गया, बल्कि उन्हें उनके धर्म के अनुरूप उपासना करने के लिये सुविधाएं भी दी गयीं। हिन्दू राजाओं ने मस्जिदों और चर्चों के निर्माण के लिये ज़मीनें और अनय सुविधाएं भी प्रदान कीं। 

God is one
सनातन धर्म सभी धर्मों, पंथों और उपासना पद्धतियों का समान रूप से आदर करने की शिक्षा देता है। एक और महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि जो भी व्यक्ति अपनी उपासना पद्धति का ईमानदारी से पालन करता है, उसे किसी दूसरी उपासना पद्धति के दोष दिखाई नहीं देते। जो अपने धर्म का पूरी निष्ठा से पालन करता है, उसे दूसरे धर्मों से द्वेष नहीं होता।

इसमे ऐसा नहीं कहा गया है कि सिर्फ़ हमारे धर्म को मानने वालों को स्वर्ग या ईश्वर की प्राप्ति होगी और बाकी धर्मों को मानने वाले नरक मे जाएंगे।

धर्म को लेकर ऐसी व्यापक और उदार सोच को सही अर्थों में समझना आज पूरे विश्व की आवश्यकता है।  धर्म के नाम पर तीसरे विश्वयुद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में सनातन धर्म के सिद्धांत विश्व को महाविनाश से बचा सकते हैं। सनातन धर्म की सहिष्णुता आज विश्व का आदर्श है।

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