क्या बच्चा हकलाता है.. 

क्या बच्चा हकलाता है.. 

मेरे एक मित्र का आठ वर्षीय पुत्र बोलते समय हकलाता है। यह प्रवृत्ति उसमें बाल्यकाल से ही है, किंतु अब समस्या गंभीर हो गई है। उस बच्चे में हीनभावना घर कर गई। वह अधिकांश  समय  चुप, उदास और आत्मलीन रहता है। 

असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहने के कारण उसमें स्वाभाविक आत्म विश्वास का विकास नहीं हो पाया है और न ही उसके मित्र बन पाए हैं। कुल मिलाकर उसका संपूर्ण व्यक्तित्व ही कुंठित हो गया। इसके लिए मुख्य रूप से उसके अभिभावक दोषी हैं, जिन्होंने समय रहते बच्चे के हकलाने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण करने के प्रयास नहीं किए।

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वस्तुत: तुतलाना और हकलाना कोई रोग नहीं हैं बल्कि यह भाषा-दोष की श्रेणी में आते हैं। जहां तक हकलाहट का प्रश्न है, यह दो प्रकार की होती है।

पहले किस्म की हकलाहट स्वर से संबंधित होती है। इसमें बच्चा प्रथम शब्द बोलते समय अटकता है, लेकिन आगे वह पूरा वाक्य बिना हकलाए धाराप्रवाह बोल सकता है। इस प्रकार की हकलाहट का मुख्य कारण स्वर-तंत्र में कोई गड़बड़ी होना है।

दूसरे किस्म की हकलाहट में बच्चा किसी एक शब्द पर अटक जाता है और उस शब्द का उच्चारण कई बार करता है। जैसे मटका फूट कहेगा- मटकी फ-फ-फ फूट गई। इस प्रकार की हकलाहट के शिकार बच्चे अक्सर हीनभावना से ग्रस्त, स्वयं को असुरक्षित महसूस करने वाले होते हैं।

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कई बार हकलाने में आवाज एकदम अवरुद्ध हो जाती है। कुछ समय तक मुंह से कोई ध्वनि नहीं निकल पाती, गला रुंध जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चा थोड़ी देर के लिए उच्चारण कर पाने में असमर्थ हो जाता है। बोलने के प्रयास में जबड़े और होंठ हिलते रहते हैं, किंतु आवाज नहीं निकल पाती है। ऐसी स्थिति हकलाने वाले बच्चों में प्रायः अजनबी या विशेष व्यक्तियों से बात करते समय उत्पन्न होती है।

हकलाने अथवा तुतलाने की शुरूआत ढाई से साढ़े तीन वर्ष की आयु में प्रारंभ होती है, जो सामान्यतः छह से सात वर्ष की अवस्था तक क्रमशः कम होती हुई समाप्त हो जाती है। यदि इस आयु के बाद भी बच्चों का हकलाना जारी रहता है, तो अभिभावकों को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वैसे तो हकलाहट की शुरूआत होते ही इस पर नियंत्रण के प्रयास करना ही सर्वोत्तम माध्यम है।

तुतलाने और हकलाने के संबंध में अनेक अनुसंधान किए गए। इनके निष्कर्ष से जो परिणाम सामने आए, उनसे ज्ञात होता है कि इसके लिए अनेक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और संवेगात्मक कारण उत्तरदायी हैं।

हकलाने का सबसे मुख्य कारण यह है कि बच्चा अपने परिजनों या मित्रों से उच्चारण का गलत ढंग सीख जाता है। आमतौर पर बच्चे के तुतलाकर बोलने पर परिवार के सदस्य उसकी त्रुटि को ठीक करने के बजाए उससे आनंदित होते हैं। इससे बच्चे को तुतलाकर बोलने हेतु प्रोत्साहन मिलता है। धीरे-धीरे इस प्रकार बोलना उसकी आदत में शुमार हो जाता है। बाद में उसकी इस बोली का घर से बाहर मजाक उड़ाया जाता है, तो यह हीनता से ग्रस्त होकर हकलाने लगता है।

बच्चों की हकलाहट पर बिलकुल शुरूआत में ही ध्यान दिया जाना चाहिए। हकलाने अथवा तुतलाने की प्रवृत्ति को हर्गिज प्रोत्साहित न करें। हकलाने वाले बच्चों का कभी मजाक नहीं उड़ाएं। उसे ऐसे माहौल में रखें, जहां उसका इस कमजोरी के कारण उपहास नहीं किया जाता हो। उसमें आत्मविश्वास का संचार करें। जिस शब्द को बोलने में वह अटकता हो, उसका उससे बार-बार जोर से उच्चारण कराएं। बच्चे की प्रशंसा करने में कंजूसी नहीं दिखाएं। उसे बार-बार प्रोत्साहित करें।

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यह आवश्यक नहीं कि बच्चा हर परिस्थिति में हकलाए। जो बच्चा बात करते समय हकलाता है, वह अक्सर गाते समय नहीं हकलाता। आप बच्चे को ऊंचे स्वर में गाने के लिए कहें, निश्चित रूप से उसकी हकलाहटे गाने से कम होगी। ऐसा देखा गया है कि नियमित रूप से गाना गाने से कई बच्चों की हकलाहट स्वतः समाप्त हो गई।

बच्चों के सामने सदैव स्पष्ट भाषा में बात करनी चाहिए। उनके गलत उच्चारण पर तुरंत उन्हें टोक कर सही उच्चारण की जानकारी देनी चाहिए। समस्या अधिक गंभीर होने की स्थिति में किसी वाणी-विशेषज्ञ (स्पीच थिरापिस्ट) से परामर्श लिया जा सकता है।

कैलाश भवानी

EDITOR DESK



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