द्रौपदी का यह पक्ष कम ही लोग जानते हैं -दिनेश मालवीय

द्रौपदी का यह पक्ष कम ही लोग जानते हैं

-दिनेश मालवीय

भारतीय संस्कृति में द्रौपदी को पंच महकन्याओं में सबसेपहला स्थान मिला है. इन्हें महानतम स्त्रियाँ माना गया है. महाभारत के महाविनाशकारी युद्ध का जिम्मेदार द्रौपदी को ठहराय कुछ हद तक ही सही है. यह सच है कि इन्द्रप्रस्थ में उसने देवर के नाते दुर्योधन से परिहास में कुछ ऐसा कह दिया था, जो कदाचित नहीं कहा जान चाहिए था.इसमें उसका कुछ दुर्भाव नरहाहो, लेकिन दुर्योधन तो कुटिल बुद्धि था ही, लिहाजा उसने इस अपना अपमान मान लिया.

लेकिन महाभारत का यह एक मात्र कारण नहीं था. महाभारतयुद्ध की नींव तो उसी दिनरख दी गयी थी, जिस दिन महाराज शांतनु के पुत्र देवव्रत ने आजीवन विवाहित रहने की प्रतीज्ञा ली थी, और इसी भीष्म प्रतीज्ञा के कारण वह भीष्म कहलाये.

द्रौपदी को आमतौर पर बहुतजिद्दी स्त्री माना जाता है. अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वह अपने केशों को तबतक खुला रखेंगी जब तक भरी सभा में उन्हें घसीट कर लाने और उन्हें निर्वस्त्र करने का प्रयास करने वाले दुशासन की छाती के लहू से उन्हें धो नहीं लेंगी. वह समय-समय पर भीमसेन को अपनी यह प्रतीज्ञा याद दिलाती रहीं. सत्य प्रतिज्ञ और शांतिप्रिय युधिष्ठिर ने जबभी शांति का पक्ष लिया और युद्ध से विरत होने की बात कही, वह चंडी के रूप में आ गयीं और उन्हें मर्यादा की सीमा में रहकर उन्हें धिक्कारा भी. इससे आमतौर पर यह समझा जाने लगा कि वह बहुत कठोर ह्रदय वाली क्रूरस्त्री थीं.

लेकिन ऐसा नहीं है. व्यक्ति के चरित्र के अनेक पहलू होते हैं. द्रौपदी के भीतरभी एक बहुत कोमल ह्रदय था. भगवान श्रीकृष्ण के लिए उनके मन में अपार भक्तिथी. उनकीश्रद्धा इतनी सच्ची थी कि कुरु सभा में जब उन्हें निर्वस्त्र करने का प्रयासकिया गया और उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया तो, उन्होंने अपनी अलौकिक शक्ति से उनके चीर को निरंतर इतना बढाया की दुशासन थक-हार करबैठ गया. वनवास के समय भी द्रौपदी की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण ने ही दुर्वासा के श्राप से पांडवों की रक्षा की. सच पूछिए तो यदि श्रीकृष्ण पांडवों के साथन होते, तो युद्ध दुर्योधन के पक्ष में जाना निश्चित था. उन्होंने कदम-कदम पर पांडवों की रक्षा की.

निश्चय ही द्रौपदी बहुतदृढ़ संकल्पवान स्त्री थीं और उनके निश्चय बहुत अटल होते थे.लेकिनयह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके इस कठोरहृदय में कहीं एक बहुत कोमल और क्षमाशील कोना भी था. युद्ध समाप्ति के बाद द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को गुरुपुत्र अश्वत्थामा ने धोखे से मार डाला. अर्जुन उसे मार डालना चाहते थे. लेकिन द्रौपदी ने गुरु पुत्र को मारने से अर्जुन को रोकदिया.

इसी प्रकार वनवास दौरान जब दुर्योधन की बहन के पतिराजा जयद्रथ ने द्रौपदी का अपहरण कर उनके साथ ज्यादती की कोशिश की और भीमसेन ने उसे पकड़कर मार डालने की कोशिश की, तो द्रौपदी ने भीमसेन को ऐसा करने सेरोक दिया. उन्होंने कहा कि क्याआप अपनी बहन को स्वयं विधवा बनाएँगे? हालाकि नीच कभी अपनी नीचता नहीं छोड़ता. इसी जयद्रथ ने महाभारत युद्ध के दौरान अभिमन्यु के छलपूर्वक वध में सबसे बड़ीभूमिका निभाई.

द्रौपदी का चरित्र इतना महान था कि उसका बड़े-बड़े संतों नेबखान किया है. कहा गया है कि ऐसाकौन चतुर कवि है, जो महान पतिव्रता द्रौपदी के चरित्र का वर्णन कर सके. प्रारब्धवश उन्हें पाँच पतियों का वरण करना पड़ा, लेकिन उन्हें महान सती स्त्रियों में स्थान दिया गया. उन्होंने पाँचों पतियों में से किसीके साथ कभी रत्तीभर भेद नहीं किया और अपने पतिव्रत धर्म का ऐसा पालन किया कि वहएक मिसाल बन गयी.

इस प्रकार द्रौपदी एक बहुत दृढ संकल्पवान और हठी होने के साथ-साथ एक कोमल ह्रदय की स्त्री भी थीं और उनमें क्षमा करने का भी बड़ा गुण था.

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