रात की Artificial light जलने से धरती हो रही धीरे- धीरे तबाह, वैज्ञानिकों ने कहा- भयानक होंगे नतीजे  

रात की Artificial light जलने से धरती हो रही धीरे- धीरे तबाह, वैज्ञानिकों ने कहा- भयानक होंगे नतीजे  
एक रिसर्च में पता चला है कि मानव द्वारा बनाई गयी लाइट से निकले प्रकाश (Man-made Artificial Light) को भी प्रदूषण के दूसरे रूपों की तरह ही माना जाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि यह natural world के लिए श्रंखलाबद्ध तरीके से समस्या पैदा कर रहा है.

 University of Exeter के जीवविज्ञानिकों की एक टीम के रिसर्च अनुसार, धरती पर मानव निर्मित रोशनी (Man made lights) प्रति वर्ष लगभग 2% बढ़ रही है. यह एक बड़ी समस्या है, जिसकी तुलना जलवायु परिवर्तन से की जा सकती है. ये परेशानी जब और ज्यादा हो जाती है जब हमारे देश में दिवाली का त्यौहार आता है. इस त्यौहार में light pollution के साथ Air pollution का स्तर भी बड जाता है. मगर कुछ भी आज के मानव को सिर्फ अपनी खुशी से मतलब है फिर चाहे आने वाली पीडी को जो परेशानी झेलना हो वो उनके खुद के उपर है.    

University  की इस स्टडी से जुड़ा पेपर Nature Ecology and Evolution पत्रिका में प्रकाशित हुआ. इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने बताया, एक ओर जहां इससे जीवों का हार्मोन स्तर , प्रजनन चक्र (breeding cycles) और गतिविधि पैटर्न प्रभावित हो रहा है. वहीं यह शिकारी जीवों के लिए बाधा भी पैदा कर रही है. प्राकृतिक वातावरण में प्रकाश प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न प्रकार की शारीरिक और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है और इसके परिणामस्वरूप, प्रजातियों, समुदायों और पारिस्थितिक तंत्रों पर light pollution के प्रभाव महत्वपूर्ण रूप से उभर रहे हैं।

Modification of nighttime light levels by artificial illumination (artificial light at night; ALAN) is a rapidly increasing form of human disturbance that affects natural environments worldwide. Light in natural environments influences a variety of physiological and ecological processes directly and indirectly and, as a result, the effects of light pollution on species, communities and ecosystems are emerging as significant.

बिगड़ रहा है पशु-पक्षियों की नींद का चक्र
वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी में इन बुरे प्रभावों का जिक्र भी किया है. जैसे,
  • वसंत ऋतु की शुरुआत में कीटों के जरिए होने वाले पेड़-पौधों के परागण में कमी आती है.
  • लाइटहाउस के चलते समुद्री पक्षी दिशा भटक जाते हैं.
  • समुद्री कछुए सवेरे का सूरज समझ गलती से चमचमाते होटलों की ओर चले जाते हैं.
सभी जानवरों की प्रजातियां, जिन्हें इस स्टडी में जोड़ा गया था, उनमें वैज्ञानिकों ने मेलाटोनिन के स्तर को कम पाया. यह एक हार्मोन होता है, जो नींद के चक्र को नियंत्रित करता है. जानवरों में ऐसा रात में कृत्रिम प्रकाश की वजह से हुआ.
कुछ जीवों का फायदा लेकिन ज्यादातर के लिए नुकसानदेह
बहुत से जानवरों को इससे दिक्कत हो रही है वहीं रिसर्च में देखा गया कि कृत्रिम रोशनी से सामान्य और रात्रिचर दोनों ही प्राणियों के व्यवहार में बदलाव देखा गया. बड़े चूहे, जो ज्यादातर रात में शिकार करते हैं, वे artificial light के जलने से कम समय के लिए ही शिकार कर पाये. जबकि कुछ पक्षियों ने सूरज निकलने से पहले ही चहकना शुरू किया और दिन होने से पहले ही कीड़ों की खोज में निकल गये.

वैज्ञानिकों ने रिसर्च में पाया कि कुछ प्रजातियों ने रात के प्रकाश से फायदा उठाया. इससे कुछ पौधे तेजी से बढ़े और कुछ प्रजातियों के चमगादड़ों की संख्या बढ़ गई. लेकिन आखिर में नतीजा यही निकला के सभी प्रजातियों पर पड़े संयुक्त प्रभाव को देखें तो यह विनाशकारी ही था. खासकर बहुत गर्म बल्बों या तेज गति वाली कार की बत्तियों की ओर खिंचे चले आए कीड़ों के लिए. आज के समय में ये भी देखा जा रहा है के बड़े होटलों में या फिर बड़ी जगहों पर light से मरने वाले उपकरणों का भी उपयोग हो रहा है. जिससे छोटे कीट -पतेंगे इसकी तरफ आकर्षित होते है और करंट लगने से मर जाते है.

LED बल्बों के चलते और बढ़ रही है समस्या
विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और स्टडी के प्रमुख लेखक केविन गैस्टन ने कहा, "जो बात निकल कर सामने आई है, वह यह है कि ये प्रभाव कितने व्यापक हैं. ये प्रभाव हर जगह पाए गए- रोगाणुओं, अकशेरुकी जीवों, जानवरों और पौधों सभी पर.”उन्होंने कहा कि हमें कृत्रिम प्रकाश के बारे में सोचना शुरू करना होगा.

उनका कहना है कि पिछले 5 से 10 सालों में इस विषय में अध्ययन बढ़े हैं क्योंकि दुनिया में कृत्रिम प्रकाश की मात्रा बढ़ी है. और प्रभाव अधिक स्पष्ट हो गए हैं. उपग्रह से रात में ली गई पृथ्वी की तस्वीरें बताती हैं कि भौगोलिक रूप से यह समस्या कितनी तेजी से बढ़ रही है. और कितना व्यापक रूप ले रही है.  क्योंकि महंगे कम रोशनी वाले बल्बों को सस्ते ज्यादा सफेद चमकीली रोशनी देने वाले एलईडी बल्बों से बदला जा है. यह जैविक रूप से बड़ी समस्या है क्योंकि सफेद रोशनी में सूरज की रोशनी की तरह व्यापक स्पेक्ट्रम होता है.


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