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आवासीय भवन का प्रभाव व्यक्ति पर

आवासीय भवन का प्रभाव व्यक्ति पर

लोग ज्योतिष का उपयोग अपने भविष्य को जानने के लिए करते आए हैं, लेकिन अब मकानों के निर्माण में भी होने लगा है। वर्तमान में लोग यह मानने लगे हैं कि मकानों की दिशा, में रखी जाने वाली वस्तुएं और उनका आकार भी व्यक्ति के जीवन को बना या बिगाड़ सकता है। 

व्यक्ति की राशि और जीवन के गुण-दोष के आधार पर मकानों और इमारतों का निर्माण करने की इस विधा को वास्तुशास्त्र कहा जाता है। वास्तुशास्त्रियों का तो यहां तक कहना है कि मकान की बनावट दिमाग और आत्मा पर काफी प्रभाव डालती है। 

यदि मकान की बनावट ही गलत होगी तो उसमें रहने वाला न तो सहज रह पाएगा और न ही उसका दिमाग ठीक काम करेगा। कुछ वर्ष पहले तक हमारे देश में वास्तुशास्त्र में शायद किसी की दिलचस्पी नहीं थी लेकिन पश्चिमी देशों में वास्तुशास्त्र का प्रचलन बढ़ने के बाद अब भारत में भी लोग वास्तुशास्त्र में दिलचस्पी लेने लगे हैं।

 
हालांकि शुरू में उद्यमी और व्यापारी अपनी फैक्ट्रियों और दुकानों के निर्माण के लिए ही वास्तु शास्त्रियों की मदद लेते थे लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से इसका प्रचलन इतना अधिक बढ़ गया है कि अब लोग अपने मकानों के लिए भी आर्किटेक्ट के साथ-साथ वास्तु शास्त्रियों की सलाह भी लेने लगे हैं। 

फलस्वरूप वास्तुशास्त्र की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। जाने-माने वास्तु शास्त्र और अमेरिका स्थित हिन्दू विश्वविद्यालय के संयुक्त प्रोफेसर डा. दिनेश शर्मा का कहना है कि वास्तुशास्त्र केवल अंधविश्वास नहीं है बल्कि इसका ठोस वैज्ञानिक आधार है। 

जिस तरह बिना खिड़की और रोशनदान वाला मकान बीमारी का घर बन जाता है, उसी तरह वास्तुशास्त्र के प्रतिकूल बना मकान कई समस्याओं को जन्म देता है। डा. शर्मा का कहना है कि दरअसल, वास्तुशास्त्र कोई नई विधा नहीं है। 

यह तो हजारों वर्ष से हमारे देश में थी लेकिन बाद में लोग इसे भूल गए। यदि पांच हजार वर्ष बाद भी वास्तुशास्त्र के सूत्रों का सही उपयोग किया जातो आधनिक यग में लोगों की कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। 

उनका कहना है कि इस शास्त्र के वैज्ञानिक आधार है, यही कारण है कि पश्चिमी देशों में इस विधा का भरपूर उपयोग किया जा रहा है। वैसे भारत में हजारों वर्ष पूर्व मंदिरों के निर्माण में भी इस शास्त्र का उपयोग किया जाता था। उस समय की कई परंपराएं अब तक प्रचलित रही हैं।

ज्योतिष और आयुर्वेद के बाद वास्तुशास्त्र ही ऐसी विधा है, जो वैदिक काल की देन है। यह विश्व उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बीच बसा हुआ है। इन ध्रुवों के बीच चुम्बकीय तरंगें प्रवाहित होती रहती हैं। यही तरंगे मानव जीवन को प्रभावित करती है। 

यदि इन तरंगों के विपरीत दिशा में कोई व्यक्ति सोए तो उसके मस्तिष्क पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। 

वास्तु शास्त्रियों का मानना है कि तरंगों का उत्तर से दक्षिण की ओर सतत प्रभाव रहता है इसलिए घरों की बनावट ऐसी होनी चाहिए ताकि ये प्रभाव न गड़बड़ाए।

वास्तु शास्त्रियों का कहना है कि इन ठोस तर्को के कारण ही विदेशों में वास्तुशास्त्र लोकप्रिय है। कोरिया और चीन में तो यह फेंगसुई के नाम से काफी समय से प्रचलित है। 

इन देशों में तो हालत यह है कि वित्तीय संस्थाएं, उन औद्योगिक इकाइयों या परियोजनाओं को ऋण ही नहीं देतीं, जिनकी इमारतों के नक्शे को किसी वास्तुशास्त्री ने अपनी स्वीकृति न दी हो। 

वहां तो कमरों में फर्नीचर भी वास्तुशास्त्रियों की सलाह लेकर ही रखा जाता है। विदेशों की देखा-देखी भारत में आधुनिक विचारों वाले लोग भी अब वास्तुशास्त्र को स्वीकार करने लगे हैं।

वास्तु शास्त्रियों का कहना है कि यदि मकान का उत्तर और पूर्वी भाग बंद हो तो उससे ऊर्जा धारा प्रवाह नहीं बहती। इसी तरह मकान का उत्तर-पूर्वी भाग हमेशा नीचा होना चाहिए ताकि ऊर्जा का प्रवाह न रुके।

 मकान के चारों कोने 90 डिग्री का कोण बनाएं तो वह आदर्श मकान हो सकता है। इसी तरह उत्तर-पूर्वी कोना, दक्षिण-पूर्वी कोने से बड़ा नहीं होना चाहिए। सड़क समाप्त होने पर बना मकान उसमें
रहने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। 

जिस मकान के दक्षिणी भाग में गहरा गड्ढा होता है, उस मकान में रहने वाली महिलाओं का स्वास्थ्य गड़बड़ा सकता है।

वास्तुशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि व्यक्ति की ऊर्जा लगातार चार्ज हो रहे ताकि वह परेशानियों से हमेशा दूर रहे।

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