कालयवन का अंत———————-श्रीकृष्णार्पणमस्तु -13

कालयवन का अंत

                             श्रीकृष्णार्पणमस्तु-13
रमेश तिवारी 
कालयवन और जरासंध साम्राज्यवादी थे। वे अपने देश की सीमाओं को बढा़ने के लिए कुछ भी कर सकते थे। और श्रीकृष्ण लोकहित में कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहते थे। यहीं देखें-कृष्ण ने यादवों की प्राणरक्षा की दृष्टि से स्वयं को ही कालयवन के सामने प्रस्तुत कर दिया। ताकि साम्राज्यवादियों के आक्रमण के पूर्व ही यदुवंशी समय रहते द्वारका पहुंच जायें।

कालयवन ने कृष्ण का पीछा उनका वध करने की दृष्टि से इसलिये किया, क्योंकि कृष्ण ने दो बातें कीं-एक तो वे दुस्साहस करके स्वयं ही शेर की माद में जा धमके। और दूसरी कूटनीतिक बात यह भी कह दी कि मैं तुमको मथुरा सौंपने आया हूं। और यह प्रस्ताव भी रखा कि अभी चलो, जरासंध के मथुरा पहुंचने के पूर्व ही मैं तुमको मथुरा सौंप देता हूं, अन्यथा वह मथुरा पर अधिकार कर लेगा।

कालयवन कृष्ण के पीछे पीछे भागते हुए जब धौलगिरि की पहाडि़यों तक आ पहुंचा। घोडे़ पर बैठे कृष्ण उसको पलट पलट कर देखते चल रहे थे। उन्हें लगा कि अब दूरी का फासला कुछ अधिक हो गया है और कालयवन थक भी चुका है। श्रीकृष्ण ने तत्काल घोडा़ रोका। पगडंडी भी छोड़ दी और उंची टेकरी की ओर भागने लगे। 

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कालयवन को लगा कि यह चकमा देकर कहीं छिपने वाला है। अतः उसने भी पैदल भागकर पकड़ना ही ठीक समझा। भारी भरकम कालयवन को शिरस्त्राण और अस्त्रों का भार भी असहनीय और भागने में कष्ट दे रहा था। अतः उसने घोड़े के बाद एक एक अस्त्र भी त्याग दिये। पीतल की बजनदार गदा भी फेंकना पडी़। 

श्रीकृष्ण ने पलटकर देखा। हांफता और पसीने में तर कालयवन अब निहत्था हो गया है। वे मुस्कुराये। अब ठीक रहा। अब दोंनों में युद्ध होगा, तो बुद्धि और शक्ति का। गायों का धारोष्ण (गर्म) दूध और माखन खाने वालेे कृष्ण आगे पहाडी़ की ओर देखते भागे जा रहे थे। किंतु मांसभक्षी और शरीर से भारी बजनी कालयवन की दुर्दशा पर भी दृष्टि डालते रहते थे।

श्रीकृष्ण को पहाडी़ के शीर्ष पर छै गुफायें दिखीं। संयोग से श्रीकृष्ण जिस गुफा में शरण लेने प्रविष्ट हुए। वहां कुछ सूझ नहीं रहा था। धूप में से भागते आये कृष्ण को चुंधियाई आखों से उस गुफा में कुछ ऋषि तपस्या करते दिखे। कृष्ण की दृष्टि एक सोते हुए ऋषि पर भी पडी़। वह ऋषि अर्ध नग्नावस्था में सो रहे थे। पास में अग्नि कुंड धधक रहा था। घुप्प अँधेरा था। कृष्ण के दिमाग में एक अनोखी तरकीब आई। असाधारण विपत्ति में भी विवेक जागा। क्यों न इन ऋषि महोदय को यह पीताम्बर ओढा़ दिया जाये। 

कालयवन को चकमा देने की दृष्टि से कृष्ण ने ऋषि को पीताम्बर ओढा़ दिया। कालयवन के साथ भावी द्वंद की संभावना को देखते हुए श्रीकृष्ण समीप ही छिपकर विश्राम कर शत्रु की प्रतीक्षा करने लगे। द्वेष, क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में अंगारे की तरह धधकता, धौंकनी की तरह श्वास लेता कालयवन गुफा में प्रविष्ट हुआ! फिर चीखा.! ग्वाला अब कहां जायेगा बचकर! 

इसी हड़बोंग में उसकी दृष्टि सम्मुख निद्रामग्न ऋषि पर पडी़। अरे..! पीताम्बर ओढ़ कर सोने का बहाना कर रहा है। पीताम्बर ओढे ऋषि को कृष्ण समझकर कालयवन ने कटार निकल ली। और फिर जैसे ही टूट पडने को हुआ, ऋषि पर..! और ऋषि को कटार मारनी चाही। ऋषि ने सिंह की भांति लपककर कालयवन का हाथ पकड़कर उसको पटकनी दे मारी। यह पटकनी भी असाधारण थी। 

कालयवन समीप धधक रहे अग्नि कुंड में जा गिरा। और झुलसने लगा। यह दृश्य देखते ही ऋषि के अन्य साथी भी त्रिशूल लेकर कालयवन पर टूट पडे़। और कालयवन का अंत होते ही श्रीकृष्ण हौले से ऋषि के समीप आये और विनम्रता पूर्वक, कि ऋषिवर मैं "कृष्ण" हूँ! कहकर अपना परिचय दिया। पूरा घटनाक्रम भी बताया। सोते हुए ऋषि कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। वे विश्व विजेता मांधाता के पुत्र मुचकुंद थे। उन्होंने कभी इंद्र से भी युद्ध किया था। ऋषि ने कहा- अच्छा तुम कृष्ण हो। मैने तुम्हारा नाम सुना है़।

आज की कथा बस यहीं तक।  तब तक विदा। 
                                        धन्यवाद ।

Priyam Mishra



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