इन योग आसनों से हर रोग हो जाता है दूर: क्रियाएं जो हमें शतायु बनाती हैं|

इन योग आसनों से हर रोग हो जाता है दूर: क्रियाएं जो हमें शतायु बनाती हैं:

 

योग की महिमा बड़ी अपार, लम्बी उम्र दे सौ से पार । 

रोग भी जाता उससे हार, खुशियों की होती बौछार ||

भारतीय ऋषि-मुनियों तथा योगियों के जीवन हमें बताते हैं कि योगाभ्यास हमें जरावस्था से बचाने में सक्षम है। योग जहां हमें स्वस्थ रखता है, वहां हमारी आयु भी लम्बी बनाता है। अष्टांग योग के आठ सोपान एक तरह का कायाकल्प करते हैं।

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आइये जानें कौन-कौन सी क्रियाएं हैं जो हमें शतायु बनाती हैं :-

शुद्धि क्रियाएं :-

शुद्ध क्रिया
हठयोग में शुद्धि क्रियाओं के द्वारा शरीर शुद्ध किया जाता है। नेति, धौति, वस्ति(एनीमा), कुंजल, शंख प्रचालन, नौलि, दांतों को साफ करना, स्नान, मालिश आदि के द्वारा शरीर में व्याप्त विजातीय द्रव्य निकालना सहज हो जाता है। इनसे शरीर हल्का-फुल्का व निरोग बना रहता है। 

यम-नियम का पालन :-

यम सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, आस्तेय, अपरिग्रह |

नियम शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान (समर्पण) आदि के द्वारा व्यक्तिगत तथा सामाजिक अनुशासन पालन करने से तन-मन सशक्त बनता है। जीवन सादा व सदाचारी होता है। इच्छाएं कम होती हैं। तनाव से मुक्ति मिलती है। मन प्रसन्न बना रहने से आयु लम्बी होती है। ब्रह्मचर्य पालन पर अधिक बल देने से आयु बढ़ती है।

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आसन, मुद्राएं और अन्तःस्रावी ग्रन्थियां :-

व्यायाम की अपेक्षा योगासन व मुद्राएं वे प्रभावशाली शारीरिक क्रियाएं हैं जो वैज्ञानिक हैं और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को संतुलित रखती हैं। इनसे हारमोन्स सम अवस्था में और नियंत्रित स्थिति में प्रवाहित होते हैं। मन में उचित विचार, शरीर की पुष्टि तथा सुडोलता बनती है। प्रतिभावान बनने में सहायता मिलती है। ये ग्रंथियां हैं पीनियल, पिट्यूटरी, थायराइड, पैराथायराइड, थायमस, एड्रीनल तथा जनन ग्रन्थियां। इनसे निकलने वाले रसायन सीधे खून में मिलते हैं तथा व्यक्तित्व का गठन करते हैं। 

ये ग्रन्थियां शारीरिक दृढ़ता, सुन्दरता, स्फूर्ति, इन्द्रिय क्षमता, जीवनी शक्ति से लेकर मानसिक प्रखरता तथा चिर यौवन का लाभ जीवन पर्यन्त तक प्रदान करती हैं। कुछ आसन/मुद्राएं हैं जो हमारी रीढ़ में लचक, स्नायुओं में नमनीयता, स्फूर्ति तथा शरीर से उत्पन्न अमृत को सुरक्षित रखती है।

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सूर्य नमस्कार :-

सूर्य नमस्कार
नमस्कार की स्थिति में सीधे खड़े हो। श्वास भरते हुए दोनों हाथ ऊपर तानते हुए पीछे की और झुकें। श्वास छोड़ते हुए आगे झुकते हुए दोनों हथेलियों को पैरों के दाएं-बाएं रखें। श्वास भरते हुए दायां पैर पीछे ले जाएं। गर्दन पीछे, सीना तना हुआ। पिछला पंजा मुड़ा हुआ। श्वास छोड़ते हुए दूसरा पैर पीछे से जाएं। ठोड़ी कंठ में लगाकर शरीर को पीछे की ओर धकेलें। 

श्वास भरते हुए आठ अंग आसन पर लगाएं। श्वास सामान्य करें। श्वास भरते हुए, आगे सरकते हुए धड़ ऊपर उठाएं। गर्दन पीछे रहे। दायां पैर आगे हाथों के बीच में लाएं। उसी क्रम में वापिस आएं। यह 12 स्थिति में और 12 मंत्रों के साथ सूर्य’नमस्कार है जो दीर्घायु बनाता है। इसकी यथाशक्ति आवृत्तियां करें। मंत्रों का उच्चारण मन ही मन हर स्थिति लाने से पूर्व करें। 

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मंत्र :-

ॐ मित्राय नमः, ॐ सूर्याय नमः, ॐ खगाय नमः, ॐ रवये नमः, ॐ भानवे नमः, ॐ पूष्णे नमः, ॐ हिरण्य गर्भाय नमः, ॐ मरीचये नमः, ॐ आदित्याय नमः, ॐ अर्काय नमः, ॐ सावित्रे नमः, ॐ भास्कराय नमः। 

अर्ध मत्स्येन्द्रासन :-

अर्ध मत्स्यें 
दोनों पैर फैलाकर बैठें। बाएं पैर को मोड़कर एडी बाएं नितम्ब से सटा दें। दाएं पैर को खड़ा करें। बाएं घुटने के पास तलवा रखें। बाएं हाथ से दांया घुटना दबाते हुए बांए पैर का पंजा पकड़ें। दाया - हाथ व गर्दन पीछे की ओर ले जाएं। कुछ देर रुक कर वापस आएं। यही क्रिया दूसरा पैर मोड़कर करें।

मयूरासन :-

मयूरासन
दोनों हथेलियों को धरती पर टिकाएं और कोहनियों को नाभि के दोनों ओर लगाकर मोर के समान, शरीर संतुलित करते हुए सिर पैर एक सीध में रखते हुए ऊपर उठाएं। सभी पेट के विकार दूर होने के कारण दीर्घायु होती है।

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सर्वांगासन :-

योग
पीठ के बल लेटें। हथेलियां बराबर में जमीन पर लगी हुई श्वास भरते हुए पंजों को मिलाकर, तानकर धीरे धीरे समकोण पर लाएं। हथेलियों पर दबाव देते हुए पैर पीछे लेते हुए धड़ को सीधा कर दें। ठोड़ी कंठकूप में लगाएं। हथेलियां पीठ पर अंगुलियां ऊपर रखते हुए रखें। श्वास सामान्य उसी क्रम में वापिस आएं। यदि पैर सीधे ने कर पाएं तो हथेलियों को नितम्बों के नीचे रखते हुए कंधे का कुछ भाग जमीन पर रखा रहने दें। दीर्घायु के लिए श्रेष्ठ आसन है। 

शवासन एवं योग निद्रा :-

शवासन
पीठ के बल लेटें। पैरों में सुविधाजनक फासला हाथ शरीर के पास, नेत्र बन्द शरीर का एक-एक अंग ढीला श्वास को निहारें 5-10 मिनट तक करें योग निद्रा में दीर्घायु का संकल्प दोहराएं 20 मिनट तक बढ़ाएं।

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बंध :-

यूं तो प्राणायाम की सहायक क्रिया है। बंध मृत्यु - जरा पर विजय पाने में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह तीन प्रकार का होता है। 

मूलबंध :- 

बंध
शौचादि से निवृत्त होकर पद्मासन / सिद्धासन / वज्रासन में बैठकर गुदा द्वार को भीतर की ओर सिकोड़े और ऊपर को खींचें यह ब्रह्मचर्य पालन करने, बिगड़ते स्वास्थ्य की रक्षा करने, वीर्य को पुष्ट करने, कब्ज को तथा गुदा क्षेत्र के रोगों को नष्ट करने, जठराग्नि तेज करने, बाल काले बनाए रखने तथा चिर यौवन बनाए रखने में सहायक है। कुण्डलिनी जाग्रत करने में भी इसका योगदान है। शरीर में नई ताजगी आती है।

जालंधर बंध :- 

jandhar bandh
आसन पर बैठकर पूरक करके कुंभक के बाद ठोड़ी को छाती के साथ दबाना इससे प्राण का संचार ठीक होता है। सुषुम्ना नाही में प्राण का प्रवेश सुगम होता है। ब्रह्मरंध से रिसने वाला अमृत सुरक्षित रहता है जो दीर्घायु बनाता है। थायराइड व पैरा थायराइड ग्रंथि पर नियंत्रण होता है।

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उद्दिडयान बंध :- 

Uddiyana Bandh newspuran
ध्यान के आसन में बैठकर पूरा श्वास बाहर निकाले। पेट को भीतर ऊपर की ओर खीचें। नाभि को रीढ़ से लगाएं। इससे चिर पोवन प्राप्त होता है। स्वास्थ्य सुन्दर होता है। कार्यक्षमता बढ़ती है। पेट की मालिश होती है। शरीर हल्का होता है।

त्रिबंध तीनों बंध एक साथ लगाने को निबंध कहते हैं। ध्यान के आसन में बैठकर हाथ घुटनों पर रखे। पूरा श्वास बाहर निकाले (बाहरी कुंभक) मूल बंध लगाएं। फिर जालंधर बंध अंत में उडियान बंध लगाएं। जब रुका न जाए तब पेट ढीला करें। फिर गर्दन सीधी कर मूल बंध खोलें। श्वास भरें। आंतरिक कुंभक से भी त्रिबंध का अभ्यास करें।

नोट: खड़े होकर भी ये बंध घुटने पर हाथ रखकर लगाए जा सकते हैं।

खेचरी मुद्रा :-

khechri mudraजीभ को पीछे की ओर मोड़कर कपाल कुहर/ब्रह्मरन्ध्र में ले जाकर भूमध्य में दृष्टि जमाना ही खेचरी मुद्रा है। इसमें जीभ को दोहन कर लम्बी करनी होती है। इससे ब्रह्मरंध से टपकने वाला अमृत अग्नि में भस्म होने से बचता है। ‘जरा' दोष से मुक्ति मिलती है। यह मुद्रा चिरायु होने में सबसे अधिक सहायक है। इससे भूख प्यास भी नहीं सताती। विशेषज्ञ से ही यह मुद्रा सीखें।

प्राणायाम यूं तो हरेक प्राणायाम दीर्घायु बनाता है परन्तु नाही शोधन अत्यन्त सहायक पद्मासन में बैठकर बायां हाथ जान मुद्रा में रखें। बाएं नाक छिद्र से श्वास बाहर निकालकर 8 की गिनती में श्वास बायीं ओर से भरें। 

32 गिनती में रोकें तथा 16 की गिनती से दाई ओर से निकाले फिर उसी अनुपात में दाई नासिका से भरें, रोकें और बाई ओर से निकालें। इसकी 5-10 आवृत्तियां करें। शुरू में इस स्तर पर न आएं। पहले अनुलोम विलोम का अच्छा अभ्यास करें। धीरे-धीरे आवृत्तियां बढ़ाएं। फिर कुभक शुरू करें धीरे-धीरे आवृत्तियां 36 तक ले जाएं। 21600 दैनिक श्वास घटकर कम हो जाने पर दीर्घायु होती है।

मंत्र-जप :-

महामृत्युंजय जप/गायत्री मंत्र के जप से अमोघ शक्ति उत्पन्न होती है। दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। तेलधारावत् जाप पूरी निष्ठा से होना चाहिए।

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स्वर योग :-

हमारे शरीर में तीन प्रमुख नाड़ियां हैं इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना । इड़ा ठंडी व पिंगला गर्म नाडी है। इनसे होकर पांचों तत्व प्रवाहित होते हैं। इनकी अपनी एक समय सारिणी है। उसके अनुसार प्राण प्रवाह चलाने से व संतुलित तत्व चलाने से, खाना खाते समय दायां स्वर व पानी पीते समय बांया स्वर चलाने से चिर यौवन का लाभ मिलता है। खाना खाकर बाईं करवट लेटना, रात्रि में दायां स्वर चलाना उपयोगी माना गया है।

सात्विक व मिताहार :-

ज्यादा खाना उम्र को घटाता है। ज्यादा खाने से हमारी ऊर्जा उसके पचाने में लग जाती है। सादा भोजन, दो मुख्य भोजन, भूख लगने पर खाना, चबा-चबा कर खाना, छाछ, दही, आंवला (विटामिन सी), शहद, नीबू, आम का रस, फल, दूध, पौष्टिक आहार लेने से आयु लम्बी हुई है।

सकारात्मक सोच, तनावरहित जीवन, सीखते रहने का चाव, सक्रियता, ब्रह्मचर्य, समाज सेवा, कल्याण पथ पर चलना, ठंडे वातावरण में रहना, श्रम, खुश मिजाज, प्रातः उठना आदि लम्बी आयु के सूत्र हैं।

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