लोकगीत: नामकरण एवं पालने के गीत

नामकरण एवं पालने के गीत

Folklore Naming and Cradle Songs-Newspuran

परिवार में एक शिशु जन्म लेता है, तो लोगों की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता। माता- पिता के मन में कितने सतरंगी सपने सजने लगते हैं। वे तरह-तरह से उसके लिये एक सुन्दर नाम की कल्पना करने लगते हैं। उसकी सुख निद्रा के लिये पालना सजाने लगते हैं। उन्हें लगता कि उनका पुत्र देवताओं की कृपा से पैदा हुआ है, वह उनके कुल को उज्ज्वल करेगा, इसलिये ऐसा नाम रखा जाय, जो सार्थक हो। गढ़वाल में इस भाव का एक गीत इस प्रकार है

तू होलो देवी देवता को जायो तू होलो बेटा कुल को उजाला आज जाया तेरो नाऊँ घरवाले तू जाया कुल को रखी नाऊँ

उनके यहाँ जो पुत्र आया है, वह उनकी तपस्या का ही फल है। उसे पाने के लिये माँ ने कितने नियम किये, कितने तीर्थ किये, ताकि उनके घर एक कुलदीपक हो

तू होलो मेरा तपस्या का जायो तेरी जिया ब्वैनं कट कैन कर्म तेरी जिया ब्वे नाम जैन धर्म तेरी जिया बैन तीर्थ का नौ छुबडुल्यों नहेंगे देवता का नौं वीन धारू दुंगी पूजा तू होलो बाला डांडो कू उद्यौऊँ तू बणलो बाला कुल की जोत।

ऐसे कुल के दीपक को पलंग या पालने में सोता हुआ देखकर माँ के आनन्द का पारावार नहीं रहता। वह बार-बार अपने बच्चे को खिलाना चाहती है। वह अपनी कल्पना में बच्चे का बोलना सुनती है और लोगों को सुनाती है। एक गीत में ऐसा ही भाव है

पलंग पर खेल रहो मेरो नन्दलाला आओ दाई माई मुझे भी खेलाओ ये दादी-दादी बोल रहो मेरो नन्दलाला आओ सासू रानी तुम भी खेलाओ, ये दादी-दादी बोल रहो मेरो नन्दलाला ये ताई-ताई बोल रहो मेरो नन्दलाला आओ देवरानीजी तुम भी खेलाओ ये चाची-चाची बोल रहो मेरो नन्दलाला।

आओ नंद रानी तुम भी खेलाओ ये बुआ-बुआ बोल रहो मेरो नन्दलाला आओ जेठानीजी तुम भी खेलाओ

निमाड़ में बच्चे का नाम रखने काम ज्योतिषी का होता है, किन्तु वहाँ ऐसी भी प्रथा है कि गीत गाते-गाते ही पुत्र एवं पुत्री का नाम रख दिया जाता है। इस समय का एक गीत इस प्रकार है

चल रे नाना खेलण जावा मनीष भाई को नांव लेता जावां गुड़ ना घुघरी खाता जावां चल रे नाना स्कूल जावां चल रे नाना स्कूल जीवण जावां बसंत भाई को नांव लेता जावां चल रे नाना गुली अट्या खेलण जावां चल रे नाना चेंडू खेलण जावां किशोर भाई को नांव लेता जावां गुड़ न घुघरी खाता जावां।

शिशु के जन्म के साथ ही उसके लिये सुख-सुविधा जुटाने में लग जाती हैं घर की माता, बहनें, दादा-दादी आदि। उसके बोलने के लिए पालना लगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। शिशुओं को झूला या गोद में थपकी देकर सुलाने वाले गीत पालने के गीत कहलाते हैं

तेरी दादी झुलावै तू झूल ललना मेरा छोटा सा झूले अटल पलना,  मेरा बाला सा झूले अटल पलना, तेरा दादा घड़ी अटल पलना, मेरा बाला सा झूले अटल पलना , तेरा ताऊ घड़ावे अटल पलना, तेरी ताई झुलावे तू झूल ललना, तेरा मामा घड़ी अटल पलना, तेरी मामी झुलावे तू झूल ललना, मेरा बाला सा झुले अटल पलना।

बाल गोपाल सोने के पालने में फूलों-सा फूलता है। बाबा, चाचा उसके लिये सोने का पालना बनवाते हैं और अम्मा, दादी उसे झुलाकर निहाल होती हैं। उत्तरप्रदेश के अन्तर्गत सुल्तानपुर जनपद का एक पालना गीत इस प्रकार है

सखी फूलन माँ फूलै गोपाल लालना उनके बाबा लै आये सोने के पालना उनकी दादी झुलावे झुलौ लालना उनके चाचा लै आये सोने का पालना उनकी चाची झुलावे झुलौ लालना। बच्चे की माँ, बुआ और चाची के सजे-सँवरे हाथ बच्चे को झुलाकर सार्थक होते हैं लाल ललुआ पाजने, मोरी झम-झम झूलै झुलावे ललना की मइया उनके सोने के गजरा हाथ झुलावै ललना की चाची उनके सोने के कंगन हाथ चल रे नाना गुरली अट्या खेलण जावा चल रे नाना चेंडू खेलण जावती किशोर भाई को नाम लेता जावा गुड़ न घरी खाता जावां।

शिशु के जन्म के साथ ही उसके लिये सुख-सुविधा जुटाने में लग जाती हैं घर की माता, बहनें, दादा-दादी आदि। उसके बोलने के लिए पालना लगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। शिशुओं को झूला या गोद में थपकी देकर सुलाने वाले गीत पालने के गीत कहलाते हैं तेरी दादी झुलावै तू झूल ललना मेरा छोटा सा झूलै अटल पलना

मेरा बाला सा झूले अटल पलना तेरा दादा घड़ी अटल पलना तेरा ताऊ घड़ावे अटल पलना मेरा बाला सा झुले अटल पलना तेरी ताई झुलावे तू झूल ललना तेरा मामा घड़ी अटल पलना तेरी मामी झुलावे तू झूल ललना मेरा बाला सा झुले अटल पलना। बाल गोपाल सोने के पालने में फूलों-सा फूलता है। बाबा, चाचा उसके लिये सोने का पालना बनवाते हैं और अम्मा, दादी उसे झुलाकर निहाल होती हैं। उत्तरप्रदेश के अन्तर्गत सुल्तानपुर जनपद का एक पालना गीत इस प्रकार है

सखी फूलन माँ फूलै गोपाल लालना उनके बाबा लै आये सोने के पालना उनकी दादी झुलावे झुलौ लालना उनके चाचा लै आये सोने का पालना उनकी चाची झुलावे झुलौ लालना। बच्चे की माँ, बुआ और चाची के सजे-सँवरे हाथ बच्चे को झुलाकर सार्थक होते हैं लाल ललुआ पाजनें, मोरी झम-झम झूलै झुलावे ललना की मइया उनके सोने के गजरा हाथ झुलावे ललना की चाची उनके सोने के कंगन हाथ झुलावै ललना की बुआ उनके सोने की गुंजै हाथ।

बच्चे को कृष्ण कन्हैया का रूप माना गया है। उसके लिये चन्दन का पालना बना है. जिसमें रत्न जड़े हैं और रेशम के फुँदने लगे हैं। रोते हुए बच्चे को शायद किसी की नजर लग ई है- इसलिये माता यशोदा राई, नमक से औंछकर उसकी नजर उतारती हैं। यही नहीं, बालक का पालना झुलाने वाली को जड़ाऊ कंगन देने का आश्वासन भी देती हैं झुला दै मैया श्याम परे पलना।

काये के तेरे पलना बने, काय के कुंदा। रतन जरे चन्दन के पलना, रेसम के फुंदना। अगर चन्दर को बनो पालना, रेसम के कुंदा। काहू गुजरिया की नजर लगी है, सो रोउत है ललना। राई नॉन उतारो जसुदा, कुर्सी भये ललना। जो मोरे ललना को पलना झुलैहें, दैहौं जड़ाऊ कंगना।

जिसके आँगन में बच्चे के लिये पालना बनता है, उसके आनन्द का क्या कहना? बड़े भाग्य से यह शुभ दिन देखने को मिलता है

झुलइयो सखि लाल को पलना रे चंदन को गढ़वइहो हिंडोला अपने सुन्दर अंगना रे मधुर मधुर स्वर लोरी गइहों बिन बँसुरिया बजना रे अपने लाल पर वारी आभूषण दुलरि तिलरि कंगना रे बड़ भाग से शुभ दिन आयो ललना झूलत पलना रे। नन्दलाल को केवल यशोदा मैया नहीं, उनकी सखियाँ भी झुलाने का आनन्द लेती हैं

झूले नन्दलाल झुलाओ सखि पालनो काय की लागी डोर, काय के लागे फुँदना अन्दन-चन्दन बनो पालनो को ए लेत बलैयाँ रेसम लागी डोर, मोतिन लागे फुँदना को ए झूले को ए झुलावे झूले नन्दलाल झुलावैं सब सखियाँ जसोदा लेत बलैया, नन्द मुँह चूमना। कृष्ण का पालना चन्दन का बना है तो कौशल्या के लाल का पालना सोने का बना है झूलत नया पलना पालना रे कौसल्या तेरे ललना लालना रे कधी के ऊन के बने पलनवा कथी के लागे फुलना फूलना रे रेसम के लागे फुलना फूलना रे। सोने के ऊन के बने पलनवा खने दुलारे मैया खने झुलावे खनहि खन मुखवा चूमना रे। प्रत्येक माता अपने बेटे में कृष्ण की छवि देखती है, इसलिये वह स्वयं यशोदा बनकर अपने चाँद-सूरज से बेटे को निहारती है और उसे पालने में झुलाती है पलना में ललना झुलावे जसोदा जी पलना हिलावें ललना झुलावें

निरख चाँद सूरुज न फूली समावें कबहूँ दौर जावें मेहर को बुलावें उठा कृष्ण को दोनों ओरी खिलावें नजरिया बचावें डिठौना लगावें करें राई नोनो उठानो उठावें

इलाहाबाद में गाया जाने वाला एक पालना गीत इस प्रकार है

लालनवा मचलि गयो आज काहेन लागी डोर हमारे के झुलावै पालना। काहे का तेरा बना है पालना अगर चनन का बना है पालना रेसम लागी डोर लाल झूले अम्मा झुलावे बार-बार बलि जाएँ।

काश्मीर में बच्चों को पालने में सुलाकर माताओं द्वारा गाया जाने वाला एक गीत इस प्रकार है

तुझे झनझना के झूले में डालकर चला तुने बुलाने के लिये स्वर्ग ही हूर ले आऊं। मामेरा इन्द्रराज है माँ चम्बा जल मेरे में हो और मसवल विकी तेरे वाले के किनारों से झूमर लटक रहे हैं तुझे आकाश में उड़ने वाला पंछी चाहिये कि कस्तूर

मालवा प्रदेश में 'हेलो' शब्द का प्रयोग बच्चों को पालना में सुलाने के लिये होता है। इन गीतों में बालक के प्रति माता का आशीर्वाद भी होता है

नाना म्हारे पालणा, बम्बई+सामी पोल रे आवतड़ा कोई जावतड़ा नाना का का जो झुल्या देख्या हुल रे नाना हुल रे हारा सोना रा झांझरिया हारा रूपाराम झांझरिया रेसम लागी डोर लालजी गाणे नाचे मोर।

कुमाऊँनी क्षेत्र में गाया जाने वाला बच्चे का एक झूला गीत इस प्रकार है

झूली रे झूली भावा झूली ले

पूरबि को पिछोला

पच्छिम की हावा झुलि ले भावा

तेरी मंजू भूरिया घास जाई रैछ

तेरा लिजिया भावा

चूची भरी ल्याली, चड़ी मारी ल्याली चूची खाय ले लै भावा

चड़ी खेल लगा ले होली ले

चुदरी टोडले भावा खातड़ी फाड़ ले

तेरी उत्तर राजगद्दी बड़ी-बड़ी होली लै

कुमारी को जीव खाले

अजुवा को पानी

गुदड़ी में सोए रैले

होली ले होली ले ।

झूल ले बेटे झूल ले। पूरब का पेंग दूंगी, पश्चिम की हवा, तू झूल ले। तेरी माँ प घास के लिये गई हुई है। तेरे लिये बेटे, अपनी छातियों को भर लाएगी। चिड़िया मार छातियों को मुँह में डालेगा। चिड़ियों से खेल करेगा। होलि ले, चूड़रो तोड़ेगा। कपड़े तेरी छत्र राजगद्दी बड़ी-बड़ी होगी। पतली खिचड़ी खाएगा, अंजलि भर पानी पियेगा। सो रहेगा, होलि ले, होलि ले।

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