हिन्दू धर्म के स्वरुप (Forms of Hindu Religion)

 हिन्दू धर्म के स्वरुप (Forms of Hindu Religion)

हिन्दू धर्म व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले व्यवहारों की व्यवस्था है। इसलिए व्यक्ति के आचरणों के आधार पर धर्म तीन रूपों में दिखाई देता है -



1. सामान्य धर्म, 2 विशिष्ट धर्म तथा 3 आपद धर्म

1. सामान्य धर्म :- सामान्य धर्म सभी वर्गों के सदस्यों के लिए समान रूप से लागू होता है। मनुस्मृति में निम्नलिखित दस आचरणों को योग्य आचरण मानकर

इन्हें धर्म कहा गया है (अ) आत्म नियंत्रण, (ब) क्षमा (स) इन्द्रियों पर नियंत्रण (इन्द्रिय निग्रह) (द) अन्यों की सम्पत्ति का हरण न करना (अस्तेय). (क) पवित्रता (शुचिता), (ख) बौद्धिक विकास, (ग) विद्याध्ययन, (घ) सत्य, (ड) वासनाओं पर नियंत्रण, (च) कोध्र पर विजय।

भागवत पुराण में छह आचरणों का सामान्य धर्म के रूप में उल्लेख किया गया है।

(अ) संयम, (ब) क्रोध पर नियंत्रण, (स) दूसरों की सम्पत्ति की अपेक्षा न रखना,

(द) दूसरों का कल्याण, (क) सत्य और (ख) अहिंसा।

2. विशिष्ट धर्म - अलग-अलग वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र) के लिए अलग-अलग कार्य निर्धारित किए गए। इसी प्रकार अलग अलग आश्रमों में व्यक्ति से अलग-अलग आचरण की अपेक्षा रखी गई। इन्हीं आधारों पर विशिष्ट धर्म का

स्वरूप समाज के सभी सदस्यों के लिए एक समान न होकर भिन्न-भिन्न है। विशिष्ट धर्म इस प्रकार हैं

(अ) वर्ण धर्म - प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण के अनुसार अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें, इसे वर्ण कहा गया।

(ब) आश्रम धर्म- व्यक्ति जिस समय जिस आश्रम (ब्रह्मचर्य आश्रम गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम व संन्यास आश्रम) का सदस्य हो उस समय उस आश्रम में व्यक्ति के लिए निर्धारित कर्तव्यों और आचरणों का वह निष्ठा से पालन करें, यही आश्रम धर्म है।

(स) कुल धर्म परिवार के प्रत्येक सदस्य के ऐसे आचरण को, जिससे परिवार की सुरक्षा हो, सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो तथा परिवार की प्रतिष्ठा में वृद्धि हो, कुल धर्म कहा गया।

(द) राज धर्म महाभारत में उल्लेख किया गया है कि दृढ़ता, आश्रितों व प्रजा की रक्षा, वेदों का सम्मान, राज्योचित आचरण राज धर्म है।

(क) युग धर्म- मनुस्मृति और पराशर स्मृति में कहा गया है कि परिस्थितियों के दबाव में आकर ऐसा आचरण, जो कि आवश्यक है, परन्तु जिससे किसी की
भारतीय समाज हानि न होती हो, युगधर्म है।

(ख) मित्र धर्म - मित्र धर्म का आधार समाज के सदस्यों में परस्पर सहयोग व भाईचारा बनाए रखना है। आवश्यकता पड़ने पर मित्रों द्वारा एक-दूसरे की सहायता करना, संकट के समय एक-दूसरे की रक्षा करना, सुख-दुःख के सहभागी बनना, एक-दूसरे के दुर्गुणों को प्रगट न होने देना और मित्र के लिए त्याग करना मित्र धर्म है।

(ग) गुरु धर्म - गुरु के बिना बौद्धिक विकास, आध्यात्मिक ज्ञान और धर्म का निर्वाह सम्भव नहीं। इसलिए हिन्दू धर्म में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया है। अतः गुरु धर्म का प्रतीक है। गुरु धर्म के दो पहलू हैं। शिष्य के आचरण से शिष्य गुरु का आदर करे और उसकी शिक्षाओं के अनुरूप आचरण करे। दूसरा पक्ष गुरु के आचरण से सम्बन्धित है। गुरु का आचरण आदर्श हो, सदैव ज्ञानार्जन और ज्ञान का प्रसार करे। अहिंसा, त्याग और समाज कल्याण करे। स्वार्थ व बेईमानी से दूर रहे तथा इन्द्रिय नियंत्रण करे।

3. आपद धर्म - विशेष प्रकार की परिस्थिति, संकट अथवा दुःख के अवसर पर यदि सामान्य धर्म या विशिष्ट धर्म का पालन करना संभव न हो, तब अपने विवेक के अनुसार कार्य करना आपद्धर्म इसके अन्तर्गत सत्य वचन, जीव हत्या आदि को भी अधर्म नहीं माना गया है आपद्धर्म का आशय दो बुराइयों में से एक ऐसी बुराई चुनना है जो अच्छाई के अपेक्षाकृत अधिक निकट हो। अर्थात् ब्राह्मण आपद् धर्म के नाम पर सीधे ही शूद्र कर्म को न करे पहले वह निकटवर्ती धर्म क्षत्रिय धर्म का निर्वाह करे फिर वैश्य धर्म के अनुरूप कार्य करे और तब अंत में शूद्र धर्म के अनुसार कार्य कर अपना जीवन यापन करे, आपद् धर्म का पालन करे।


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