वृद्धावस्था और मूत्र समस्या : Frequent Urination: Causes, Treatment & When to Call Doctor

वृद्धावस्था और मूत्र समस्या

बार-बार पेशाब आना अपने आप में ही एक बहुत बड़ी समस्या है. क्योंकि, उठने-बैठने एवं चलने-फिरने में वृद्ध व्यक्तियों को इस अवस्था में दिक्कत आती है. यहां तक कि उनके कारण दूसरों को भी उलझनों का सामना करना पड़ता है. लेकिन, वृद्ध व्यक्ति की इस आदत पर क्रोध करना या डांटना बिल्कुल गलत है. वे ऐसा नहीं करते, बल्कि इसका वास्तविक कारण यह है कि वृद्धावस्था में मूत्राशय पूरी तरह से खाली पाता है. मूत्राशय के पीछे रुकावट आने के कारण ही उन्हें बार-बार पेशाब आता पर रात में ऐसा करने से वे स्वयं तथा उनके घरवाले भी परेशान हो जाते हैं. इस प्रकार, वृद्धावस्था में बार-बार पेशाब लगना शारीरिक तथा मानसिक समस्या बन कर उभरता है. यह रोग कई बार नवयुवकों तथा महिलाओं को भी हो जाता है. अतः, इस रोग की अवहेलना न करके इसका समुचित, उपचार कराना चाहिए. इस रोग के कारण पेशाब गंदा हो जाता है. इसके साथ-साथ अन्य संक्रामक रोगों की आशंका एवं जटिलता भी उत्पन्न हो सकती है. साधारणतः, ६० से ७० वर्ष की आयु में इसका प्रकोप काफी तेज हो जाता है,

वैसे तो पथरी भी इसका एक साधारण कारण है, लेकिन इसके अलावा गुर्दे से पेशाब बाहर निकलने या मूत्राशय में एकत्र होने की प्रक्रिया में बाधा आने के अन्य कारण भी हो सकते हैं जिनके परिणामस्वरूप 'पोलीसिस्टिक किडनी' की भी आशंका बन जाती है. दरअसल, मूत्राशय से नीचे तक के भाग में होने वाली रुकावट के और भी कारण हो सकते हैं, जैसे- वृद्धावस्था में अगले भाग का बड़ा हो जाना इसका एक सामान्य कारण है. साथ ही आकार में विषमता, मूत्रनलिका में किसी भी स्थान का संकरा होना आदि भी इसके कारण हो सकते हैं, इसी प्रकार, गुप्त रोग(जैसे सूजाक), गर्मी, पथरी का मूत्रद्वार में होना भी इसके कारण बन सकते हैं. ठीक इसी तरह गर्भवती महिलाओं में गर्भाशय के कारण भी मूत्र-संबंधी परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं, यदि छोटे ने में लिंग का बाहरी भाग सूई की नोंक की तरह पतला है तो उससे भी पेशाब करने में परेशानी हो सकती है. साथ ही मूत्र द्वार में कपाट(वाल्व) होने पर भी ऐसी परेशानी हो सकती है. प्रारंभिक अवस्था में मूत्र की धार तथा दबाव में कमी होती है. 

इसके अलावा मूत्र प्रारंभ होने में थरथराहट तथा देरी होने की भी शिकायत होती है. बार-बार पेशाब आना, मूत्र रोकने में असमर्थता, पेशाब करते समय जलन तथा पेशाब की कुछ बूंदों का कपड़ों पर आना आदि इस रोग के अन्य लक्षण हैं. लेकिन, जब पेशाब रुक जाता है तब काफी परेशानी होती है. यहां तक कि पेशाब आना एकाएक बिल्कुल बंद भी हो जाता है जो अत्यंत कष्टकारी परिस्थिति होती है. इसके अलावा रुकावट के साथ-साथ मूत्र का छलकाव, यूरिया की गंभीर समस्या तथा अन्य जटिलताएं भी आ जाती हैं. विशेषतौर पर पथरी, संक्रमण, मूत्राशय में गहे पड़ना आदि जटिल लक्षण प्रकट होते हैं.
Covid-19पहले प्रोस्टेट की चिकित्सा शल्यक्रिया से ही की जाती थी. २०वीं शताब्दी के प्रारंभ में 'फेयर्स एण्ड मिलिंद आदि 'शल्य चिकित्सा विज्ञान' इसकी चिकित्सा के सर्वमान्य उपाय समझे जाते थे. लेकिन, सुरक्षित होने के बावजूद इस शल्य-चिकित्सा में घाव, संक्रमण जन्य रोगों का भय, रक्त चढ़ाने की आवश्यकता तथा लंबी अवधि तक चिकित्सक की देखरेख में रहने की अनिवार्यता आदि असुविधाओं का भी सामना करना पड़ता था. आजकल प्रोस्टेट की चिकित्सा के लिए चिकित्सकों ने लेजर तकनीक का प्रयोग प्रारंभ किया है. यह तकनीक कम खर्चीली होने के साथ-साथ उत्तम भी है जो आज पूरे विश्व में ही लोकप्रिय होने लगी है. यह लेजर तकनीक काफी सुविधाजनक भी है.

प्रोस्टेट की आधुनिकतम कारगर चिकित्सा लेजर चिकित्सा ही है. यह विकसित चिकित्सा तकनीक सुरक्षित तथा प्रभावकारी भी है. इस प्रक्रिया में चिकित्सा के बाद आराम करने के लिए भी अधिक समय की जरूरत नहीं पड़ती है. कुछ ही दिनों में व्यक्ति पूरी तरह फिट हो जाता है, इस चिकित्सा में शल्यक्रिया के निशान का भी प्रश्न नहीं उठता है. यह शल्यक्रिया कुछ खास प्रकार के रोगियों व अनुपयुक्त व्यक्तियों के लिए मानो वरदान है, जैसे हृदय रोगियों, मधुमेह से ग्रस्त व्यक्तियों तथा रक्तचाप से पीड़ित रोगियों के लिए यह सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा तकनीक है. इसके अलावा, वीर्य की अणुहीनता तथा नपुंसकता की भी आशंका स्वतः कम हो जाती है. अतः, मूत्र से संबंधित कोई विकार या समस्या होने पर रोगी को तुरंत उसका इलाज कराना चाहिए ताकि रोगी एवं उसके परिवारजनों को मानसिक तथा शारीरिक उलझनों का सामना न करना पड़े.


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