“भार्या” से “जीवनसाथी” तक, “ए जी”, “ओ जी” से नाम तक, पति-पत्नी के रिश्ते में बड़ा बदलाव.. दिनेश मालवीय

“भार्या” से “जीवनसाथी” तक, “ए जी”, “ओ जी” से नाम तक, पति-पत्नी के रिश्ते में बड़ा बदलाव.. दिनेश मालवीय
dineshसनातन धर्म-संस्कृति में विवाह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है. यह कोई एग्रीमेंट या संविदा आदि जैसी चीज नहीं है. इस संस्कार से ऎसी बहुत-सी बातें जुड़ी हैं, जिनसे तलाक जैसी चीज का यहाँ नाम ही नहीं रहा. यह रिश्ता अटूटमाना जाता था. लेकिन बीते करीब दो दशक में हमारे देश में पति-पत्नी के रिश्ते में बहुत बड़ा बदलाव आया है. यह बदलाव ग्रामीण क्षेत्रों में भले ही उतना नहीं आया हो, लेकिन शहरी क्षेत्रों में यह बहुत अधिक दिखायी देता है. शिक्षा के प्रसार की इसमें बड़ी भूमिका रही है.



प्राचीन काल से ही हिन्दू संस्कृति में पत्नी और पति को जो नाम दिए गये हैं, उनमें सबसे प्रमुख हैं क्रमश: “भार्या” और “भरतार”. यानी पत्नी वह, जिसका भरण-पोषण किया जाए और पति वह, जो भरण-पोषण करे. पत्नियाँ अपने पति को “स्वामी”, “नाथ” आदि नाम से भी संबोधित करती रही हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि, पति मालिक है और पत्नी उसकी मातहत. आज भी उन स्त्रियों की तादाद अधिक है, जो अपने पति का नाम नहीं लेतीं. वे उन्हें “ए जी” “सुनो जी” जैसे संबोधन से ही पुकारती हैं. पहले कहा जाता था कि पत्नी द्वारा पति का नाम लेने से पति की आयु कम हो जाती है. बाहर भी कहीं उन्हें पति के नाम का उपयोग करना होता था तो वे “पप्पू के पापा”, “मुन्नी के पिताजी” जैसे संबोधनों का ही  उपयोग करती थीं.  आज भी अधिकतर स्त्रियाँ ऐसा ही करती  हैं. ज्यादा से ज्यादा “सरनेम” के साथ जी लगा कर काम चला लेती हैं, जैसे “तिवारी जी”, “अग्रवाल साहब” आदि .

Couple-Fighting

यही स्थिति बहुत कुछ पतियों की भी होती थीं. वह अकेले में भले ही पत्नी का नाम ले लें, लेकिन माता-पिता, बुजुर्गों और बाहरी लोगों के सामने पत्नी का नाम न लेकर कुछ और नामों से काम चला लेते हैं, जैसे “आपकी भाभी” “तुम्हारी मामी” इत्यादि. इसका कारण भी यही रहा कि, परिवार के जीवनयापन और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पैसा कमाने की जिम्मेदारी पति पूरी करता था. पति और पत्नी के बीच कर्तव्य निर्धारित थे. पति बाहर का ध्यान रखता था, तो पत्नी घर का. हालाकि किसानी जैसे कार्यों में पत्नी बराबरी से हाथ बंटाती रही है और आज भी बंटाती है.



मूल रूप से पत्नी का दायित्व घर को ठीक रखना, बच्चों और बुजुर्गों का ध्यान रखना और पारिवारिक की जिम्मेदारियां निभाना होता था.  कमोवेश आज भी बहुत कुछ ऎसी ही स्थिति है. बाहर काम करने जाने वाली स्त्रियों की संख्या बहुत कम है. फिर भी सामाजिक परिवेश और मीडिया के विस्तार के साथ ही स्त्रियों की सोच में बहुत बदलाव आया है. अब वे पहले जैसी  सबमिसिव नहीं रहीं. बीते करीब बीस साल में यह स्थति काफी बदली है. अब, कम से कम शहरों में, स्त्रियाँ पति को इन नामों से संबोधित नहीं करतीं. आजकल की ज्यादातर पढ़ी-लिखी लड़कियां शादी के बाद पति का सीधा नाम लेती हैं. इस बात से उनके पति भी बहुत माइंड करते नहीं लगते. बहरहाल, लड़कों के माता-पिता इसे आसानी से हजम नहीं कर पाते. लेकिन कुछ दिन भुनभुन करने के बाद वे भी इसे स्वीकार कर लेते हैं. आजकल लड़के और लड़कियां एक दूसरे को पति या पत्नी की जगह “जीवनसाथी” यानी लाइफ कम्पेनियन  या लाइफ पार्टनर मानने लगे हैं. जो लड़कियाँ शादी के पहले से जॉब कर रही होती हैं, या शादी के बाद जॉब करती हैं, वे तो पति को अपना “स्वामी” ,”भरतार” या “नाथ” मानने से अमूमन इंकार करती ही हैं. इससे कुछ पतियों का ईगो भले ही हर्ट होता हो,लेकिन वे खुलकर इसे व्यक्त नहीं करते. सम्बन्ध बहुत कुछ बराबरी के हो गये हैं.



आजकल तो एक नया ट्रेंड चल पडा है कि, बहुत सी लड़कियां शादी के बाद सिन्दूर लगाना, चूड़ियाँ-बिछियाँ पहनना या मंगलसूत्र पहनना पसंद नहीं करतीं. वे इन्हें पहनना परम्पराओं की गुलामी मानने लगी हैं. युगों से हिन्दू समाज में सुहाग चिन्ह मानी जाने वाली इन चीजों का तिरस्कार करने को वे आधुनिकता का सबूत मानने लगी हैं. हालाकि यह सामान्य रूप से नहीं हो रहा, लेकिन धीरे-धीरे यह जनरल ट्रेंड भी बन सकता है. इस तरह की आज़ादी उच्छ्रंकलता का रूप लेती जा रही है. इसीलिए शादियाँ जल्दी-जल्दी टूट रही हैं. अदालतों में तलाक और दीगर पारिवारिक मामलों की बाढ़ आ गयी है. आज पहले जैसी स्थिति फिर लौट आये, यह सोचना तो नासमझी ही होगी. लेकिन समाज के तानेबाने को बचाने के लिए बीच का रास्ता निकालना सबसे बड़ी आवश्यकता है. पति और पत्नी भले ही एक-दूसरे को जीवनसाथी मानते रहें, लेकिन संबंधों में ईमानदारी होनी चाहिए. विवाह संस्था की पवित्रता भंग नहीं हो, यह सुनिश्चित करना होगा.



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