आम लोगों के विवेक पर पूरा भरोसा

आम लोगों के विवेक पर पूरा भरोसा

दिनेश मालवीय

देश की राजधानी दिल्ली में साम्प्रदायिक घटनाओं से उत्तप्त मन पर वहीँ की एक घटना ने शीतल जल की बौछार-जैसी कर दी. उत्तरपूर्वी दिल्ली के यमुना विहार तथा विजय पार्क में हिन्दू और मुस्लिम नागरिकों ने एकजुट होकर दंगाइयों को अपनी कॉलोनी में नहीं घुसने दिया. इसी तरह चान्दबाग में मुस्लिमों ने मानव श्रृंखला बनाकर दंगाइयों को मंदिर पर हमला करने से रोक दिया.

यही असली और सच्चा भारत है. मेरा हमेशा से यह विश्वास रहा है कि आम हिन्दू या आम मुसलमान किसी भी तरह का दंगा-फसाद या उपद्रव करना नहीं चाहते. सबके अपने जीवन-संघर्ष हैं. सब अपने बच्चों को पालने, उन्हें शिक्षित करने और अच्छा इंसान बनाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं. समझने की बात यह है कि वो कौन लोग हैं जो देश में शान्ति व्यवस्था को भंग कर अराजकता जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. निश्चित ही ये लोग देशविरोधी ताकतों के हाथों बिके हुए हैं या उनका इस तरह ब्रेनवाश कर दिया गया है कि उन्हें यही सब करना अपने जीवन का सबसे बड़ा फर्ज लग रहा है.

अपवाद सब जगह रहते हैं, लेकिन आमतौर पर देखा जाए तो देश के सभी शहरों और गाँवों में यही स्थिति है. लोग कई पीढियों से एकसाथ रह रहे हैं. हाल ही में सागर जाना हुआ. मैंने देखा कि जहाँ हिन्दू लोग सामने से आने वाले किसी मुस्लिम को सलाम कर रहे थे, वहीँ मुस्लिम भी बिना किसी संकोच के जयरामजी की कह रहे थे. कट्टरपंथीं इसे भले ही कुफ्र मानते रहें, लेकिन यह उनकी स्वस्थ और व्यावाहारिक सोच है. आपस में सबके आर्थिक और सामाजिक हित जुड़े हुए हैं.

लेकिन समाज में कुछ ऐसे तत्व घुस आये हैं, जो लोगों को बरगलाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. मीडिया में उन्हें अज्ञात तत्व कहा जा रहा है. आखिर ये “अज्ञात” लोग कौन हैं. हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियां उन्हें पहचान कर पकड़ने नाकाम क्यों हैं? ये लोग बहुत सोची-समझी रणनीति के अनुसार समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं. मेरे एक मुस्लिम मित्र ने बताया कि जब वह बचपन में अपने गाँव में रहते थे, तब चौपाल में होने वाले रामायण पाठ और प्रवचनों में सहजता से बैठ जाते थे. समापन पर मिलने वाला प्रसाद अपने हिन्दू दोस्तों के साथ बिना किसी संकोच के खाते थे. उनके परिवारों को भी इसमें कुछ ऐतराज़ नहीं था. इसी तरह हिन्दू घरों के पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे ताजिये के जुलूस में बहुत श्रद्धा के साथ शामिल होते थे. मुस्लिम घरों में आने वाली जमातों का हिन्दू लोग भी बहुत सम्मान करते थे.

मेरे मित्र ने बहुत अफ़सोस जताते हुए बताया कि अब पहले जैसी बात नहीं रही. दोनों समुदायों के परिवारों के बीच कुछ दरार स्पष्ट नज़र आती है.

ऐसी स्थिति के लिए बात चलने पर अधिकतर लोग सिर्फ राजनीति और नेताओं को दोषी ठहराकर पल्ला झाड लेते हैं. बेशक इसमें उनकी बहुत बड़ी भूमिका है, लेकिन गैर-राजनैतिक लोग भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. बच्चों को इस तरह के संस्कार देने की प्रवृति कम हुयी है, जिसमें सभी धर्मों का आदर करने की शिक्षा दी जाती थी. पारिवारिक और सामाजिक माहौल भी अब पहले जैसा नहीं रहा. औरों की बात तो छोडिए, लेखा, कवि, शायर और बुद्धिजीवी भी इस बुरी प्रवृति की चपेट में आ गये हैं, जबकि उनसे समाज को सही राह दिखने की अपेक्षा होती है.

दिल्ली के यमुना विहार और विजय पार्क में हिन्दू और मुस्लिमों ने जिस एकजुटता का परिचय दिया है, उसी भावना को और प्रबल करने की ज़रूरत है. मुझे लोगों के विवेक और दानिशमंदी पर पूरा भरोसा है. वे कुछ देर के लिए भले ही किसी बहकावे में आ जाएँ, लेकिन दंगा और उपद्रव जैसी चीजें उनके डीएनए में है ही नहीं. इसी आधार पर यह विश्वास किया जान चाहिए कि देश इस पहले की तरह इस संकट से भी बाहर आएगा. अलगाववादी ताकतें बेनकाब होंगी और लोग स्वयं उन्हें नकार देंगे.


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