देवताओं ने भी खूब मारा मेघनाद को —————————-रावण की त्रैलोक्य विजय -77

देवताओं ने भी खूब मारा मेघनाद को

                                       रावण की त्रैलोक्य विजय -77 
रमेश तिवारी 
रावण और इंद्र के मध्य अब छल, बल और माया का युद्ध प्रारंभ हो चुका था। युद्ध में यद्यपि रावण की सेना अधिक मर खप रही थी। परन्तु रावण का विक्रमी पुत्र मेघनाद बहुत ही पराक्रम दिखा रहा था। इंद्र की सेना के शक्तिशाली और भारी पड़ने के बाद भी राक्षसी और तामसी विद्या के कारण देवता परेशान हो रहे थे। रावण और इंद्र अब एक दूसरे की सेनाओं में घुस रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वे मंतक ही मंतक एक दूसरे की स्थिति को भांपते हुए, चल रहे हों। उनके अंदर खाने तो कुछ और ही चल रहा था। मेघनाद का कवच फट गया था।

देवताओं ने मेघनाद को मार मार कर छटीं का दूध याद दिला दिया था। अब मेघनाद के समक्ष तामसी युद्ध का विकल्प ही शेष रह गया था। ज्ञान, विज्ञान और युद्ध विद्या की कलाओं के शोध क्षेत्र हिमालय से प्रशिक्षित मेघनाद अब करता क्या है, देखते हैं किंतु संदर्भ है तो थोड़ा, बहुत कुछ राक्षसों की रात्रि युद्ध की प्रवीणता,अंधेरे में शत्रु पर सटीक प्रहार करने की कुछ कथायें भी जान लेते हैं। किंतु इसके लिए हमको रामायण काल से 19 वीं पीढी़ बाद महाभारत काल में चलना होगा। इंद्र और रावण युद्ध पर बाद में बात करते हैं।

युद्ध में कौन किस पर दया दिखाता है? युद्ध क्षेत्र की तो एक ही भाषा होती है। बाण और (भुशुण्डी) गोली ! शिष्य यदि गुरू के सामने युद्ध करने जाता तो पहले कुछ बाणों से उनके चरणों के समीप बाणों का संधान करता! यही उसका प्रणाम होता। गुरू भी आशीर्वाद के रूप में शिष्य के शिरस्त्राण के ऊपर से बाणों की बौछार करके अपना आशीर्वाद प्रदान कर देता।

                                रावण की त्रैलोक्य विजय -77 

श्रीराम के पुत्र कुश की 19 वीं पीढी़ में जन्मे राजा श्रतायु ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था। वह दुर्योधन की मित्र सेना में शामिल था। वह जयद्रथ के साथ अभिमन्यु का क्रूर वध करने वाले दल का सदस्य भी था। अतः वह भी जयद्रथ के साथ ही अर्जुन के हाथों मार डाला गया था। हम हिमालय की बात कर रहे थे। हिमालय पर्वत की तलहटियों में बहुत से ऋषिगणों के आश्रमों में एक आश्रम अंगिरा ऋषि का भी था। जिसके सर्वेसर्वा श्रीकृष्ण के संबंधी और यदुवंशी श्री नेमिनाथ जी महाराज थे। नेमिनाथ जैन मुनि थे। वे ब्रह्मज्ञान के महान ज्ञाता थे। संयोग से वह भी श्रीकृष्ण के गुरू हो गए। श्रीकृष्ण जी ने सांदीपनि ऋषि के अंकपाद आश्रम में 64 दिन तक शिक्षा ग्रहण की। फिर उन्हीं के आदेश पर नेमि नाथ के शिष्य बनने प्रयाग चले गए। जहां अंगिरा ऋषि का दूसरा आश्रम भी था।

नेमिनाथ महाराज का जन्म सोरों नामक धार्मिक स्थान में हुआ था। वे सम्पन्न परिवार से थे। जूनागढ़ में उनकी बारात निकल रही थी। किंतु एक कसाई को खुला मांस ले जाते देख उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। बाद में वे हिमालय जा पहुंचे। वहां अग्नि का अन्वेषण करने वाले ब्रह्मा जी के पुत्र अथर्वा (अंगिरा) द्वारा स्थापित आश्रम में ब्रह्मांड( ब्रह्मज्ञान) की शिक्षा लेने लगे। श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में अर्जुन को अपना मुंह फाड़ कर जो विराट स्वरूप दिखाया! वह क्या था। वह ब्रह्मांड के "अहं ब्रह्मास्मि "का नमूना ही तो था। हम सब। प्रत्येक मनुष्य ब्रह्मांड के ऐसे ही अंश है जैसे कि महान लीलाकार श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र में स्वयं को प्रमाणित किया था। जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वही सब तो मनुष्य में है। "मनुष्य तो ब्रह्मांड का माडल मात्र है"। श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र में जो कुछ भी उपदेश दिया, वह उन्होंने प्रयाग में सीखा था, नेमिनाथ जी से।

परन्तु इस ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए क्यों और किन परिस्थितियों में श्रीकृष्ण को चुपचाप जाना पडा़।वे किस मार्ग से गये। यह सब भी बतायेंगे। किंतु कल। आज तो फिर से युद्घ भूमि में लौटते हैं, जहां कि देव और राक्षस सैनिकों के मध्य एक दूसरे के शोणित (रुधिर) का व्यापार चल रहा है। चीखें निकल रही हैं। मर्मांतक और करूणामयी। स्वस्थ, सुन्दर और उच्चकोटि के परिधानों से सुसज्जित पराक्रमी वीरों, सेना नायकों के शवों के अंबार लगे हैं। शिरस्त्राण और दिव्य कवच फटे,टूटे और छितरे पडे़ हैं।

किंतु, मेघनाद अब और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकता। उसके पिता, महाप्रतापी रावण के शरीर से टपकती रक्त की एक एक बूंद का हिसाब लेना है,उसको। मेघनाद रक्त रिसते शरीर से युद्ध करते अपने पिता को देख विचलित हो गया।

अब मेघनाद की दृष्टि सिर्फ इंद्र पर केन्द्रित थी। जबकि इंद्र अपने रक्षक दल के साथ रावण को बंदी बनाने की योजना पर काम कर रहा था। कौन किसको बंदी बनाता है?  

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