गोंड जनजाति : आदिम संस्कृति के वाहक गोंड

गोंड जनजाति : आदिम संस्कृति के वाहक गोंड
मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले समस्त आदिवासियों में गोंड जनजाति की संख्या सर्वाधिक है। गोंड सबसे अधिक प्रभावशाली जनजाति है शिक्षा के क्षेत्र में भी घोड़े का औसत अधिक है। आदिम संस्कृति के वाहक गोंड अपने रीति-रिवाजों, प्रथाओं, मान्यताओं एवं परम्पराओं से अत्याधिक प्यार करते हैं।



गोंडों में लड़का और लड़की को समान रूप से देखा जाता है। उनमें कोई भेद भावना नहीं होता है। गोंड जंगल-पहाड़ों के निकट निवास करते हैं और वन सम्पदा का उपयोग भली-भाँति करते हैं। वन-सम्पदा, वनस्पति, वनोपज, जड़ी-बूटियों आदि का उपयोग करने के कारण गोंड जनजाति के लोग स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट रहते हैं। प्रकृति की गोद में धरती की खुशबू से इनका सादगीपूर्ण जीवन सदैव सुखी रहता है।

गोंडों का स्वभाव उन्मुक्त एवं सहनशील होता है। आपस में सहयोग इनकी मूलप्रवृत्ति है नाचना, गाना और मदिरा का सेवन करना इनका पारम्परिक गुण है गोंडों ने अपनी संगीत कला को सजाया, संवारा और समृद्ध किया है। गोंड अपनी इस कला निधि को पूर्वजों की धरोहर मानते हैं।

गीत एवं नृत्य गोंडों के मनोरंजन एवं सुखी जीवन के साधन हैं दिन भर खेत-खलिहानों, जंगल-पहाड़ों आदि में परिश्रम करने के बाद रात्रि के पहर में गोंड नर-नारी, बाल-वृद्ध एवं युवक-युवतियाँ सभी गाँव के आँगन या खरना में एकत्र होते हैं।

कुछ करमा की बहार में भाग लेते हैं और कुछ देख-सुन कर आनंद लेते हैं। जन्म, विवाह, मरण संस्कारों तथा कोई भी पर्व-उत्सव आदि बिना करमा गीत एवं नृत्य के अधूरे होते हैं।
ऐसे ही मनोरंजन के लिये गोंड जन-जाति की संस्कृति में कहरवा, बिरहा, भड़ौनी, ददरिया, सैला, रीना, फाग, राई, सजनी आदि अनेक गीत प्रचलित हैं। करमा एवं अन्य सहायक गीत गोंड संस्कृति की पहचान हैं। करमा गीत गोंड जनजाति के जीवन का पर्याय हैं।

करमा का प्रभाव जिंदगी पर और जिंदगी की छाप करमा पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। करमा गीतों गायन की दलीय होड़ में अपार शक्ति होती है, जो निष्कलंक और पक्षपात विहीन होती है। करमा गीतों की होड़ (स्पर्धा) की यह विशेषता होती है कि होड़ जितनी गहराई तक जाती है, गोंडों के मन उतने ही प्रेम भाव ऊँचाई तक जुड़ते जाते हैं। स्त्री-पुरुष, युवक-युवतियों का निर्विकार लगाव बढ़ता है। जिंदगी का यही मर्म इन्हें जीवन्त बनाये रखता है। गायकों की टोली में 4-5 की संख्या भी होती है और 40-50 की संख्या में भी गीत गाये जाते हैं। संख्या का कोई बंधन नहीं होता है। स्त्री-पुरुष या युवक-युवतियों की अलग-अलग टोलियाँ बनती हैं।

करमा गीत प्रकृति की गोद में फलने-फूलने एवं लौकिक क्रिया कलापों को प्रदर्शित करने वाला विनोदप्रिय कला पुंज है। करमा गीतों में सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधविश्वास, ढोंग एवं पाखंड के विरूद्ध सशक्त उद्घोष होता है, जो जन सामान्य को तत्काल प्रभावित करता है। करमा गीतों में निहित उपदेशों, निर्देशों, मार्गदर्शन एवं नसीहतों आदि से जनसामान्य अपने को उबारने के लिये प्रेरित होता है।

करमा गीत सही अर्थों में लोक मानस के दैनंदिन क्रिया-कलापों का दर्पण हैं। गोंड जनजाति के ग्राम्य जीवन के उमंग की स्वाभाविक एवं कलापूर्ण चिरंतन अभिव्यक्ति करमा गीतों में निहित होती है। गोंड करमा गीतों की यह भी विशेषता है कि वे सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक, नैतिक एवं राजनैतिक जीवन मूल्यों के प्रति जन जागरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों के दिशा-निर्देशक होते हैं।

करमा गीत गोंड जनजाति के साथ ही समस्त लोक की धरोहर हैं, जिनके अंतःकरण में प्रेरणा स्रोत के रूप में स्वयं लोक ही है। सारांश में यह कहना उचित होगा कि करमा गीत आदिकाल से अब तक गोंड जनजाति की अमूल्य धरोहर है। गोंड जनजाति में प्रचलित करमा गीतों की संख्या अनगिनत है, जो यत्र तत्र तमाम गायकों के कंठ में कंठस्थ हैं। ये गीत वाचिक परम्परा से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते रहते हैं।

करमा गीतों का अपना सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व है गोंड जनजाति में प्रचलित ये करमा गीत मात्र मनोरंजन का साधन ही नहीं, वरन ये अनेक क्रांतिकारी संदेशों के वाहक भी हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी करमा गीतों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में बानगी के रूप में करमा झूमर की पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं ओ हो हो हाय, गाँधी दुनिया में राम

देवदूत बन आया, गाँधी दुनिया में. ।।1 ।।

ओ हो हो हाय, हमला नहीं सुहावय राम या अंग्रेजी राज हमला नहीं सुहावय रे..।12।।

गोंड जनजाति में प्रचलित करमा गीतों का स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन को जगाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। करमा गायकों की गोलियों गाँव-गाँव भ्रमण कर आजादी के करमा गीत गा-गा कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का उत्साह वर्धन करते थे।

गोंड जनजाति में प्रचलित करमा गीतों के प्रकार निम्नानुसार हैं- झूमर, लहकी, लंगड़ा, रागिनी और करमा ठाढ़ा।

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