ग्रंथों के साथ छेड़खानी सदियों से हो रही है, रामायण के बारे में कवि कुमार विश्वास बिलकुल सही कहते हैं -दिनेश मालवीय

ग्रंथों के साथ छेड़खानी सदियों से हो रही है, रामायण के बारे में कवि कुमार विश्वास बिलकुल सही कहते हैं
-दिनेश मालवीय
वर्तमान में हिन्दी काव्यमंचों के महानायक कहे जाने वाले कुमार विश्वास ने रामायण पर बहुत सुन्दर व्याख्यान श्रृंखला शुरू की है. वह इस बात को बहुत तार्किकता से प्रमाणों के साथ बताते हैं कि रामायण में उत्तर रामायण में वर्णित राम द्वारा सीता के परित्याग और शम्बूक वध के प्रसंग शरारतन जोड़े गये हैं. इसका मकसद  भगवान् राम को स्त्रीविरोधी, दलितविरोधी, आदिवासी विरोधी आदि बताकर उनकी छवि को ख़राब करना है.

कुमार विश्वास अनेक उद्धरणों के माध्यम से बताते हैं कि राम का जो व्यक्तित्व है, वह ऐसा है ही नहीं कि वह किसी एक व्यक्ति द्वारा कही हुयी बात के कारण अपनी प्राणप्रिय पत्नी का परित्याग कर दें. सीता की पवित्रता को राम से अधिक कौन जानता था? इसी तरह निषाद, केवट, वानरों आदि को गले लगाने वाले राम किसी एक व्यक्ति के कहने पर शम्बूक का वध कर दें, यह संभव नहीं है. राम जैसा न्यायप्रिय और सत्यनिष्ठ राजा तो आज तक हुआ ही नहीं.

खैर, कुमार विश्वास की बात पूरी तरह समझने के लिए तो उनके पूरे व्याख्यान को सुनना ज़रूरी है, लेकिन इससे एक और उल्लेखनीय बात समझ में आती है. रामायण ही क्यों, लगभग सभी ग्रंथों के साथ सदियों से छेड़छाड़ की जाती रही है. जब जिस विचारधारा का बोलबाला रहा, तब ग्रंथों में उसके अनुसार बातें जोड़ या निकाल दी जाती रही हैं. कई जगहों पर स्वार्थी तत्वों ने भी ऐसा किया है. कोई भी ग्रंथ इससे अछूता नहीं रहा. हमारे देश में ऐसे जोड़-घटाने को रोकने या उसकी सर्वमान्य समीक्षा की कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं रही.
Granthsकुछ बातों पर यदि ध्यान दिया जाये, तो बात बहुत स्पष्ट हो जाती है. इसके लिए भारत के मूल जीवनदर्शन, धर्मदर्शन और सांस्कृतिक दर्शन को गहराई से समझने की ज़रूरत है. थोड़ा विचार किया जाए कि जिस देश में युगों पहले यह कहा गया हो कि, “जन्म से सभी शूद्र पैदा होते हैं, संस्कारों से कोई व्यक्ति द्विज यानी ब्राह्मण हो जाता है”. यह भी कहा गया कि,”सभी जीवों में एक ही चेतना व्याप्त है”. “सारा विश्व एक परिवार है”. “एक ही सत्य को विद्वान भिन्न तरह से कहते हैं”. “व्यक्ति कुल से नहीं कर्मों से ब्राह्मण या शूद्र होता है”. इसी तरह अनेक श्लोक हमारे शास्त्रों में मिलते हैं.

ऎसी स्थिति में कुल और वर्ण के अनुसार कोई भी शास्त्र कैसे भेद कर सकता है? भारत के धर्मशास्त्रों में अनेक ऐसे प्रसंग मिलते हैं जिनमें यह स्पष्ट हुआ है कि ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले कई लोग अपने बुरे कर्मों से शूद्र या दानव हो गये. इनमें हिरन्यकश्यप, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकरण आदि शामिल हैं. इसके विपरीत ऐसे लोगों की कमी नहीं जो ब्राह्मण कुल में नहीं जन्में लेकिन अपने कर्मों से ब्राह्मणत्व पाकर पूज्य बन गये. इनमें वाल्मीकि, शबरी, भक्त रैदास, सदन कसाई, कबीर सहित अनेक संत शामिल हैं. कहा है कि “आचार ही धर्म है”. जिस व्यक्ति का जैसा आचार होता है, उसे समाज में उसी श्रेणी में रखा जाता रहा है.

अक्सर यह देखने में आता है कि कोई व्यक्ति किसी ग्रंथ या पुस्तक के एक अंश या किसी श्लोक या चौपाई का एक हिस्सा पकड़कर उसकी अपने अनुसार व्याख्या करने लगता है. ऐसा करके वह अपने मत या अपनी सोच को ही प्रसारित करता रहता है. आजकल तो यह काम बहुत सुनियोजित और संगठित तरीके से किया जा रहा है. इसके लिए विदेशों से वित्तीय मदद की बातें भी पढ़ने-सुनने में आती हैं.

भारत में जातिवाद को लेकर बहुत सी विपरीत बातें कही जाती हैं. बहुत आश्चर्यजनक बात है कि भारत की मूल व्यवस्था में जाति का को अस्तित्व ही नहीं है. मध्यकाल से जाति व्यवस्था अस्तित्व में आयी. मूल रूप से चार वर्ण हैं, जो व्यक्ति के स्वभाव पर आधारित हैं. लोग वर्ण और जाति को गलती से एक ही समझते हैं. हमारे शास्त्रों के मौलिक पाठों में जाति का कोई उल्लेख कहीं नहीं मिलता.  किसी ख़ास काम को करने वाले लोग संगठित होकर अपने हितों की रक्षा करने के लिए एक हो गये. यह व्यवस्था पश्चिमी देशों में के “वर्कर्स गिल्ड” जैसी ही थी. जातियों के संगठनों ने प्रारंभिक समय में अपने सदस्यों के हितों की रक्षा की दिशा में बहुत अच्छा काम किया. धीरे-धीरे यह स्वरूप बिगड़ गया और इसने जातिवाद का रूप ले लिया. कुछ जातियों के लोग अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगे. इस तरह हमारे समाज में जातिवाद की बुराई पनपी. लेकिन इस व्यवस्था के मूल रूप में ऐसी कोई सोच नहीं थी.

आज भी अनेक जातीय संगठन अपने सदस्यों के हित में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. वे आपस में एक-दूसरे का संबल होते हैं. किसी विपत्ति में पड़ जाने पर ये संगठन सम्बंधित व्यक्ति की मदद करते हैं. वे समाज के प्रतिभाशाली बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं और उनकी शिक्षा में मदद करते हैं. ये संगठन और भी कई अच्छे काम करते हैं.

इसी तरह अनेक बातों को जानबूझकर तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है. अनेक ग्रंथों और शास्त्रों में बहुत सी ऎसी बातें निहित स्वार्थों द्वारा जोड़ दी गयी हैं. बात सिर्फ रामायण की नहीं है. हमारे मुख्य ग्रंथों की मूल प्रतियाँ तो उपलब्ध हैं नहीं. एक और उल्लेखनीय बात यह है कि अनेक महापुरुषों की मृत्यु के कई वर्षों बाद उनकी कही हुयी बातों को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया. उन बातों को जिसने सुना, उसने उन्हें कितना समझा; जितना वह समझा उसने उसे अपने तरीके से और अपने शब्दों में लिखा. इस प्रक्रिया में बहुत सी गलतियाँ होने की पूरी संभावना होती है. इसके अलावा लिखे वाला इसमें बहुत कुछ अपना भी जोड़ देता है.

इस प्रकार शास्त्रों की वर्तमान में जो प्रतियाँ उपलब्ध हैं, उनके मूल स्वरूप को समझने की ज़रूरत है. थोड़ा सा भी चिन्तन करने पर स्पष्ट हो जाएगा कि इसका मूल भाव क्या रहा होगा और इसमें कुछ बातें जोड़ या घटाकर इसे किस तरह विकृत और दूषित किया गया है.


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