खतरे में माँ-बाप गवां चुके बच्चे.. और भी हैं खतरे? सुरक्षा के साथ कैसे मिले योजनाओं का लाभ? 

खतरे में माँ-बाप गवां चुके बच्चे.. और भी हैं खतरे? सुरक्षा के साथ कैसे मिले योजनाओं का लाभ?


कोरोना संक्रमण के कारण कई बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया है। स्थिति यह है कि कई घरों में बच्चे अकेले रह गये हैं। कुछ बच्चों को पालने की जिम्मेदारी किशोर भाई-बहनों पर आ गई है।

बच्चे कोरोना के असर से जूझ रहे हैं|

कई बच्चों को अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार खुद करना पड़ा है। संक्रमण के डर से लोग उनसे दूर रहे। बिहार में अररिया जिले के रानी गंज प्रखंड के एक गांव से ऐसी ही एक तस्वीर सामने आई जिसने लोगों को हैरान कर दिया. माता-पिता दोनों की मृत्यु चार दिन में अलग अलग हुई। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े सन्नी ने घर के पीछे एक गड्ढा खोदा और अपनी मां के शव को दफना दिया। किसी ने साथ नहीं दिया। अब सोनी को छोटे भाई-बहन की परवरिश की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पटना के नौबतपुर निवासी कुमार आर्यन के माता-पिता की भी चार दिन के भीतर मौत हो गई. अनाथ आर्यन और उसके भाइयों की पढ़ाई छूट गई है, अब वे भूख की स्थिति का सामना कर रहे हैं। इसी तरह 12 साल का अजीत अपने आठ साल के छोटे भाई की परवरिश की जिम्मेदारी लेने को मजबूर है। उसके पिता का देहांत बहुत पहले हो गया था। वह कुछ ग्रामीणों के साथ घर चलाने के लिए जयपुर गया और वहां एक फैक्ट्री में काम करने लगा। बाल श्रम उन्मूलन अभियान के तहत छुड़ाए जाने के बाद वह 2019 में गांव लौटा था। इस बार मां की भी कोरोना से मौत हो गई। चाचा या कोई रिश्तेदार अब इसे रखने को तैयार नहीं है। अब संकट यह है कि ये बच्चे कहां जाएं, क्या करें।

तस्करी का खतरा बढ़ा है

"कई ऐसे बच्चे हैं जिन्हें विभिन्न स्थानों से बरामद किया गया है। अकेले जयपुर में वहाँ काम करने वाले 400 बच्चों को बचाया गया और उन्हें बिहार लाया गया। इनमें से कई माता पिता मर चुके हैं या पूरा परिवार तबाह हो चुका है, अगर सरकार ने ऐसे अनाथ बच्चों ध्यान नहीं दिया तो यह बच्चों की तस्करी का शिकार हो सकते हैं।

"बच्चों की तस्करी के लिए कुख्यात कोसी ने वाकई पूर्वी बिहार और सीमांचल के क्षेत्रों में अवसरों में इजाफा किया है। पहले से ही ये बच्चे गरीबी या बेरोजगारी में जी रहे थे। इन क्षेत्रों में बाल श्रम या बाल वेश्यावृत्ति की तस्करी आम बात है। ऐसे भी मामले हैं जिनमें पिता की मृत्यु के बाद मां घर नहीं चला पाई, खुद को थका दिया और बच्चे को अनाथालय में छोड़ दिया।

कैलाश सत्यार्थी ने किया ठोस कार्रवाई का आह्वान

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के 74वें सम्मेलन में कोरोना से प्रभावित बच्चों की सुरक्षा के लिए तत्काल आर्थिक सहायता और ठोस कदम उठाने की अपील की . उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रियों से अपने-अपने देशों में बच्चों के लिए विशेष बजट और विशेष कार्य योजना आवंटित करने के साथ ही एक टास्क फोर्स का गठन करने को कहा। जिनेवा में आयोजित 194 देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों और अन्य विश्व नेताओं की मौजूदगी में सत्यार्थी ने कहा, "कोरोना सिर्फ स्वास्थ्य और आर्थिक संकट नहीं है, यह न्याय, सभ्यता और मानवता का संकट है।" दुनिया में कोरोना से होने वाली तबाही से बच्चों को बचाने के लिए हमें उन्हें अपने साथ ले जाना होगा।

ऐसा नहीं है कि सरकारों को अनाथों की चिंता न हो। महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने इस साल अप्रैल से मई के अंतिम सप्ताह तक राज्यों और केंद्रीय क्षेत्रों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अब तक कम से कम 577 बच्चे ऐसे हैं, जिनके माता-पिता की मृत्यु हो गई है। उन्होंने एक ट्वीट में कहा, "सरकार ऐसे बच्चों की मदद और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। इन बच्चों को अकेला नहीं छोड़ा गया है, वे जिला प्रशासन के संरक्षण और निगरानी में हैं।"

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने भी भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कहा है कि कोविड से अनाथ बच्चों का भविष्य संवारना हमारी जिम्मेदारी है. उन्होंने बच्चों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नोवोडिया के स्कूलों में अनाथ बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करने को कहा है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अनुरोध के समर्थन में ट्वीट किया।

पालन-पोषण योजना में शामिल होंगे बच्चे

बिहार सरकार ने निर्देश दिया है कि जिन बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं है, वे ऐसे चाइल्ड होम केयर होम में रहें, जिन्होंने कोविड संक्रमण के कारण अपने माता-पिता को खो दिया हो।

सरकार इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या अनाथों के लिए तैयार परिवार उनकी उचित देखभाल कर सकते हैं।
कोरोना की दूसरी लहर में जान गंवाने वालों में कई 30-40 आयु वर्ग के हैं, जिनके छोटे बच्चे हैं। सरकारें उन्हें खोजने और उन तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं। कोविद के कठिन समय के दौरान, ऐसे बच्चों के लिए बाल तस्करी, यौन शोषण या बाल श्रम के जोखिम बढ़ गए हैं। समाज और सरकार के स्तर पर पूर्ण समन्वय से हृदय विदारक त्रासदी झेल रहे इन अनाथों को बचाना संभव होगा।

वे बच्चे, जिन्होंने अपने अभिभावकों को #COVID19 के कारण खो दिया, उनकी शिक्षा की व्यवस्था, उच्च शिक्षा हेतु ऋण और 18 वर्ष की उम्र तक रु. 5 लाख के स्वास्थ्य बीमा की सौगात #PMCares फंड द्वारा देने की घोषणा की गयी है| मप्र में इन बच्चों की देखभाल और पढ़ाई की जिम्मेदारी सरकार उठायेगी। मुख्यमंत्री #COVID19 बाल सेवा योजना का शुभारंभ किया गया है। MP सरकार ने कुछ योजनाओं के लिए ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था की है| इसका लिंक साझा किया गया है|

 http://covidbalkalyan.mp.gov.in/

हालांकि ये योजनाएं हितग्राही तक पहुंचे इसमें कई दिक्कतें हैं|

जानकारों का कहना है कि कोविड से जितनी मौतें हुई सिर्फ 5 फीसदी रिकॉर्ड में कोविड से मौत बताई गई, इन 5 फीसदी को जब सहायता मिल जाएगी तो ढोल पीटने वाले प्रचार करवा लेंगे, एक भी परिवार सहायता से वंचित नहीं रहा, सबको सहायता मिल चुकी। समाजसेवियों का मानना है कोविड पाजिटिव के बाद जिसका इलाज के दौरान, बिना इलाज या इलाज के बाद पोस्ट कोविड उपचार के दौरान मौत हुई, कोविड से डेथ मानी जानी चाहिए।

इसमें सरकार को एक नीतिगत फ़ैसला लेना होगा कि किसे कोविड डेथ माना जाए? दूसरा हेल्प सेंटर बनें, निजी संगठन सहायता केंद्र या नम्बर्स जारी कर सकते हैं|

केवल अनाथ बच्चों की बात नही है। कई बच्चों की माँ जिंदा है लेकिन किसी योग्य नहीं है। जमा पूंजी इलाज में खर्च हो गई है और परिवार कर्ज में डूबा है।

आम लोग कोविड से जुड़ी योजनाओं का लाभ लेने के लिए परेशान हो रहे हैं, उन्हें आवेदन का प्रारूप आदि आदि नहीं मिल रहे हैं| खास बात ये है कि जो बच्चे अनाथ हो चुके हैं उन्हें बहुत परेशानी है| वो कहाँ भटकेंगे? किससे बात करेंगे, रिश्तेदार भी ज्यादा लोड नहीं होते इनका सर्वे होना चाहिए|
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