भारतीय समाज :- गृहस्थ आश्रम (Grihastha Ashram)

भारतीय समाज :- गृहस्थ आश्रम (Grihastha Ashram)

ब्रह्मचारी को स्नातक संस्कार के बाद अपने अभिभावकों के पास वापस लौटा दिया जाता था। जिस प्रकार ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश के लिए उपनयन संस्कार माध्यम था, उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के लिए विवाह संस्कार। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के साथ वैयक्तिक जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आ जाता था। ब्रह्मचर्य आश्रम में बालक अधिकाधिक ज्ञानार्जन कर बौद्धिक विकास करता था। शारीरिक क्षमताओं का भी विकास वह इसी आश्रम के माध्यम से कर पाता था। व्यावहारिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों का बोध उसे इस आश्रम में नहीं होता था। गृहस्थ आश्रम इससे भिन्न स्थिति रखता है। ब्रह्मचर्य आश्रम में उसने जो सैद्धान्तिक ज्ञान अर्जित किया उसे वह गृहस्थ आश्रम में व्यावहारिक रूप में परिणत करता था।


चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थिति रखता था इस आश्रम के माध्यम से वह न केवल अतीत में अर्जित ज्ञान का प्रयोग कर गृहस्थ के कार्यों और कर्तव्यों का निर्वाह करता था वरन् मोक्ष की प्राप्ति के लिए आवश्यक तैयारी भी करता था धार्मिक दृष्टिकोण से यह प्रावधान रहा है कि जब तक व्यक्ति गृहस्थ जीवन का निर्वाह न कर ले तब तक उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अतः प्रत्येक हिन्दू के लिए गृहस्थ बनना और तत्संबंधी दायित्वों का निर्वाह अनिवार्य माना गया है।

एक हिन्दू के लिए चार पुरुषार्थों की पूर्ति अनिवार्य मानी गई है ये पुरुषार्थ है-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ब्रह्मचर्य आश्रम में इन चार पुरुषार्थों में से केवल एक पुरुषार्थ धर्म की ही पूर्ति होती थी गृहस्थ आश्रम में न केवल अर्थ और काम की पूर्ति की जाती थी वरन् मोक्ष की तैयारी भी इसी आश्रम में की जाती थी। अतः इस दृष्टि से भी गृहस्थ आश्रम का महत्व सर्वाधिक रहा है। हिन्दू दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनकाल में पाँच प्रकार के ऋणों में युक्त होता है। ये ऋण हैं - देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, अतिथि ऋण और भूत ऋण। देव ऋण वह ऋण है जिसके कारण मनुष्य योनि में जन्म

प्राप्त होता है। इसी कारण ईश्वर संबंधी ज्ञान अर्जित करने के कारण इस ऋण की पूर्ति वह गृहस्थ आश्रम में देव यज्ञ के माध्यम से करता है इसके अन्तर्गत प्रतिदिन यज्ञ करना, यज्ञ में आहुति देना और वेदों का पठन-पाठन करने का कार्य किया जाता था। ऋषि ऋण वह ऋण है जिसका ब्रह्मचर्य आश्रम में ऋषि से ज्ञान अर्जित कर बनता है। ऋषि अपनी साधना, ज्ञान के गंभीर अनुभव द्वारा ज्ञान का भंडार शिष्य को सौंपता है, इस प्रकार शिष्य द्वारा अर्जित ज्ञान ऋषियों की अर्थात गुरु की कृपा का ही प्रतिफल है। इस ऋण से उऋण होने के लिए 'ऋषि यज्ञ संपादित किया जाता था इसके अन्तर्गत न केवल ऋषि से अर्जित ज्ञान धन की सुरक्षा और उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण का कार्य किया जाता था वरन् ऋषि की शिक्षाओं को व्यावहारिक रूप में भी अपनाया जाता था। इसके साथ ही 'ब्रह्ममुहूर्त में उनका स्मरण और उन्हें श्रद्धा अर्पित करने का कार्य भी इस ऋण से उऋण होने के लिए निष्पादित किया जाता था। पितृ ऋण से अभिप्राय उस ऋण से है जो कि पिता से प्राप्त होता है या हुआ है। मानव जन्म पिता की दया का ही प्रतिफल है न केवल जन्म वरन पालन पोषण

भी पिता के कारण ही संभव हुआ है। अतः पिता के इस ऋण उऋण होने के लिए यह आवश्यक माना गया कि पुत्र भी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर 'सन्तति प्राप्ति का कार्य और उसके पालन-पोषण की व्यवस्था करें इसके अतिरिक्त पितरों का श्राद्ध, तर्पण एवं माता-पिता की समुचित देखभाल भी इसी संदर्भ में अनिवार्य मानी गई। अतिथि ऋण वह ऋण है जो ब्रह्मचारी द्वारा ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते हुए उदर-पूर्ति हेतु भिक्षा माँगकर प्राप्त किया गया था इस ऋण से मुक्ति के लिए सरल उपाय यह था कि गृहस्थ आश्रम में अतिथियों की समुचित सेवा सुश्रुषा करे, उन्हें दान आदि दे, ब्रह्मचारियों को भिक्षा प्रदान करे तथा समाज के हित में ऐसा करने के लिए सदैव तत्पर रहे। भूत ऋण से यह भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए कि यह वह ऋण है जो कि भूतों के द्वारा दिया जाता है यहाँ पर भूत से अभिप्राय मानव के अतिरिक्त प्रकृति में जो कुछ है, से लिया गया है इसके अन्तर्गत पशु, पक्षी, कीट-पतंगे, वनस्पति आदि रखी गई। यह भली भाँति विदित है कि जीवन निर्वाह के लिए ये मनुष्य के सहयोगी होते हैं अतः इनकी अनुकम्पा से उऋण होने के लिए प्रतिदिन भोग लगाना, पशुओं को अन्न अथवा चार-पानी देना, कीट-पतंगों के लिए स्वयं के भोजन में से अंश निकालना आदि का प्रावधान किया गया।

उपर्युक्त विवेचन से यह भली - भाति विदित होता है कि गृहस्थ आश्रम वह आश्रम रहा है, जिसमें कि व्यक्ति अपनी आयु का स्वर्णिम काल अर्थात युवावस्था का जीवन व्यतीत करता है। इस आश्रम में वह सर्वाधिक कार्यक्षमता का परिचय देकर न केवल स्वयं सफलतापूर्वक जीवन-यापन करता था, बल्कि समाज के लिए भी उपयोगी सिद्ध होता था गृहस्थ आश्रम में ही व्यक्ति अपने संपूर्ण ज्ञान का प्रदर्शन कर सकता था। इस आश्रम में रहकर धन अर्जित करना, धन का उपभोग करना, विवाह कर सुख की प्राप्ति करना. मोक्ष हेतु सन्तति विस्तार करना तथा धर्म का निर्वाह करने का कार्य करता था, इसीलिए गृहस्थ आश्रम को सब आश्रमों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया।


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