गुरबाणी : विकारों तथा अवगुणों की नींद से जागने का संदेश “सुतड़े असंख माइआ झूठी कारणे”

सभी मनुष्य समय के अनुसार कार्य करते हैं, लेकिन मनुष्य के शरीर की कुछ अपनी सीमाएं भी हैं। मनुष्य का शरीर कार्य करते हुए थक जाता है जिसके बाद इसे आराम की आवश्यकता होती है। इसी तरह से मनुष्य का दिमाग भी थकान महसूस करने लगता है। कई बार किसी के साथ झगडे़, बहस या परिवार में किसी दुख के कारण भी मनुष्य का दिमाग परेशान रहता है। लेकिन कुदरत ने इस थकान, चिंता, तनाव व दुख को दूर करने का भी साधन बना रखा है। यदि मनुष्य कुछ समय के लिए सो जाए तो सारी मानसिक थकान, चिंता व तनाव को भूल जाता है। नींद शरीर की जरूरी आवश्यकता है जिसके बिना जीवन संभव नहीं है। गुरबाणी भी नींद से जागकर प्रभु के साथ जुड़ने के विषय में हमें शिक्षा देती है। लेकिन गुरबाणी इस शारीरिक नींद के स्थान पर विकारों तथा अवगुणों की नींद से जागने का संदेश देती है।

 

 

कई मनुष्य सारी जिंदगी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, चुगली-निंदा, पराया रूप तकना, अवगुणों, बुराईयों, पाखंडों, कर्मकांडों तथा अंधविश्वासों में ही फंसे रहते हैं जिसको गुरबाणी में नींद कहा गया है। मनुष्य अपना पुरा जीवन पदार्थों तथा धन-संपदा के पीछे ही गुजार देता है और मानव जीवन के वास्तविक मकसद को भुला बैठता है। माया की इस नींद में जीव बचपनसे जवानी तथा जवानी से बुढापे की अवस्था में पहुंच जाता है परंतु फिर भी जीव विकारों की इस नींद से बाहर नहीं आ पाता और अंत में पश्चाताप करता हुआ संसार से चला जाता है।
सुतड़े असंख माइआ झूठी कारणे ।।
अर्थ- बहुत सारे  व्यक्ति झूठी माया के कारण नींद में सोये हुए हैं।
तिही गुणी संसारु भ्रमि सुता सुतिआ रैणि विहाणी ।।
अर्थ- माया के तीन गुणों के भ्रम में सारा संसार सो रहा  है और अपने जीवन को सोकर, रात  की तरह बिता रहा है।
नैनहु नीद पर द्रिसटि विकार ।। स्त्रवण सोए सुणि निंद वीचार ।।
रसना सोई लोभि मीठै सादि ।। मनु सोइआ माइआ बिसमादि ।।

 

अर्थ- आंखें पराया  रूप देखने  के विकार की नींद में मस्त हैं। कान  निंदा सुनने की नींद में सोए हैं, जीभ लोभ व इच्छाओं के मीठे स्वाद में सो रही है। मन माया के आनंद में सो रहा है।
विकारों की इस नींद के कारण ही व्यक्ति सारा दिन अपने कामों में लगा रहता है लेकिन प्रभु को याद नहीं करता। जब घर में पाठ करवाया जाता है तो सुनने का समय किसी के पास भी नहीं होता और रात के समय जागने का मन भी किसी का नहीं करता। लेकिन उसी घर में किसी पार्टी या शादि के समय डी.जे. लगाकर सारी रात नाचते रहेंगें तथा उस समय देखने वालों तथा सुनने वालों की नींद पता नहीं कहां गायब हो जाती है। उस समय रात को नौजवान, बच्चे, बुजुर्ग सभी सोना ही नहीं चाहते और खुब नाचते गाते हैं तथा उस समय घंटों नाचकर भी ना कोई आलस्य आता है और ना ही शरीर में कोई दर्द होता है |लेकिन वे ही नौजवान, बच्चे, बुजुर्ग जब गुरद्वारा साहिब में आकर कथा-कीर्तन सुनते हैं तो दस मिनट बाद ही आलस्य आने लगता है, शरीर में दर्द होने लगता है। इसी आलस्य व नींद के कारण ही जब प्रभु को याद करने की बात आती है तो हम सोचते हैं की अभी नहीं बाद में, पाठ फिर कर लेंगे। आमतौर पर यह भी सोचा जाता है कि अभी तो बहुत उम्र पड़ी है, अभी तो खाने-पीने के दिन हैं और जब बुजुर्ग हो जाएंगे तो अमृत भी छक लेंगे। लेकिन गुरबाणी हमें आलस्य ना करने का संदेश देती है।
बुरे काम कउ उठि खलोइआ ।। नाम कि बेला पै पै सोइआ ।।
अर्थ- किसी बुरे काम के लिए तो मनुष्य एकदम उठकर चल पड़ता है। लेकिन प्रभु को याद करने के समय  लेटकर सोता रहता है।
तिसु सेवत मनि आलसु करै।। जिसु विसरिऐ इक निमख न सरै ।।
अर्थ- उस  प्रभु को याद करते समय मन आलस क्यों कर रहा है। जिसको भुलाकर एक पल  भी नहीं रहा  जा सकता।
गुरबाणी समझाती है कि जिस प्रभु ने हमें जन्म दिया है, हाथ-पैर, शरीर, परिवार तथा अन्य पदार्थ दिये हैं उस प्रभु को याद करने में किसी भी प्रकार का आलस्य ना कर। गुरबाणी हमें शिक्षा देती है कि मोह, माया तथा अवगुणों की नींद से केवल गुरबाणी विचारकर और गुरू पर भरोसा रखकर ही जागा जा सकता है।
गुर परसादि नामि मनु लागा।। जनम जनम का सोइआ जागा।
अर्थ- गुरू की कृपा से मन प्रभु के नाम में लग जाता है। जिससे कई जन्मों का विकारों में सोया  मन जाग जाता है ।
गुर पूरे की चरणी लागु ।। जनम जनम का सोइआ जागु ।।
अर्थ- सच्चे गुरू की शिक्षा के साथ जुड़कर। जन्मों का अवगुणों में सोया हुआ मन जाग जाता है।
मनु तनु अरपि धरी हरि आगै ।। जनम जनम का सोइआ जागै ।।
अर्थ- अपने मन और तन को प्रभु के आगे अर्पण करके रख दे (अर्थात प्रभु के गुण मन में बसा ले)। इससे जन्मों का सोया मन तन जाग जाता है।
कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ।।
इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि ।।

 

अर्थ- कबीर जी समझाते हैं कि सो कर क्या कर रहा है उठकर प्रभु का नाम क्यों नहीं जपता। अंत में (मरने के बाद) एक दिन लम्बी लातें  पसार कर ऐसा सोएगा की दोबारा उठ ही नहीं पायेगा।
हम सभी को अनमोल मानव जीवन प्राप्त हुआ है ताकि हम उस प्रभु के नाम को मन में बसाकर अपने जीवन को सफल कर सकें। लेकिन मनुष्य प्रभु को भुलाकर जमीनों, पदार्थों, लोभ, मोह, अहंकार, काम, क्रोध, वाद-विवाद, निंदा, चुगली, झूठा दिखावा, मान-अभिमान, पाखंडों, कर्मकांडों, अंधविश्वासों, रंग-तमाशों, मौज-मस्तियों, पार्टियों, शराब, नशे, नाचना, गाना, फिल्में-नाटक, आदि और पता नहीं कितने ही प्रकार के कर्मों की नींद में सारी जिंदगी फंसकर सोता रहता है। मनुष्य अपने अनमोल जीवन के महत्व को समझ ही नहीं पाता और इस कीमती जीवन को ऐसे ही व्यर्थ गंवा बैठता है। हमारे जीवन की यह नींद केवल गुरबाणी को समझकर, मानकर एक प्रभु पर भरोसा रखकर ही खुल सकती है। लेकिन बहुत सारे सज्जनों की अवगुणों की यह नींद सारी जिंदगी खुल ही नहीं पाती और अंत में जब मृत्यु का डंडा सिर के उपर लगता है तब उनको अपनी गलती का एहसास होता है।

 

तब नरू सुता जागिआ सिरि डंडु लगा बहु भारू ।।
अर्थ- विकारों की नींद में सोया हुआ मनुष्य तब जागता है जब बहुत भारी डंडा अंत में जोर से सिर पर लगता है।

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