हनुमान जी ने भी किया था, ख़ुदकुशी का इरादा.. दिनेश मालवीय 

हनुमान जी ने भी किया था, ख़ुदकुशी का इरादा.. दिनेश मालवीय
इस बात को फिर से दोहराना बहुत ज़रूरी लगता है कि जीवन कथा-कल्पनाओं से अधिक विचित्र है। जीवन की विचित्रताएं इतनी विचित्र हैं कि उन्हें देखकर विचित्रता भी अक्सर हैरान रह जाती है। उन्हें व्यक्त करने मे लेखनी स्वयं को असमर्थ पाती है। व्यक्त करने मे शब्द बौने सिद्ध हो जाते हैं।
dinesh

आज हम एक ऐसा प्रसंग लेकर उपस्थित हुए हैं, जिस पर आपको भरोसा करना आसान नहीं होगा। कहते हैं कि दुनिया मे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ जिसके मन मे कभी किसी क्षण मे ख़ुदकुशी का ख़याल न आया हो। जीवन मे कई बार ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं कि चारों तरफ निराशा के घने बादल छा जाते हैं। अवसाद हमारे विवेक पर भारी पड़ जाता है। ऐसी स्थिति मे बड़े से बड़े बहादुर और दृढ़ संकल्प के धनी लोग भी इसके शिकार हो जाते हैं।


यह और बात है कि इस ख़याल को अमल मे बहुत कम लोग ला पाते हैं। इस बात पर विश्वास करना किसी के लिये भी लगभग असंभव होगा कि असंभव कार्य करने के लिये प्रसिद्ध, ज्ञानियों मे अग्रणी और श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान जी के जीवन मे भी एक बार ऐसे हालात बने, कि उन्होंने ख़ुदकुशी का इरादा कर लिया। यह और बात है कि कुछ ही समय मे उनके विवेक ने इस अविवेकपूर्ण भाव पर विजय प्राप्त कर ली। उन्होंने विषाद पर विजय प्राप्त कर अपना लक्ष्य प्राप्त किया।

हनुमान जी


यह अद्भुत प्रसंग वाल्मीकीय रामायण के "सुंदरकांड" मे आता है। पवनपुत्र हनुमान जब सारी बाधाओं पर विजय प्राप्त कर विशाल समुद्र को लांघकर लंका मे पहुँचे तो सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि इतने विशाल और मायाजाल से भरे नगर मे सीताजी की तलाश कहाँ की जाये। सम्पाती से यह तो पता लग चुका था कि माता सीता लंका मे हैं, लेकिन वह किस जगह पर हैं, इसका उन्हें पता नहीं था। इसके अलावा वह सीताजी को पहचानते भी नहीं थे। उन्होंने कभी उन्हें देखा ही नहीं था। बहरहाल, उनके बारे जो सुना था, उसके आधार पर उनके मन में सीताजी की कुछ कल्पना अवश्य थी।


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हनुमानजी बड़ी दुविधा मे पड़ गये। उन्होंने रावण के सभी महलों को छान डाला। वहाँ उन्होंने हज़ारों स्त्रियों को देखा, लेकिन सीताजी से मेल खाती छवि की कोई स्त्री नहीं दिखाई दी। उन्हें यह भी विश्वास था कि परम सती, श्रीराम की पवित्र अर्धांगिनी जनकनंदिनी सीता रावण की सेवा मे उपस्थित हो ही नहीं सकतीं।

हनुमान जी

उनके मन मे यह विचार आया कि सीताजी जीवित नहीं हैं। रावण जब उनका अपहरण कर समुद्र पार कर आ रहा था, तब अवश्य ही वह उसका हाथ छुड़ाकर समुद्र मे गिर गयी होंगी। यह भी हो सकता है कि क्रूर रावण से बचने का कोई उपाय न देखकर उन्होंने प्राणों का त्याग कर दिया हो। यह भी संमव है कि नीच रावण ने उन्हें खा लिया हो। इस तरह के विचार मन मे घुमड़ने पर हनुमानजी को एक तरह से ऐसा निश्चित हो गया कि श्रीराम की प्रिय भार्या अब जीवित नहीं हैं।


यह विचार भी उनके मन में आया कि रावण ने उन्हें किसी परम गुप्त स्थान पर रखा हो, जहाँ तक पहुँच पाना असंभव हो। हनुमानजी ने सोचा कि सीताजी के बिना श्रीराम कैसे जीवित रहेंगे। इस प्रकार उन्हें सीताजी के जीवित न होने की सूचना देना बहुत घातक होगा। शोक मे श्रीराम अपने प्राण भी गँवा सकते हैं। ऐसा होने पर लक्ष्मण भी जीवित नहीं रह पाएँगे। उनके न रहने पर शोक के कारण पूरा रघुकुल ही नष्ट हो जाएगा। लिहाजा किसी भी तरह उन्हें यह सूचना देना उचित नहीं होगा। लेकिन यह जानकारी नहीं देना भी अनुचित होगा। 


दोनो स्थितियां विकट हैं। इसके अलावा हनुमानजी के मन मे यह विचार भी आया कि यदि मैं सीताजी की खोज किये बिना किष्किंधा लौटा, तो मेरा पुरुषार्थ क्या रह जाएगा। मुझे महाराज सुग्रीव और अन्य वानर साथी क्या कहेंगे। सुग्रीव का भी घोर अपमान होगा। सारे वानर ग्लानि से भरकर आत्महत्या कर लेंगे। विचारों की इस ऊहापोह में हनुमानजी ने निश्चय किया कि वह किष्किंधा नहीं जाएँगे। उन्होंने चिता बनाकर जलती आग में भस्म हो होने का इरादा किया। उनके मन मे ख़ुदकुशी के और भी अनेक उपाय सूझे।


लेकिन तत्काल उनका विवेक फिर जाग उठा। उन्होंने सोचा कि ख़ुदकुशी कर जीवन का नाश करने मे अनेक दोष हैं। जीवित रहकर किसी भी समय अभीष्ट की प्राप्ति संभव है। ख़ुदकुशी कायरता तो है ही, इससे अपना लक्ष्य पाने की संभावना ही समाप्त हो जाती है।
हनुमानजी ने दृढ़ निश्चय किया कि कुछ भी हो जाए, वह सीताजी का पता लगाये बिना वापस नहीं जाएँगे। वह ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उनकी नज़र अशोकवाटिका पर पड़ी। उन्होंने वहाँ सीताजी की खोज करने का निश्चय किया। वह अशोकवाटिका मे गये और वहाँ उन्होंने सीताजी को देखा। उनसे मिलकर वह अनेक तरह से उन्हें यह विश्वास दिलाने मे सफल हो गये कि वह सचमुच रामदूत हैं, कोई मायावी राक्षस नहीं। उसके बाद अशोकवाटिका को उजाड़ने, लंका दहन तथा बाद के घटनाक्रम का तो हम सभी को पता ही है।


इस प्रसंग से यह सीख मिलती है कि जीवन मे विपरीत स्थिति के कारण ख़ुदकुशी जैसे अतिवादी क़दम से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। विवेक का सहारा लेकर हमे आत्मविश्वास और पराक्रम से जीत हासिल करनी चाहिए। आप किसी एग्जाम मे फैल हो गये हों, Job चली गयी हो, व्यापार मे घाटा हो गया हो, कोई मक़सद हासिल नहीं हो रहा हो, कैसी भी विकट स्थितियां हों, ख़ुदकुशी नहीं करनी चाहिए। जीवन है तो सबकुछ पाया जा सकता है।

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