क्या भारत में राजनीति सिर्फ ‘धंधा’ बनकर रह गयी है -दिनेश मालवीय

क्या भारत में राजनीति सिर्फ ‘धंधा’ बनकर रह गयी है

दिनेश मालवीय
dineshआज उत्तरप्रदेश से आई एक खबर ने बहुत दुखी किया. एक जाति विशेह के नेता ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि अगर मेरे बेटे को मंत्रिपद नहीं दिया गया तो सत्तारूढ़ भाजपा को बहुत भारी भरी नुकसान उठाना पड़ेगा. यह तो सीधी-सीधी ब्लैकमैंलिंग और धमकी है. यह सही है कि हमारे देश में आजादी के बाद राजनीति देशसेवा का माध्यम न होकर एक प्रोफेशन , व्यवसाय या धंधा बन गयी है. खैर व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह कोई बहुत बुरी बात नहीं है. लेकिन जब राजनीति करने वाले लोग इस स्तर तक नीचे उतर जाएँ, तो यह घोर पतन की ओर संकेत करता है.

परिवारवाद

आज की राजनीति में परिवारवाद सबसे भयानक बुराई के रूप में उभरा है. इस बुराई से कोई कोई भी सियासी पार्टी अछूती नहीं है. किसी पार्टी में यह बुराई पूरी तरह हाबी है तो किसी में कहीं-कहीं कुछ अंश में है. इससे पूरी तरह कोई नहीं बचा है. कुछ सियासी पार्टियाँ तो किसी परिवार या व्यक्ति की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी जैसी हो गयी हैं. सर्वोच्च पद पर उसी परिवार का व्यक्ति बैठेगा, कोई दूसरा बैठने की कल्पना भी नहीं कर सकता. किसी भी पार्टी का नाम बताने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह सबको पता है. हालाकि भारतीय जनता पार्टी में परिवारवाद पूरी तरह हाबी नहीं है, लेकिन कहीं-कहीं इसकी झलक देखने को मिल जाती है. फिर भी पार्टी या सरकार में सर्वोच्च पद पर किसी ख़ास परिवार का व्यक्ति ही बैठेगा, ऐसा बिलकुल नहीं नहीं है. कहीं जो थोड़े से उदाहरण मिलते हैं, वे इसलिए बहुत अनुचित भी नहीं कहे जा सकते हैं कि किसी बड़े नेता के पुत्र-पुत्री सांसद या विधायक के टिकट भले ही पा जाते हैं, लेकिन सर्वोच्च पद के लिए उनमें आग्रह नहीं होता.

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इस बुराई से साम्यवादी दल भी बचे हुए हैं, लेकिन उनकी बहुत सारी गलत नीतियों के कारण उनका अस्तित्व नाममात्र का रह गया  है.

इसके अलावा, किसी बड़े नेता की संतान होने भर से कोई राजनीति करने के योग्य नहीं हो जाता.अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति में भी जाने का सबको पूरा अधिकार है. लेकिन जैसा उत्तरप्रदेश के उपरोक्त नेता ने कहा वैसा कहना, घोर परिवारवाद की श्रेणी में आता है.वह अगर पार्टी प्लेटफार्म पर यह बात कहते तो भी समझ में आता, यकीन सार्वजनिक रूप से ऐसा कहना कहीं से उचित नहीं है. यह किसी जाति के थोकबंद वोट दिलवाने की सुपारी लेने जैसा है.

यह तथ्य तो किसीसे छिपा नहीं है कि भारत में राजनीति घोर जातिवाद की शिकार है. चुनावों में उम्मीदवारों का चयन हो या किसीको कोई पद देने की बात हो, उसका सबसे प्रमुख आधार जाति ही होती है. कोई कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन इस बुराई को हटाने के लिए किसीके पास नकोई इच्छाशक्ति है और न योजना.

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“वाद” का नासूर

भारत की राजनीति में एक बहुत घातक तत्व “वाद” आ गया है. उत्तरप्रदेश में अगले वर्ष चुनाव हैं. एक सज्जन से बात करने पर उन्होंने बताया कि इस बार भाजपा वहाँ नहीं आएगी. उन्होंने यह बात बहुत विश्वास के साथ कही. कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि उस प्रदेश में ब्राह्मण वर्ग भाजपा से बहुत नाराज़ है, क्योंकि वहाँ के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “ठाकुरवाद” चलाया हुआ है. मैंने पूछा कि इसके पहले जो दल वहाँ शासन करते थे, उनके बारे में आपका क्या कहना है? वह बोले कि समाजवादी पार्टी ने “यादववाद” और उसके पहले मायावती ने “दलितवाद” चलाया था. जब वहाँ ब्राह्मण मुख्यमंत्री हुआ करते थे, तो उन्होंने इस तरह खुलकर “ब्राह्मणवाद” भले ही नहीं चलाया
हो, लेकिन कहीं छिपकर वे ऐसा ज़रूर करते रहे. लेकिन छिपकर थोड़ा-बहुत ऐसा करना इस बात का सबूत था कि उस समय तक स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्य बचे हुए थे. आज तो इसकी पूरीतरह धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं. “वाद” कोई सा भी भी हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था का शत्रु है.

स्वार्थ-आधारित गठजोड़: कोई विचारधारा नहीं

भारत की राजनीति में एक और खतरनाक ट्रेंड यह आया है कि कुछ या बहुत से दल किसी ख़ास दल को चुनाव में हारने के लियी गठबंधन कर लेते हैं. इसमें ऐसे दल भी एक मंच पर आ जाते हैं, जिनकी विचारधाराओं में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है. वैचारिक स्तर पर उनमें ज़रा भी समानता होने पर भी वे सिर्फ स्वार्थ के वशीभूत एक मंच पर आ जाते हैं. अनेक बार तो विचारधारा के मामले में धुर विरोधी दलों के गठबंधन की सरकारें भी बनीं हैं. यह और बात है कि वे बहुत सफल नहीं हुयीं.उनका सारा समय अपनी सत्ता को बचाए रखने में बीत गया. आयाराम-गयाराम का सिलसिला भी  चलता रहा. लोकतंत्र में गठबंधन और गठबंधन सरकार अपने आप में कोई बुराई नहीं ही. लेकिन इसका उद्देश्य मात्र सत्ता पाना और सत्ता में बने रहना हो तो, इसमें जनहित और जनकल्याण के लिए किसके पास समय होगा!

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कांग्रेस अपने आप को इस देश में “धर्मनिरपेक्षता” और विचारधारा आधारित पार्टी होने का दावा करती रही है. लेकिन केरल में वह घोर साम्प्रदायिक मुस्लिम लीग से गठबंधन करने में कोई संकोच नहीं करती. इसी तरह घोर साम्प्रदायिक पार्टी शिवसेना के साथ भी उसने महाराष्ट्र में गठबंधन कर सरकार बनायी है. भाजपा ने भी उत्तरप्रदेश में घोर जातिवादी बहुजन समाज पार्टी और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने में कोई संकोच नहीं किया. बिहार में भी उसकी जेडीयू के साथ मिलीजुली सरकार है. मध्यप्रदेश में पिछले साल ही बड़ी संख्या में कांग्रेस विधायक भाजपा में आ गये और वहाँ कमलनाथ सरकार गिर गयी और भाजपा की सरकार बन गयी.

इस प्रकार देखा जाये तो आज भारत की राजनीति में न विचारधारा का कोई स्थान है न लोकतांत्रिक सोचा का.जब जिसे जो अपने लाभ में लगता है, वह वैसा कर लेता है. हमाम में सभी नंगे हैं.सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करने वाले दल और नेता भीतर से एक-दूसरे के सहायक ही दिखाई देते हैं. इसमें सबसे अधिक् नुकसान आम जनता का होता है.

आज की स्थिति को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि इन हालत में जल्दी ही कोई बदलाव आएगा. जब हर एक दल देश और जनहित को अपने हित से ऊपर नहीं रखेगा, तब
तक यह होना असंभव है. लोकतंत्र सिर्फ एक ढकोसला ही बना रहेगा.

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