विदेशों से आकर भारत में ब्राह्मण बने…! रावण की त्रैलोक्य विजय-19

विदेशों से आकर भारत में ब्राह्मण बने…!

रमेश तिवारी

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रावण की त्रैलोक्य विजय -19 

हम आर्यों और अनार्यों की जीवन पद्धतियों की बात कर रहे हैं, तो चर्चा को विश्व पटल से जोड़कर देखने में भी कोई हर्ज नहीं है। रावण के जन्म से पहले और आज तक भी भारत भूमि पर विदेशी लोग आते ही रहे हैं।हमारी जानकारी में यह बातें आईं ही नहीं। कारण कि जन सामान्य को किसी ने यह बताईं हीं नहीं।

रावण के अस्तित्व से पूर्व से गोकर्ण (गोवा) में परशुराम जी का महान आश्रम (सैन्य शिक्षण शिविर ) था। इसी आश्रम में रावण ने अपने भाइयों के साथ शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी। एक महत्वपूर्ण बात और ...भी परशुराम के साथ जुडी़ है... "उन्होंने चांडालों को ब्राह्मणों का स्थान दिया...? यह चांडाल कौन थे और इनको ब्राह्मण बनाने की आवश्यकता क्या थी।

महाराष्ट्र राज्य में देशस्थ और कोकणस्थ ब्राह्मणों के बीच मतभेद बहुत पुराना रहा है।सही बात तो यह है कि महाराष्ट्र के असल ब्राह्मण तो देशस्थ ही हैं।फर्जी बने कोंकणस्थ ब्राह्मणों की रोचक कथा पर हम आगे विस्तृत चर्चा करने वाले हैं। आप ऋषि जमदग्नि,मां रेणुका और परशुराम का भौगोलिक इतिहास देखेंगे तो हतप्रभ रह जायेंगे। आर्य संस्कृति की जननी और पोषक सरस्वती नदी के तट से लेकर,भडौंच,ब्रह्मपुत्र और हिमालय तक उनका वर्चस्व था। मैंने बहुत सूक्ष्मता से देखने का प्रयास किया तो,ज्ञात हुआ कि देश में ऐसे सैकड़ों स्थान हैं जहां पर कि परशुराम के मंदिर स्थित हैं। उडी़सा में महेन्द्र गिरि का सैन्य आश्रम तो इतना प्रसिद्ध था कि कर्ण जैसे महावीर को सैन्य प्रशिक्षण और देवास्त्र ( ब्रह्मास्त्र )का ज्ञान लेने हेतु ब्राह्मण बनकर दीक्षा लेना पडी़ थी। किंतु इसी असत्य के कारण युद्ध क्षेत्र में उसके प्राण भी चले गए थे।फर्जीपन हमेशा आत्मघाती होता है। इतिहास इसका प्रमाण है। ब्राह्मण बनकर मेवा ग्रहण करने की लालसा आज के संदर्भ में भी चली आ रही है। फर्जी ब्राह्मण बनने के उदाहरणों से इतिहास भरा पडा़ है, हम इन तथ्यों पर सप्रमाण बात करेंगे। परशुराम के जन्म स्थान को लेकर देश में कई, स्थानों पर भले ही विवाद है ,परन्तु पुराणों में जिस जमदग्नि पुरम का विवरण सत्य दिखाई पड़ता है, वह बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर है। उसकी प्रामाणिकता इस तथ्य से भी लगती है कि सासाराम में सहस्त्रबाहू की समाधि जो है। कोतवाली के समीप। फिर सासाराम का वास्तविक नाम भी सहस्त्रराम पुराणों में लिखा मिलता है। यह भी रोचक है कि यह संबोधन सहस्त्रराम से सासाराम कैसे हो गया।

जब अंग्रेज भारत में आये,उन्होंने मुसलमानों की तरह हमारे ऐतिहासिक महलों मंदिरों और मूर्तियों के विध्वंश की तरह भाषाई विध्वंश शुरू कर दिया। वे तुम को तो टुम बोलते थे।जब वे सहस्त्रराम का उच्चारण नहीं कर सके तो नाम कर दिया सासाराम। जो लोग विधर्मियों द्वारा भारत के महान नगरों के नाम परिवर्तन का महत्व समझते हैं, वे जानते हैं कि सहस्त्रराम के पीछे कितना महान इतिहास छिपा है। हम ताटका वध के समय बक्सर (शाहाबाद) के गोंडाइल पर्वत का उल्लेख करते रहे हैं, तब यहां दो ऐतिहासिक जनपद हुआ करते थे। मलद और करूष। अर्थात मल और भूख। इंद्र की ब्रह्म हत्या (वृत्रासुर वध) से जुडी़ है,यह कथा। इन जनपदों के नामकरण की। परन्तु हम जिस सहस्त्रराम की बात कर रहे हैं वह गोंडाइल पर्वत पर स्थित "तारादेवी के "शक्तिपीठ से संबंधित है। जमदग्निपुरम ,जिसको अब जमुनिया गांव कहते हैं,के आश्रम में सहस्त्रबाहू द्वारा अपने पिता ऋषि जमदग्नि का शीश काटे जाने के बाद क्रुद्ध परशुराम ने सहस्त्रार्जुन के जे कथित एक हजार हाथ अपने परशु से काटे। यहीं पर सहस्त्रार्जुन का वध भी किया। पुराण में लिखा है कि -सहस्त्रार्जुन के नाम से सहस्त्र लिया और -परशुराम के नाम से "राम "लिया।और सहस्त्रबाहू के उस वध स्थल का नाम हो गया सहस्त्र राम।असंस्कारी अंग्रेजों ने इस महान घटना को विस्मृत ही करा दिया।

मित्रों हम चले कहां से थे और चले कहां गये। तो हम लौटते हैं कोंकणस्थ और देशस्थ ब्राह्मणों की ओर।एक बार बिहार के ब्राह्मणों द्वारा परशुराम का साथ न दिया जाने से परशुराम ने चांडाल कहे जाने ल वाले इन्हीं कोंकणस्थ को ब्राह्मणों का दर्जा दे दिया। प्रश्न उठता है कि आखिरकार वे कोंकणस्थ थे कौन और महाराष्ट्र के समुद्री किनारे पर कर क्या रहे थे....? यहीं से यह प्रकरण विदेशियों से जुड़ जाता है...! कैसे...? यह रोचक विषय न केवल गंभीर है बल्कि चिंतनीय भी है। ऐसी अनेक घटनाओं ने भारतीय आर्यों के संस्कारों को भ्रष्ट किया है।


हम इतना ही जानते हैं कि भारत में केवल, लोधी, पठान और मुगल ही आये। या बाद में पुर्तगीज, डच ,फ्रांसीसी या कि अंग्रेज ही। रावण के पहले भारत में मिश्र के लोग भी आये हैं। नावों से भारत के दक्षिण समुद्र तक आये जो लोग थे, वे भी उसी आकर्षण में ब्राह्मण बन गये जैसे रावण के साथ आस्ट्रेलिया से आईं जातियां द्रविडो़ की तरह ब्राह्मणों में मिल गईं थीं। हम मिश्रवासी इस जाति पर विस्तृत प्रकाश डालेंगे। किंतु साथ में यह भी जान लें कि और कौन कौन विदेशी भारत में आकर ब्राह्मण बने। उन्होंने विशुद्ध शाकाहारी, संस्कारवान और उच्च चरित्र ऋषियों के इस देश को पथभ्रष्ट करके गर्त में ले जाने का अपराध किया।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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