मैं हिन्दी का “दुखीलाल” -दिनेश मालवीय

एक साल पहले मेरे शहर के एक बड़े राजनेता की मृत्यु हुयी. वह सियासी आदमी होने के साथ ही बहुत साहित्यानुरागी भी थे. हिन्दी भाषा के विकास और प्रसार को लेकर हमेशा उत्साहित रहते थे. कुछ कविताएँ भी कर लेते थे. अपनी खूबियों की वजह से वह शहर ही नहीं पूरे प्रदेश के नेता माने जाते थे.

उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम उनके समृद्ध सुपुत्रों न बहुत धूमधाम से आयोजित किया. उसी दिन मेरा उनके बंगले के सामने से गुजरना हुआ. मुझे वहाँ लगे बैनर को पढ़कर बहुत दुःख हुआ. इसमें श्रद्धांजलि को “श्रद्धांजली” लिखा गया था. मैं सोचने लगा कि शास्त्रों के अनुसार मरने वाले की आत्मा तेरहवीं के दिन तक उसके घर के आसपास भटकती रहती है. अगर यह सही है तो उन महानुभाव की आत्मा भी इस आयोजन स्थल के आसपास होगी ही. उसने यह बेनर ज़रूर पढ़ा होगा. उसे दुःख तो अपार हुआ होगा, लेकिन मजबूरी यह है कि अब शरीर न रहने पर वह बोल नहीं सकती थी. ऐसा लगता है कि आज उस आत्मा ने मुझे माध्यम बनाकर इस लेख में यह दुःख व्यक्त करवा दिया.

बहरहाल, मेरे इस प्रकार दुखी होने का यह पहला मौका नहीं था. इस तरह से दुखी होना या तो मेरी किस्मत में ही लिखा है या फिर मैं मूर्खतावश ऐसी बातों से दुखी होता रहता हूँ.

कुछ दिन पहले की ही बात बतलाऊँ. मैं एक हिन्दी धार्मिक सीरियल बहुत चाव से देखता था. सचमुच बहुत अच्छा सीरियल है. लेकिन देखते-देखते कुछ ऎसी बात हुयी कि मुझे लगा जैसे मैं मार्ग पर चलते हुए अचानक मुझे किसी पत्थर से ठोकर लग गयी. उसमें एक ऋषि और राजा के संवाद में कम से कम पाँच बार “अश्वमेघ” शब्द का उपयोग किया गया. मैं भी थोड़ा-बहुत टूटा-फूटा कुछ जानता ही हूँ. मेरी जानकारी के अनुसार यह शब्द “अश्वमेघ” न होकर “अश्वमेध” है. पहली बार मुझे लगा कि शायद मेरे ही कान में मेल के कारण मैंने गलत सुन लिया. फिर दूसरी और तीसरी और उसके बाद पाँचवीं बार भी जब यही कहा गया, तो मैं इस ग़लत उच्चारण पर दुखी हो गया. ऐसा दुखी हुआ कि गूगल और शब्दकोश भी छान मारे. गूगल बाबा कहता है के 56 प्रतिशत लोग “अश्वमेध” को सही मानते हैं और 44 प्रतिशत लोग “अश्वमेघ” को. शब्दकोश के अनुसार “अश्वमेध” सही है.

एक दिन “डीडी भारती” पर एक बड़ा सुंदर कार्यक्रम देखते हुए भी मुझे दुखी होने का “सुअवसर” प्राप्त हो गया. अंग्रेजी एक्सेंट से हिन्दी बोलने वाली एंकर ने “देवनागरी” को “तीन बार “देवनगरी” कहा. मुझे लगा कि उसका मुँह नोच लूँ. मैं तो ठीक हूँ, लेकिन नयी पीढी, जो पहले से ही हिन्दी से विमुख हो रही है, वह तो “देवनगरी” को ही सही मानकर चलेगी.

हिन्दी अखबार वाले भी मुझे दुखी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. एक शब्द ने मुझे बहुत लम्बे समय तक उलझाए रखा. अखबारों में पढता रहता था “दम्पत्ति” या “दंपती”. लेकिन शब्दकोश देखने पर मालूम हुआ कि सही शब्द “दंपती” है.

वैसे अपने हिन्दी भाषी समाज में “मेधावी” को “मेघावी” और “नमस्कार” को “नमश्कार”, बोलने बाले और “आशीर्वाद” को “आर्शीवाद” लिखने वाले भी  कम नहीं हैं.

मुझे उज्जैन यात्रा के दौरान वहाँ के व्यापारी इतना दुखी कर देते हैं कि मैं उज्जैन के आनंद को भूलकर हिन्दी को लेकर दुखीलाल बन जाता हूँ. इस धर्म-नगरी की ज्यादातर  दुकानों के जो नाम लिखे हैं, उनमें मात्राओं का बिल्कुल गलत प्रयोग किया गया है. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि भोपाल से एक पेंटर ले जाकर इन सारे गलत नामों पर काला रंग पुतवा दूं. लेकिन पिटने के डर से अपनी इस हसरत को दबा लेता हूँ. यह भी सोचता हूँ कि उज्जैन तो साहित्य कि नगरी है. वहाँ हिन्दी तो क्या संस्कृत तक के बड़े-बड़े विद्वान् हुए हैं और आज भी हैं. क्या उन्हें यह गलत नाम नहीं दिखते? वे इनमें सुधार के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाते?

इस सन्दर्भ में एक बड़ा मजेदार क़िस्सा याद आ गया. हमारे प्रदेश की राजधानी भोपाल में दो साल पहले दसवां “विश्व हिन्दी सम्मलेन” हुआ. इसमें प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और न जाने कितने हिन्दी के विद्वान आये थे. सबने हिन्दी के प्रयोग की इतनी वकालत की कि हमारे मुख्यमंत्रीजी जोश में भरकर न्यू मार्केट पहुँच गये. उन्होंने कहा कि जिन दुकानों के नाम अंग्रेजी यानी रोमन लोमन लिपि में लिखे हैं, उन्हें बदलकर हिन्दी यानी देवनागरी में करवाने की मुहिम चलाई जाएगी. वे तमाम दुकानदारों से इसके लिए हाथ जोड़कर अपील भी कर आये. उनके इस जोश की अखबारों में भी खूब तारीफ़ हुयी. लेकिन दो साल बाद भी जब में वहाँ से गुजरता हूँ तो अधिकतर नाम अंग्रेजी में ही लिखे देखकर मैं दुखी हो जाता हूँ.

कुछ वर्षों से ऑफिस से घर जाना भी मेरे लिए दुःख का कारण बन गया है. हुआ यूँ है कि मेरे घर के रास्ते में हमारे शहर की मशहूर भोजन की दुकान “बापू की कुटिया” के मालिक ने दुकान का नाम रोमन में Bapu Ki Kutiya लिखवाया है. इसे पढ़कर अक्सर लोग असमंजस में पड़ जाते हैं. हमारे कवि मित्र चौधरी मदनमोहन “समर” भी इसे देखकर दुखी होते रहते हैं. उन्होंने एक बार फेसबुक पर यह दुःख व्यक्ति भी किया है. लेकिन क्या किया जाए? वह पुलिस अधिकारी होते हुए भी जब कुछ नहीं कर सकते तो मैं बेचारा क्या कर सकता हूँ?

इस सब के लिए मैं किसे दोष दूँ? जिसे दोष दूँगा, वही आज के इस असहिष्णुता के दौर में मुझे मारने दौड़ेगा, सुधार की तो बात ही छोडिये. लेकिन हिन्दी की ”हिन्दी” होने पर मैं कुछ कर पाऊँ या न कर पाऊँ, कम से कम दुखी तो हो ही सकता हूँ और आपको दुखी करने की कोशिश भी कर ही सकता हूँ.

Priyam Mishra



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