हिन्दी लोकोक्तियाँ 28 -दिनेश मालवीय

हिन्दी लोकोक्तियाँ-28

-दिनेश मालवीय

1.जो कहते हैं, वे करते नहीं.
लम्बी-चौड़ी बातें करने वाले कुछ करते नहीं हैं.2.जो कान छिदाय, वही गुड़ खाए.
कष्ट उठाने वाला ही सुख भोगता है.

3.जोड़-जोड़ मर जायेगे माल जमाई खायेंगे.
बहुत कंजूसी कर धन जोड़ने वाले का धन मरने वाले के धन का उपयोग दूसरे ही करते हैं.

4.जो जागत है सो पावत है.
जो जागरूक रहता है, वही लाभ में रहता है.

5.जोर कम गुस्सा ज्यादा.
कमजोर आदमी को गुस्सा बहुत आता है.

6.ज्यादा जोगी मठ का उजाड़.
एक काम को बहुत से लोग करें तो वह बिगाड़ जाता है.

7. झंडे तले की दोस्ती.
चार दिन की या रास्ते की मित्रता.

8. झूठ के पांव नहीं होते.
जूठा व्यक्ति परीक्षा में नहीं टिक सकता.

9.झूठे का मुँह काला.
झूठ अंत में हार ही जाता है.

10.झूठे की नांव मझधार में डूबे.
झूठ बोलने वाला सफल नहीं होता.

11.टका ही माँ-बाप.
धन ही सबकुछ है.

12. टका-सा जबाव देना.
कुछ काम करने से साफ़ मना कर देना.

13.टकों के चाकर.
पैसों के गुलाम.

14.टाँगें बिरहा गा रही हैं.
पैर खूब दुःख रहे हैं.

15.टूटा औजार और खोता बेटा.
ये दोनों समय पर कम आ जाते हैं.

16.टेढ़ी उंगली से ही घी निकाला जाता है.
शराफत से को काम न करता हो तो, उससे डांट कर करवाया जाता है.

17.ठनठनपाल मदनगोपाल.
खाली जेब वाले के लीये खा जाता है.

18.ठंडा करके खाओ तो मुँह क्यों जले.
जल्दबाजी में काम न करो तो नुकसान नहीं होगा.

19.ठंडा बुखार.
बीमारी का बहाना करने वाले के लिए व्यंग्य से कहा जाता है.

20. ठंडा लोहा गर्म लोहे को काटा है.
शांत मिज़ाज का व्यक्ति क्रोधी को हरा देता है.


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