सहज, आनंद, समरसता और सद्भावना का त्यौहार है होली.. दिनेश मालवीय

सहज, आनंद, समरसता और सद्भावना का त्यौहार है होली.. दिनेश मालवीय
dineshआनंद मनुष्य का सहज स्वाभाव है. सांसारिक जीवन में मन और चित्त पर विभिन्न कारणों से आये विकारों की वजह से यह आनंद लुप्त हो गया है. इसी आनंद की तलाश में मनुष्य कुछ न कुछ करता रहता है. सच पूछिए तो उसके अधिकांश कार्यों का मकसद आनंद प्राप्त करना ही होता है. इसके लिए वह कोई अवसर नहीं चूकता.

उत्सवधर्मी भारत देश में लगभग हर दिन कोई त्यौहार होता है. फागुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का त्योहार भारत के प्रमुख त्योहारों में शामिल है. इसकी अन्य विशेषताओं के साथ-साथ सबसे बड़ी बात यह है कि इस दिन छोटे – बड़े; अमीर-गरीब;, उच्च और निम्न;, ताकतवर और कमज़ोर- सभी एक रंग में रंग जाते हैं. वे किसी भी कारण से हुए आपसी मनमुटाव को इस त्यौहार की फुहारों में बहा देते हैं. होली की आग में घर के कूड़े-करकट के साथ ही बुराइयों को भी जलाया जाता है. यह दबी-छुपी कुंठाओं को स्वस्थ रूप से अभियक्त करने का भी अवसर होता है. इस दिन कोई किसी से कुछ भी कहे, कोई बुरा नहीं मानता. इस त्यौहार पर बड़े से बड़े बुद्धिमान व्यक्ति भी जोकरों जैसी हरकते करते मिल जाते हैं. उन्हें इसमें मज़ा आता है. कहते हैं कि सच हमेशा मजाक में ही कहे जाते हैं. इस दिन खूब हँसी-ठिठोली होती है.

होली पर गेहूं की फसल कट कर आती है. इसलिए गांवों में इस त्यौहार का रंग ही अलग होता है. नए गेहूं ही बाली को होली की आग में सेंककर भगवान को अर्पित कर ग्रहण किया जाता है. हर मनुष्य का अपना ख़ास चेहरा, शरीर की बनावट, स्वाभाव, आदतें, प्रवृतियाँ आदि अलग-अलग होती हैं. इन्ही विभिन्नताओं के चलते उनमें समरसता नहीं आ पाती. होली के दिन सभी चेहरों और शरीरों की विशिष्टता रंगों से छुप जाती है. एक-दूसरे को आसानी से पहचानना तक मुश्किल होता है. इस तरह कम से कम एक दिन तो सभी एकरंग और एकरस हो जाते हैं. यह भाव काफी लम्बे समय तक चलता भी है.



होली की कथा

होली की कथा के अनुसार सतयुग में हिरण्यकश्यपु नाम का राक्षस राजा स्वयं को भगवान कहलाना चाहता था. उसने प्रजा को आदेश दिया कि सिर्फ उसे ही ईश्वर माना जाए. भय के कारण लोग ऊपरी तौर पर दिखावे के लिए ऐसा करने भी लगे. लेकिन उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था. उसने पिता का आदेश नहीं माना और भगवा श्रीहरि की पूजा-आराधना करता रहा. हिरण्यकश्यपु ने उसे डराया-धमाकाया और अनेक उपाय किये, लेकिन वह नहीं माना. हिरन्यकश्यपु की बहन होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती थी. भाई-बहन ने योजना बनाई कि लकड़ी की चिता बनाकर होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर कड़ी हो जाएगी. उसे तो अग्नि जला नहीं सकती थी, लिहाजा प्रह्लाद जल जाएगा. लेकिन आग लगाने का उल्टा ही असर हुआ. होलिका जल गयी और प्रह्लाद ईश्वर का भजन करते हुए हवा में ऊपर चले गये. प्रजा ने खूब उत्सव मनाया. तभी से होली का उत्सव शुरू हुआ.


लोकप्रियता में वृध्दि



द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने होली उत्सव को एक नया स्वरुप दिया. उन्होंने इस त्यौहार को इतने उत्साह से मनाने की परम्परा शुरू की कि होली और आनंद एक-दूसरे के पर्याय बन गये. आज भी मथुरा, वृन्दावन और राधा के गाँव बरसाने में होली का उत्सव एक माह चलता है. बरसाने की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है. विश्व और देश के कोने-कोने से लोग इस अद्भुत महोत्सव को देखने आते हैं.


साहित्य में होली

होली, कवियों का बहुत प्रिय विषय रहा है. मध्यकाल में कवियों ने होली के विभिन्न पक्षों पर खूब कलम चलाई. होली पर पद्माकर, सूरदास, रसखान, घनानंद और भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कवितायेँ बहुत प्रसिद्ध हैं. आधुनिक काल में भी शायरों और कवियों ने होली पर बहुत सुंदर रचनाएँ कीं. होली पर बहुत दिलकश शायरी करने वालों में नजीर अकबराबादी, सागर निज़ामी, नज़ीर बनारसी जैसे शायर उल्लेखनीय हैं.

लोककाव्य तो होली के गीतों से भरे पड़े हैं. हिन्दी फिल्मों ने भीहोली के त्यौहार को नए आयाम और रूप दिए. बड़ी संख्या में हिन्दी फिल्मों में होली के गीत बहुत प्रमुखता से शामिल किये जाते हैं. कुछ गीत तो इतने लोकप्रिय हैं कि लोगों के होंठों पर आज भी चढ़े हैं.

विभिन्न राज्यों में होली

उत्तर प्रदेश और बिहार में रंगों के इस त्यौहार को फाग या फगुआ कहते हैं. महाराष्ट्र में होली को फाल्गुन पूर्णिमा कहते हैं. गोवा की कोंकणी भाषा में इसे शिमगो कहा जाता है. पंजाब में इस होला मोहल्ला और हरियाणा में दुलंडी या धुलेण्डी कहा जाता है. पश्चिम बंगाल में होली को बसंत उत्सव और ओडिशा में दोल पूर्णिमा कहते हैं.

जो लोग इस उत्तरी भारत का उत्सव कहते हैं, वे सही नहीं हैं. तमिलनाडु में इस त्यौहार को कामदेव के बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस त्यौहार को कमान पंडीगई, कामाविलास और कामा-दाह्नाम कहते हिना. कर्णाटक में इसे कामना हब्बा के रूप में मनाया जाता है. आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में भी होली इसी प्रकार खेली जाती है.

मणिपुर में होली को योशांग या याओसांग कहते हैं. धुलेण्डी वाले दिन को यहाँ पिचकारी कहा जाता है. असम में इसे फग्वाह या देओल कहते हैं. होली के त्यौहार की त्रिपुरा, नागालैंड, सिक्किक और मेघालय में भी खूब होती है.


उत्तराखंड में कुमाउनी होली बहुत प्रसिद्ध है.


बनारस की होली के तो कहने ही क्या हैं. भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े केंद्र इस पवित्र नगर में गीत-संगीत का खूब रंग जमता है.


अन्य देशों में



होली का त्यौहार अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप लिए हुए है. यह त्यौहार नेपाल, त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना, फिजी, मॉरिशस, पाकिस्तान, मनीला और फिलीपिंस में भी बहुत धूमधाम से मनाया जाता है.

अन्य देशों में होली जैसे त्यौहार

दुनिया के अन्य देशों में भी होली से मिलते-जुलते त्यौहार मनाये जाते हैं. इनका तरीका अलग है, लेकिन भाव केवल भेदभाव भूलकर समरसता और आनंद की अनुभूति करना है. फ्लोरिडा में शुरू हुआ “लाइफ इन कलर” उत्सव आज पूरी दुनिया में चल पड़ा है. अमेरिका के टेक्सास में “कलार्जाम” के नाम से एक त्यौहार मनाया जाता है, जो एकदम होली की तरह होता है. हिप्पी लोग फेस्टिवल ऑफ़ कलर मनाते हैं. दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में होली से प्रेरित “होली वन” त्यौहार मनाया जाता है. स्पेन के इबिज़ा में “होली गार्डन फेस्टिवल” मनाया जाता है, ,जो होली से प्रेरित है.

दक्षिण कोरिया के साउथ ऑफ़ सियोल में योरयोंग मद फेस्टिवल मनाया जाता है. इसमें लोग एक-दूसरे पर गीली मिटटी या कीचड़ फेंकते हैं. वैलेंशैन में टमाटर से होली खेली जाती है. स्पेन में एल्स एन्फरियाट्स फेस्टिवल मनाया जाता है, जिसमें लोग एक-दूसरे पर आटे के गोले और फैंकते हैं. इसी प्रकार आष्ट्रेलिया के गुल्कुला में गार्मा फेस्टिवल मनाया जाता है, जिसमें लोग अपने शरीर को तेज रगों से रंगते हैं. आइये, रंगों के इस त्यौहार को पारंपरिक उत्साह और सद्भाव से मनाकर इसे आज भी उसी तरह सार्थकता प्रदान करें  जैसी युगों पहले थी.


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