हनुमानजी कैसे अस्तित्व में आये!

हनुमानजी कैसे अस्तित्व में आये!

भारत ही नहीं दूनिया के अनेक देशों में हनुमानजी के करोड़ों भक्त हैं. उनके मन में यह जानने की उत्सुकता तो रहती ही होगी कि हनुमानजी किस तरह अस्तित्व में आये? वैसे तो ऐसी परम शक्तियों का न तो कोई आदि होता है न अंत. इनका न जन्म होता है न मृत्यु. इनका अस्तित्व सदा-सदा बना रहता है. लेकिन लौकिक दृष्टि से भक्तों की इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए शास्त्रों के कुछ सन्दर्भों का उल्लेख किया जा सकता है.

हमारे शास्त्रों में हनुमानजी को वायुपुत्र बताया गया है. वाल्मीकि रामायण में केसरी नामक वानर की स्त्री से अंजना के गर्भ से वायु द्वारा उनकी उत्पत्ति बतायी गयी है. स्कंद पूरण और भविष्योत्तर पुराण में कथा आती है की केसरी की पत्नी अंजना पुत्र न होने से दुखी होकर ऋषि मतंग से प्रार्थना करती हैं कि वह उन्हने पुत्र होने का कोई उपाय बताये.. ऋषि ने उन्हें आकाशगंगा तीर्थ पर स्नान कर बारह वर्ष टी ताप करने को कहा. ऋषि के कहने पर अंजनी ने पति की आज्ञा लेकर कठिन ताप किया. तप पूर्ण होने पर वायु देवता ने प्रसन्न होकर उन्हें पुत्र होने का वरदान दिया. अंजना ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया.

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ब्रह्माण्डपुराण में यह प्रसंग कुछ अलग तरह से मिला है, इसके अनुसार त्रेतायुग में एक केसरी नाम का असुर उत्पन्न हुआ,. उसने पुत्र की कामना से शिवजी को प्रसन्न करने के लिए पंचाक्षर मन्त्र का जाप करते हुए निराहार ताप किया. इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे दर्शन देकर वर माँगने को कहा. केसरी ने ऐसा पुत्र माँगा जो बलवान, संग्रम में विजयी, बहुत धैर्यवान और महाबुद्धिमान हो. शिवी ने कहा कि तुझे पुत्र तो नहीं दे सकता, क्योंकिविधाता ने तुझे पुत्र सुख नहीं लिखा है. बहरहाल, एक सुंदर कन्या दूंगा, जिससे तेरी इच्छा के अंसार महान बलशाली पुत्र होगा.

कुछ समय बाद दैत्य के यहाँ एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम अंजनी रखा गया. वहकन्या जब बड़ी हो गयी तब एक बार केसरी नामक वानर ने उस कन्या की याचना की. वह बहुत पराक्रमी था. दैत्यराज ने उसके साथ कन्या का विवाह कर दिया.लेकिन बहुत समय बीतने पर उनके कोई पुत्र नहीं हुआ.

एक बार धर्मदेवताएक वन्य देवी का रूप धारण करके वहाँ आये. उनके एक हाथ में बेंत था और दूसरे हाथ में सुतली थी. वह जोर-जोर से आवाज लगा रहे थे किकिसीको अपने भाग्य के विषय में प्रशन करना हो तो करे, मैं बता दूंगा. जब अंजना उसके पास पहुंची तो उन्होंने पूछा की मेरे भाग्य में पुत्र सुख है कि नहीं. स्त्री रूपी धर्मदेवता ने कहा की तुझे बलवान पुत्र अवश्य प्राप्त होगा. लेकिन इसके लिए तुझे सात हजार वर्ष तक तप करना होगा. अंजन ने वैंकताद्री पर्वत पर आकाशगंगा के पास जाकर केवल वायु क सेवन कर वायुदेवता का ध्यान करते हुए ताप किया.

कुछ दिनों बाद आकाशवाणी हुयी की तू चिंता माँ कर. तेरा भाग्य खुल गया गया है. रावण नाम का राक्छ्स बड़ा दुष्ट होकर सब लोगों को रुलाय्गा. आतंक मचाएगा. उसका नाश करने के लिए भगवन श्रीहरि रघुकुल में श्रीराम के रूप में अवतार लेंगे. उनकी सहायता के लिए बड़ा पराक्रमी, बलशाली, धैर्यवान, जितेन्द्रियऔर असीमित गुण वाला पुत्र तुम्हें प्राप्त होगा. अंजना ने यह वृतांत केसरी को सुनाया. वह भी बहुत प्रसन्न हो गये. दस मॉस बाद श्रावण मास की एकादशी के दिन श्रवण नक्षत्र में अंजना ने सूर्योदय के समय पुत्र को जन्म दिया. उसका रंग सुवर्ण के सामान था.

हनुमानजी के अवतरण के सम्बन्ध में अन्य ग्रंथों में भी कुछ प्रकारांतर से और भी कथाएं मिलती हैं. लेकिनएक बात सभी में सामान है कि हनुमानजी अतुल बलशाली, ज्ञानवान, ब्रह्मचारी, अनन्य रामभक्त और अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करने वाले हैं.

हनुमानजी के भक्तों को उनके जन्म और अवतरण को लेकर बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं हैं. पुराणों में जन-सामान्य को समझाने की दृष्टि से अनेक बातें कथाओं के माध्यम से कही गयी हैं. उनमें कल्पनाशीलता के अंश की सम्भावना भी निश्चित रूप से रहती है, ताकि अशिक्षित्र और कम समझ वाले लोग विषय को आसानी से समझ सकें.

बहरहाल, एक बात अकाट्य सत्य है कि कलियुग में हनुमानजी तत्काल फल देने वालेदेवता हैं. वह अजर-अमर हैं. उनके अस्तित्व के विषय में तिल मात्र भी संदेह न करते हुए, उनपर निरंतर अटल विश्वास रखते हुए उनकी आराधना करते रहिये. वह सारी सिद्धियों से संपन्न देवता हैं. उनके भक्त कष्ट नहीं पाते.

दिनेश मालवीय

Priyam Mishra



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