एक वैज्ञानिक प्रयोग में कैसे साबित  हुआ आत्मा का अस्तित्व?

जब से क्वांटम  फिजिक्स ( Quantum Physics) का समय शुरू हुआ, तब से विज्ञान ने अदृश्य ( METAPHYSICAL) और अस्थिर चीजों को भी रिसर्च का  विषय बना लिया है। क्वांटम फिजिक्स विज्ञान की वह शाखा है, जो ऊर्जा की अदृश्य और अपृथक इकाइयों पर काम करती है। आत्मा के अस्तित्व का वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करने में अमेरिका में जन्मे कनाडा के विख्यात न्यूरो सर्जन वाइल्डर ग्रेव्स पेनफील्ड का नाम प्रमुख है। मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली पर ये 40 साल तक काम करते रहे। अपनी पुस्तक ‘मिस्ट्री ऑफ माइंड’ में उन्होंने आत्मा के प्रमाण वाले अनेक प्रयोगों का वर्णन किया है इनमें एक प्रयोग बहुत चर्चित रहा। उच्च तकनीकी प्रयोग में उन्होंने प्रयोगशाला में एक व्यक्ति को कुछ गतिविधियां करने के लिए कहा, जैसे कि हाथ उठाना। व्यक्ति ने हाथ उठाया, तब उसके मस्तिष्क का एक खास हिस्सा सक्रिय हो उठा। इसी तरह, जब व्यक्ति से हाथ नीचे करने के लिए कहा गया तो उसके मस्तिष्क का यह हिस्सा निष्क्रिय हो गया|

हाई-टेक उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए डॉ. पेनफील्ड ने जब उस व्यक्ति के मस्तिष्क के हिस्से को कृत्रिम रूप से सक्रिय किया, तो उसका हाथ ऊपर उठ गया वह व्यक्ति चिल्ला उठा, ‘मेरा हाथ ऊपर उठ गया डॉ पेनफील्ड ने उससे पूछा, क्या तुमने अपना हाथ उठाया? अचंभित उस व्यक्ति ने कहा, बिल्कुल नही, मेरा हाथ अपने आप उठा। जब डॉ. पेनफील्ड ने हाथ ऊपर किए हुए उस व्यक्ति के मस्तिष्क का हिस्सा निष्क्रिय किया तो उसका हाथ नीचे गिर गया। वह व्यक्ति बोल उठा, मेरा हाथ अपने आप नीचे गिर गया मैंने नीचे नहीं किया।

डॉ. पेनफील्ड ने पाया कि दोनों मामलो मे मस्तिष्क कर्ता का कारक (एजेंट) के इरादों को प्रेषित करने वाली मशीन की तरह काम कर रहा था। दूसरे मामले में इसने डॉ पेनफील्ड के इरादे को प्रेषित किया लेकिन पहले मामले में? क्या यही कर्ता आत्मा नहीं है? डॉ पनफील्ड ने मस्तिष्क पर अपनी रिसर्च की शुरुआत आत्मा के अस्तित्व को नकारने के लिए की थी लेकिन इस प्रयोग से वे इस निष्कर्ष पर पहुचे कि मस्तिष्क एक कप्यूटर है लेकिन इसका संचालन उसके द्वारा होता है जो मस्तिष्क से बाहर है। यही आत्मा का प्रमाण है |आत्मा को पूरी तरह सिद्ध करने में विज्ञान को भले अभी कितना ही समय लग जाए लेकिन वैदिक और उपनिषद कालीन ऋषियों ने हजार साल पहले ही चिंतन-मनन और ईश्वरीय अंतर्दृष्टि से आत्म-तत्व के सिद्ध कर दिया था।

आत्मन् और ब्रह्मन् दो ऐसे शब्द हैं, जिनका उपनिषदों में बार-बार वर्णन मिलता है। इन्हीं दो शब्दों को भारतीय चिंतन और दर्शन का आधार-स्तंभ कहा जाता है। आत्मा शब्द का मूल अर्थ ‘श्वास था जिसे बाद में किसी भी वस्तु खासकर मनुष्य के सा भाग के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। इसी तरह ब्रह्म का अर्थ बढ़ना या ‘फूट पड़ना है। उपनिषदों में इसे ब्रह्मांड के मूल कारण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार ब्रह्मन् जहां बाहरी विश्व अथवा ब्रह्मांड का मूल स्रोत है, वहीं ‘आत्मन् मनुष्य में मौजूद चेतना (कॉन्शसनेस) है| चिंतन की इस प्रक्रिया में ऋषियों ने आत्मा का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण किया कि तमाम बाहरी उपाधियां- शरीर, प्राण, मन, बुद्धि छंट गई और असली तत्व (आत्मा) रह गया। कालांतर में चिंतन की एक स्थिति ऐसी आई जब ब्रह्मांड के मूल कारण यानी ब्रह्म और मनुष्य की सारभूत वस्तु अर्थात् आत्मा का भेद खत्म कर दिया गया।

सन्दर्भ:'मिस्ट्री ऑफ माइंड' & Mrityu Bhi Janm: Zindagi Ke Baad Jaari Yatra Ka Such

ATUL VINOD



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