संस्कार का संसार से क्या सम्बन्ध है? विचार क्यूँ परेशान करते हैं? मन शांत क्यूँ नहीं रहता?

ATUL VINOD :

How does karma work? Is it based on actions or thoughts? Why You Really Need To Quiet Your Mind? What Are Samskaras and How Do They Affect Us? हमारा संसार हमारे संस्कार का प्रतिफल है| हमारे बिलीव्स ही हमारे संस्कार हैं| ये बिलीव्स हमारे विश्वासतन्त्र में गहराई में जमे हैं| जैसे हमारे संस्कार होंगे वैसे हमारा संसार होता है| {Samskaras are the subtle impressions of our past actions} अध्यात्म या सफलता की राह में भी संस्कार ही बार-बार बाधा बनते हैं| संस्कार हमें रह रहकर सताते हैं|

sanskar

यह संस्कार क्या हैं?

यह संस्कार हमारी ही कथनी और करनी का प्रतिफल हैं? संस्कार हमारे ही चित्त (Psyche) के अंदर मौजूद सकारात्मक और नकारात्मक भाव हैं| य {Our belief system(संस्कार) is the invisible force behind your behavior} संस्कार एक तरह की प्रोग्रामिंग है जो हमारे विश्वास तंत्र का हिस्सा बनकर हमेशा बदलाव का विरोध करती है| (Together with other factors such as your personality, your genetic set up and your habits, your belief system is one of the strongest forces that affects any decision that you are making. The communication styles you are using. The ways in which you react to any things that happen in your life.) जब जब हम कुछ नया करने के लिए बैठते हैं| ध्यान या साधना में उतरने की कोशिश करते हैं ये संस्कार हमें विचलित करना शुरू कर देते हैं| ये संस्कार ही थाट्स, फीलिंग्स और इमोशन क्रियेट करते हैं| साधना, उपासना, ध्यान, योग, भक्ति के अभ्यास से हम पुराने संस्कारों को नष्ट करते हैं, लेकिन अपनी आदतों से नए संस्कारों का निर्माण भी करते चलते हैं| इससे अंदर से हम खाली नहीं हो पाते| जैसे टंकी को खाली करने की लिए नीचे का नल खोल दें लेकिन उसे भरने वाले नल को बंद ना करें| क्या होगा? टंकी खाली होगी? नहीं ज्ञान से संस्कार नहीं मिटते| इसलिए ज्ञानियों में आपने कई तरह की खामियां भी देखी होंगी|
अंदर यदि क्रोध का संस्कार है तो विद्वान भी बात बात पर क्रोधित हो जाएगा| यदि झगड़े का संस्कार है तो विद्वान् भी आपको छोटी सी बात पर सडक पर झगड़ा करते दिखाई दे जाएगा| हमारी अस्वाभाविक तिक्रियाओं(Adverse Reactions) के पीछे भी यही संस्कार हैं| हम छोटी मोटी बातों पर ना चिढ़ने का फैसला लेते हैं लेकिन चिढ़ जाते हैं क्यों? हम सोचते हैं कि अपने फ्रेंड्स या कलीग से बुरा नहीं बोलेंगे लेकिन बोल देते हैं| हस्बैंड वाइफ एक दूसरे से न लड़ने का कमिटमेंट करते हैं लेकिन लड़ने लगते हैं| शराबी शराब नहीं पीने की कसम लेता है लेकिन शाम होते से ही फिर पहुंच जाता है बार|| संस्कार इतनी गहराई तक घुसे होते हैं कि वह छोटे-मोटे प्रयासों से ना निकलते हैं ना मिटते हैं|

संस्कारों को मिटाने के लिए साधना(Devotion) चाहिए ?

छोटी मोटी उपासना से संस्कार नहीं मिट सकते| संस्कारों को मिटाने के लिए उन संस्कारों के उलट प्रेक्टिस करनी होगी| हम बात-बात पर गुस्सा करते हैं| हमारी गुस्सैल प्रवृत्ति का कारण या तो इस जन्म के संस्कार हैं या पिछले जन्म के| हमें सबसे पहले अपने गुस्से के कारण को पता करना पड़ेगा| अपने गुस्से को किसी तरीके से निकालना पड़ेगा| ध्यान में विचार संस्कारों के कारण ही परेशान करते हैं| पढाई में भी यही संस्कार बाधा बनता है| नींद में भी हमारे संस्कार सपनों के जरिए हमें सताते हैं| इन संस्कारों के कारण ही मन चंचल होता है| एकांत में भी भीड़ से घिरा महसूस करता है| यदि हमारा संसार बिगड़ा हुआ है तो जान लीजिए कि हमारा संस्कार बिगड़ा हुआ है| संस्कार(belief system) और प्रारब्ध(destiny) अलग अलग हैं| "संस्कार" हमारे मन के विचार, भाव और प्रवृत्तियां है, "प्रारब्ध" हमारे कर्मों का फल| कर्मों के फल तो हमें समय-समय पर भोगने पड़ते हैं लेकिन चित्त के अंदर मौजूद संस्कार हर वक्त हमें परेशान करते हैं|
जब आत्मशक्ति जागृत हो जाती है तो सबसे पहले वह संस्कार को मिटाने की कोशिश करती है| अध्यात्म में बढ़ने की शर्त इतनी होती है कि व्यक्ति नए संस्कार खड़े ना करें| अब सवाल उठता है कि नए संस्कारों को कैसे रोका जाए? इसके लिए यह जानना जरूरी है कि नए संस्कार कैसे बनते हैं? यदि हम किसी की बुराई करते हैं तो हमारे अंदर बुराई का एक संस्कार बन गया| यदि हम बेईमानी करते हैं तो हमारे अंदर बेईमानी का एक संस्कार बन गया| यदि हम किसी से बहुत ज्यादा मोह(affection) में बंधे होते हैं तो मोह का एक संस्कार बन गया| यदि हम किसी का अहित(harm) करते हैं तो यह भी एक संस्कार है| किसी काम में खुद को उलझा लेना भी और संस्कार पैदा कर देगा| बहुत ज्यादा दुखी रहने से दुख का संस्कार जड़े जमाता है | सुख सुविधाओं से लगाव से विलासिता(luxury) का संस्कार जड़े जमाता है| इसका मतलब ये है कि हर बात,घटना, परिस्थिति,व्यक्ति हमारे ऊपर एक संस्कार छोड़ती  है|  हम राग, द्वेष, ईर्ष्या, हिंसा, छल, कपट, दोष से दूर रहकर, अपने अंदर नए संस्कार बनने की प्रक्रिया को रोक सकते हैं, या धीमा कर सकते हैं| पुराने संस्कार धीरे-धीरे कमजोर(slender) होते जाएंगे| नए संस्कारों को हमने पहले से रोक रखा है| एक समय ऐसा आएगा कि संस्कार और उनके प्रभाव बहुत कम हो जाएंगे या नष्ट हो जाएंगे|
तब हम ध्यान, साधना में रहें या संसार में| हर जगह शांति होगी, विचार परेशान नहीं करेंगे, हम सुख और दुख से मुक्त हो जाएंगे, यहीं से सही आध्यात्मिक यात्रा शुरू होगी| हमारे पूर्व कर्मों के इंप्रेशन ही हमारे संस्कार हैं|  जीवित व्यक्ति हर वक्त कुछ ना कुछ कर रहा होता है| जो भी वह करता है उससे एक संस्कार बनता है जो विश्वास तंत्र में शामिल हो जाता है|  यदि व्यक्ति सकारात्मक करता है तो सकारात्मक संस्कार बनते हैं, नकारात्मक करता है तो नकारात्मक संस्कार बनते हैं| यदि हम जागरूकता के साथ अच्छे कार्यों को दोहराएं तो अच्छे संस्कार निर्मित होंगे| यही अच्छे संस्कार हमारी अच्छी आदतें कहलाएंगे| अध्यात्म अच्छे और बुरे दोनों तरह के संस्कार को छोड़ने की बात करता है| गीता में अनासक्त कर्मयोग के बारे में बताया गया है| निर्लिप्तटा के साथ कर्म करने को  योग कहा गया है| “अच्छा ना बुरा” हमें हर तरह के संस्कार से मुक्ति प्राप्त करनी है| इसी को योगश्चित्त वृत्ति निरोध कहते हैं|

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