धर्म सूत्र 10 : कैसा डर? बस इस शक्ति को जानिए और फिर चमत्कार ही चमत्कार? 

धर्म सूत्र 10: जगत की अनंत शक्ति का स्रोत हम हैं फिर कैसा डर? बस इस शक्ति को जानिए और फिर चमत्कार ही चमत्कार?               अतुल विनोद 

धर्म हमें डराने के लिए नहीं है, धर्म हमें नीचे गिराने के लिए नहीं है, धर्म हमें चिंतित करने के लिए नहीं है| धर्म हमें अपनी रियलिटी से परिचित कराने के लिए है| 

हमारे डर और चिंताओं का कारण धर्म नहीं बल्कि हमारा अटैचमेंट है| हम किसी भी चीज से इतने ज्यादा अटैच हो जाते हैं कि उससे दूर जाने से डर लगता है| धर्म के जरिए खुद को जानने की बजाय हम धर्म के रास्तों से भी अटैच हो जाते हैं| रास्ते धर्म नहीं हैं पंथ, मजहब रास्ते हैं धर्म नहीं धर्म मंजिल है| धर्म कहता है कि किसी भी चीज से अटैचमेंट मत रखो, आसक्ति, दुख का कारण है| क्योंकि एक ना एक दिन सारी चीजें छूट जानी है| लाइफ़ को समझना थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड है| क्योंकि इसमें जीने के कई तरीके बताए गए|


कई लोग सिर्फ प्रेजेंट में जीना चाहते हैं, ना तो भूत की परवाह, ना भविष्य की चिंता| लेकिन यह भी प्रैक्टिकल नहीं है| क्योंकि भूत काल से वर्तमान बना है और वर्तमान से भविष्य बनेगा| यह तो मूर्खता ही होगी कि हम सिर्फ वर्तमान में जियें और फ़्यूचर को इग्नोर कर दें| मनमाने तरीके से वर्तमान को इंजॉय करने से फ़्यूचर बिगड़ सकता है वर्तमान में जीने का विचार सिर्फ अपने शरीर को केंद्र में रखकर जीने का फार्मूला है| लेकिन शरीर को केंद्र में रखकर जीना बुद्धिमता नहीं है| लाइफ़ हमारे दृष्टिकोण से चलती है और हमारा दृष्टिकोण समय के साथ बदलता रहता है| जो चीजें आज हमें बहुत इंपोर्टेंट नजर आती है, आने वाले समय में उनका कोई महत्व ना रहे यह भी संभव है|

धर्म के रास्ते  हमें जीने की राह भी बताते है और इसके जरिए हम सत्य तक भी पहुंच सकते हैं| शर्त इतनी है कि धर्म के रास्तों को हम सिर्फ एक माध्यम मानेंगे आत्म कल्याण का| धर्म से जुड़ी हुई तमाम बातें और कथा कहानियां सिर्फ हमें सत्य का आभास कराती है| हम उन कथाओं में रस लेते हैं लेकिन उन कथाओं के पीछे छिपे हुए मर्म को समझने में नाकाम रहते हैं| मूर्खता की पराकाष्ठा यह है कि हम ऋषियों की बातों को हवा में उड़ा देते हैं और किसी विदेशी की बात को अकाट्य तथ्य मानते हैं| आइंस्टीन ने कुछ कहा, डार्विन ने कुछ कहा, हक्सले ने कुछ कहा, वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है लेकिन ऋषि-मुनियों ने कुछ कहा तो वह अंधविश्वास है| विज्ञान भौतिक नियमों की खोज है जबकि आध्यात्म नियमों के पीछे छुपी हुई शक्ति की खोज है| इसी शक्ति के जरिए मनुष्य निडर हो पाएगा| यदि मनुष्य को यह पता चल जाए कि हम सब उस अनंत सत्ता के हिस्से हैं जो पूरे ब्रह्मांड को चला रही है डर खत्म हो जाता है|


हमारा डर ही डर को आकर्षित करता है| हमारा विश्वास विश्वास को आकर्षित करता है| ईश्वर ने हमको एक ऐसा ब्रह्मांड तंत्र दिया है जिसकी हेल्प से हम अपने विश्वास उम्मीद और आशा से अपने जगत का निर्माण कर सकते हैं| कितना बड़ा ब्रह्मांड संचालित है, न जाने कितने यूनिवर्स है और एक यूनिवर्स से दूसरा यूनिवर्स पैदा हो रहा है जब उसके पास इतने बड़े यूनिवर्स को चलाने की शक्ति है तो क्या वह हमें नहीं चला सकता? वह परमात्मा यूनिवर्स की समष्टि भी है और हमारी व्यष्टि है| जो समष्टि में है वही व्यष्टि में है| 

धर्म क्या कहता है? 

धर्म यही तो कहता है कि यह पूरा ब्रह्मांड एक जीती जागती सत्ता है| विज्ञान भी यही कह रहा है कि पूरा यूनिवर्स एक जीवित एंटिटी है| इस यूनिवर्स ने हमारे जीने के लिए ही बहुत साड़ी व्यवस्थाएं की है यह अपने नियमों से पॉइंट 1% भी डिग जाए तो हमारी पूरी दुनिया नष्ट हो जाए| लेकिन वह हमारे जीवन को चलाने के लिए ही इस विश्व को संचालित कर रहा है| पूरा विश्व आपस में जुड़ा हुआ है| पूरा विश्व चैतन्य है| परम पिता ब्रह्मा की चेतना कण-कण में है| विज्ञान आज मान रहा है कि हर कण में यूनिवर्स का न्यूट्रिनो मौजूद है| 

आज विज्ञान यह कह रहा है कि पूरा यूनिवर्स एक कंप्यूटर है| और उस कंप्यूटर से  हम भी जुड़े हुए हैं| यूनिवर्स में एक ऑपरेटिंग सिस्टम पर कार्य कर रहा है और ऑपरेटिंग सिस्टम से हम भी जुड़े हुए हैं| उस परमपिता परमात्मा की शक्ति से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करें और खुद को शक्तिशाली समझे| हम कभी मरने वाले नहीं हैं|  सृष्टि के आरंभ में भी हम मौजूद थे और सृष्टि के अंत में भी हम मौजूद रहेंगे| एक सबअटॉमिक पार्टिकल में भी जीवन मौजूद है, तो फिर डर किस बात का? हम कभी नष्ट नहीं होने वाले| जब भी हमारा शरीर नष्ट होगा तब नए स्वरूप में जीवन की शुरुआत होगी| जब हम उस विशाल सिस्टम के हिस्से हैं तो हम सिर्फ रूपांतरित होंगे मृत नहीं| हम इस सृष्टि की एक तरंग है जो उठेगी शांत हो जाएगी फिर उठेगी फिर शांत हो जाएगी| यह जीवन क्रम विकास नहीं है| यह जीवन तरंग की तरह है जो उठता है शांत होता है|

universeयह ब्रह्मांड फैल रहा है इसका अर्थ है कि यह ब्रह्मांड सांसे ले रहा है जब सांसे छोड़ेगा तो ब्रह्मांड संकुचित होगा| लेकिन ब्रह्मांड की सांस लेने और छोड़ने की गति इतनी धीमी है की उसकी एक सांस लेने की प्रक्रिया में ही सैकड़ों करोड़ साल निकल जाते हैं| जब सृष्टि की विशालता का अनुभव हम अपने अंदर करेंगे तो हमें अपने अंदर की विशालता का अनुभव होगा| हम अपने आप को क्यों  क्षुद्र मानते हैं? हम तो विराट| हमारे विचारों में भी शक्ति है क्योंकि वह सीधे इस ब्रह्मांड से जुड़े हुए हैं| इसलिए हमारे अंदर पैदा होने वाला एक अच्छा विचार हमारे पूरे शरीर को ऊर्जा से भर देता है| 

एक नकारात्मक विचार हमें शिथिल कर देता है| इसलिए आशा और उम्मीदों को कभी मत छोड़िए| आज विज्ञान भी कहता है कि आप जब अच्छा सोचते हैं, उम्मीदों से भर जाते हैं तो आपका दिमाग ठीक उसी तरह से जगमग आ जाता है जैसे बिजली से एक बिल्डिंग| एक निराशाजनक विचार इस बिल्डिंग की विजली गुल कर सकता है| हमारा धर्म सदियों से कह रहा है कि इस संसार में कुछ भी जड़ नहीं है सब कुछ चैतन्य है| 

आज विज्ञान भी कह रहा है कि हर सबअटॉमिक पार्टिकल में अपना एक जीवन है| उसकी अपनी समझ है|

हर जगह जीवन है तो मृत्यु कहां है? 

धर्म यही कहता है कि तुम अपने आप को संकुचित क्यों महसूस करते हो? तुम अपने आपको जड़ क्यों समझते हो? तुम अपने आपको कमजोर असहाय और हीन क्यों समझते हो? हमारे अंदर आत्मा के रूप में सर्वव्यापी अनंत चेतना व्याप्त है| वह अनंत चेतना हर वक्त न्यूट्रिनो के रूप में हमारे अंदर से गुजरती रहती है| हम सबको परब्रह्म परमात्मा थामें हुए हैं गिरने का सवाल ही नहीं है| जब वह इस पूरे यूनिवर्स को थाम सकता है तो हमारा हाथ क्यों नहीं थाम सकता| हम उससे जुड़े| उसे महसूस करें और उस सत्य को अपने अंदर प्रकाशित करें, जो सत्य पूरी दुनिया में प्रवाहित हो रहा है| अपने आप को सिर्फ शरीर मानेंगे? इस शरीर की इस संसार में कितनी जगह है? जब पृथ्वी की नहीं तो ६०,७० किलो के शरीर की कितनी? हम जितना ही अपने आप को इस शरीर से परे ब्रह्म का हिस्सा मानेंगे उतना ही खुद को विस्तारित करेंगे|

हमारा धर्म कहता है कि जब तक जगत में एक भी जीवन बचा हुआ है तब तक तुम भी बचे हुए हो| धर्म कहता है तुम सब वस्तुओं में, सब देवों में, सब प्राणियों में, भूत, वर्तमान, भविष्य में मौजूद हो| तुम ही जगत हो, संपूर्ण जगत ही तुम्हारा शरीर है, जब तक एक भी एटॉमिक पार्टिकल बचा हुआ है, तब तक तुम्हारी मृत्यु नहीं हो सकती, कौन कहता है कि तुम्हारी मृत्यु होगी, इतने निर्भीक हो जाओ, अपने आप में मौजूद अविनाशी शिव तत्व को खोज लो| तुम्हारा व्यक्तित्व तुम्हारा शरीर नहीं| तुम्हारा व्यक्तित्व यह अनंत ब्रह्मांड है| तुम अलग नहीं हो सकते तो क्यों अपने मन से खुद को अलग कर लेते हो| लेकिन वास्तव में तुम खंडित नहीं हो| तुम अखंड हो| उस अखंड सत्ता के अखंड स्वरूप|

हम सबके अंदर ईश्वर भगवान परमात्मा से जुड़े सवाल बार-बार क्यों उठते हैं? क्योंकि हम उस परमपिता परमात्मा के अंश है, अंग है, हिस्से हैं और जो हमारे अंदर है वह बार-बार हमें याद आता है| इसलिए पूरी दुनिया में हमने मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर बनाए| क्योंकि हम अपने आप को जानना चाहते हैं? अपने आप को पहचानना चाहते हैं| विज्ञान कितना भी विकास कर ले| लेकिन हमारे अंदर मौजूद परमात्मा की खोज शांत नहीं कर सकता| 

vishnu-sheshnag-universe_newspuranक्योंकि जो हमारा नित्यस्वरूप है उसे न पहचानने के कारण ही तो अशांति है| बार-बार हमारे धर्म शास्त्र कहते रहे हैं कि हम एक छोटे से शरीर धारी मनुष्य नहीं है| हम पूरा संसार है| इसलिए हम जियें तो सिर्फ अपने लिए नहीं| हम सबके लिए, सबके परमार्थ के लिए, हमारा जीवन सबके उपकार के लिए हो| सबके उपकार के कारण ही हमारा यह जीवन इतना सरल सुखद है| इतनी सारी चीजें हमारे पास मौजूद है| क्योंकि हममें से अनेक लोगों ने सबके उपकार के लिए खोज और आविष्कार किए, इतनी सारी चीजों का निर्माण किया|

यह सारा निर्माण कहां से आया? सारी सामग्री उस परमपिता परमात्मा की सृष्टि में मौजूद थी| परमात्मा ने हर उस वस्तु को| हर उस चीज को हर उस तत्व को हमारे आसपास बिखरा दिया है, जो हमारी ज़रूरत के लिए है| हम जब चाहे तब इस्तेमाल कर सकते हैं| हमें मोबाइल बनाना है तो उस मोबाइल के लिए जरूरी सामग्री हमें कहां से मिलती है? उसकी सारी समझ में इस दुनिया में मौजूद है और उसे उपलब्ध ही हमारे उपयोग के लिए कराया गया है| यदि हम अपने आप को छोटी सी देह में संकुचित कर लेते हैं तो हम सबसे बड़े स्वार्थी हो जाते हैं| इससे सिर्फ और सिर्फ हमारा अमंगल होता है| दुखों की उत्पत्ति होती है| 

लेकिन यदि हम अपने क्षुद्र और संकीर्ण और स्वार्थी भाव को त्याग देते हैं तो संसार हमारे लिए स्वर्ग बन जाता है| फिर कहीं जाने की जरूरत नहीं होती| कार्य सिर्फ विचार की उत्पत्ति हैं| हमारे विचार कार्य पर भी भारी हैं| जो भी कुछ हमने पैदा किया है, बनाया है, निर्मित किया है, विकसित किया है, अविष्कार किया है, वह सब हमारे विचार की उत्पत्ति हैं| विचार इस ब्रह्मांड से ऐसे ऐसे फार्मूले लेकर आता है जो हमारी दुनिया ही बदल डालता है| विचार की शक्ति को पहचानिए उस विचार की शक्ति को ब्रह्मांड की शक्ति से जोड़िए| इसी विचार की शक्ति से आने वाले समय में और भी ऐसे चमत्कार होंगे जो हमारी दुनिया को बदल देंगे|

धर्म सूत्र 9 – इस तरह से मिलेगी असीम सुख शांति : अतुल विनोद



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